VK Krishna Menon: भारत-चीन विवाद में मेनन की संदिग्ध भूमिका के चलते जनरल थिमैय्या ने दे दिया था इस्तीफा
23 जनवरी 1957 को वी.