Rabindranath Tagore: गुरुदेव रवींद्रनाथ ठाकुर ने लिखे थे दो देशों के राष्ट्रगान, संगीत पर भी डाला गहरा प्रभाव
साल 1971 में जब बांग्लादेश का गठन हुआ तो गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर के लिखे गीत 'आमार शोनार बांग्ला' को इस नये देश ने राष्ट्रगान के रूप में अपनाया था।

आज एक ऐसे शख्स की जयंती है जिन्होंने एक नहीं बल्कि दो देशों के राष्ट्रगान लिखे थे। वहीं साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार पाने वाले पहले एशियाई व्यक्ति थे। आज जयंती है गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर (ठाकुर) की। भारत का 'जन गण मन' और बांग्लादेश का 'आमार सोनार बांग्ला' लिखने वाले रवीन्द्रनाथ ठाकुर का जन्म 7 मई 1861 को कोलकाता में हुआ था। वह अपने माता-पिता की तेरहवीं संतान थे। बचपन में उन्हें प्यार से 'रबी' बुलाया जाता था। आठ वर्ष की उम्र में उन्होंने अपनी पहली कविता लिखी। इसके बाद सोलह साल की उम्र में उन्होंने कहानियां और नाटक लिखना प्रारंभ कर दिया था। 1877 में रवीन्द्रनाथ को कानून की पढ़ाई के लिए इंग्लैंड भेजा गया। परंतु वह बिना कोई डिग्री लिए वापस भारत लौट आए। उनकी अधिकतर शिक्षा घर पर ही हुई।
बंगाल से गहरा नाता
गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर का बंगाल, जिसमें वर्तमान बांग्लादेश भी था, से गहरा नाता रहा है। साल 1830 में रवींद्रनाथ के दादा सर द्वारकानाथ टैगोर ने अंग्रेजों से बंगाल के कुष्टिया जिले के पोतिसर गांव की जमींदारी खरीदी थी। पोतिसर से बारह किलोमीटर दूर अतरई रेलवे स्टेशन है जहां महात्मा गांधी, प्रफुल्ल चंद्र रॉय, नेताजी सुभाषचंद्र बोस और मोहम्मद अली जिन्ना सहित कई बड़े नेता आ चुके थे। रवींद्रनाथ टैगोर पहली बार साल 1891 में पोतिसर आए थे। साल 1909 में प्रकाशित चर्चित उपन्यास 'गोरा' की रचना गुरुदेव टैगोर ने पोतिसर में ही की थी।
भारत के विभाजन के बाद पूर्वी पाकिस्तान के इस क्षेत्र में पाकिस्तान सरकार बांग्लाभाषी जनता पर जबरन उर्दू थोपना चाहती थी। उनकी नजरों में बांग्ला भाषा और साहित्य का कोई मतलब नहीं था। पर 1971 में यहां के लोगों के संघर्ष के बाद जब बांग्लादेश का जन्म हुआ तो गुरुदेव टैगोर का सम्मान उस समय और बढ़ गया, जब उनके लिखे गीत 'आमार शोनार बांग्ला' को इस नए देश ने राष्ट्रगान के रूप में अपनाया।
गीतांजलि के लिए मिला था नोबेल पुरस्कार
27 मई 1912 को इंग्लैंड जाते समय गुरुदेव रवीन्द्रनाथ टैगोर अपने साथ अपनी कविताओं का अंग्रेजी अनुवाद भी ले गये। उन्होंने अपनी आत्मकथा 'माई लाइफ इन माई वर्ड्स' में लिखा है कि लंदन पहुंच कर मैंने ये कविताएं अंग्रेज चित्रकार विलियम रोथेनस्टीन को दे दी थीं, जिनसे मैं 1911 में कलकत्ता में मिल चुका था। इसके बाद रोथेनस्टीन ने मशहूर कवि डब्ल्यू. बी. यीट्स को वे कविताएं पढ़ने के लिए दे दीं।
यीट्स ने इन कविताओं का प्राक्कथन लिखा। इस तरह 1912 में गीतांजलि का सबसे पहले लंदन में प्रकाशन हुआ। टैगोर लिखते हैं कि नोबेल पुरस्कार पाने की खबर मुझे 14 नवंबर 1913 को शांतिनिकेतन में मिली थी। कलकत्ता के एक अखबार 'एंपायर' ने इस खबर को प्रकाशित किया। उस समाचार से बंगाल और भारत में उत्सव जैसा माहौल बन गया था। वहीं कलकत्ता के ही अखबार 'इंडियन डेली न्यूज' ने इस बारे में लिखा कि टैगोर को साहित्य का नोबेल मिलने के बाद ये कहा जा सकता है कि उनका किसी विश्वविद्यालय से संबंध नहीं रहा और वो लॉर्ड मेकॉले और ब्रिटिश सरकार की शिक्षा व्यवस्था की उपज नहीं हैं।
इसलिए वापस की थी 'नाइटहुड' की उपाधि
कवि रवीन्द्रनाथ टैगोर को 3 जून 1915 में ब्रिटिश सरकार ने नाइटहुड यानि सर की उपाधि से नवाजा था। लेकिन 1919 में उन्होंने इसे लौटा दिया था। दरअसल, 13 अप्रैल 1919 को जनरल डायर ने जलियांवाला बाग में फायरिंग का आदेश दिया था। इस घटना में आधिकारिक तौर पर 379 लोग मारे गए थे। इसके बाद रवींद्रनाथ टैगोर ने वायसराय चेम्सफोर्ड को पत्र लिखकर उन्हें ब्रिटिश सम्राट द्वारा 1915 में दी गई 'नाइटहुड' की उपाधि छोड़ने की घोषणा की। चेम्सफोर्ड की समझ में ही नहीं आया कि वह इस घोषणा से कैसे निपटें? वहीं भारत में ब्रिटिश प्रेस ने टैगोर के इस प्रस्ताव को सम्राट का अपमान मानते हुए उग्र प्रतिक्रिया दी थी।
टैगोर ने महात्मा गांधी को दी थी भिक्षा
यह बात कम लोग ही जानते होंगे कि महात्मा गांधी ने टैगोर से भिक्षा ली थी। दरअसल, यह उस समय की बात है जब गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर का स्वास्थ्य खराब चल रहा था। डॉक्टरों ने उन्हें पूरा आराम करने की सलाह दी थी। फिर भी वह अपने आपको काम करने से रोक नहीं पाते थे। उसी दौरान महात्मा गांधी की उनसे मुलाकात हुई। उन्हें पता चला कि टैगोर डॉक्टरों के कहने के बावजूद आराम नहीं करते तो उन्होंने इसके लिए एक उपाय निकाला। उन्होंने टैगोर से कहा कि मैं आपसे भिक्षा चाहता हूं। इस पर टैगोर ने पूछा कि भिक्षा में आपको क्या चाहिए? तब महात्मा गांधी ने कहा कि आप भोजन करने के बाद प्रतिदिन एक घंटा पूर्ण विश्राम करेंगे। उस दौरान कोई काम नहीं करेंगे, यही मेरी भिक्षा है। उसके बाद से टैगोर हर दिन भोजन के बाद एक घंटा विश्राम करते थे।
गुरुदेव की रचनाएं
रवीन्द्रनाथ टैगोर की रचनाओं में गोरा, घरे बाइरे, चोखेर बाली, नष्टनीड़, योगायोग; कहानी संग्रह: गल्पगुच्छ; संस्मरण: जीवनस्मृति, छेलेबेला, रूस के पत्र जैसे उपन्यास शामिल हैं। वहीं कविता की बात की जाए तो गीतांजलि, सोनार तरी, भानुसिंह ठाकुरेर पदावली, मानसी, गीतिमाल्य, वलाका; नाटक: रक्तकरवी, विसर्जन, डाकघर, राजा, वाल्मीकि प्रतिभा, अचलायतन, मुक्तधारा, आदि प्रमुख हैं।
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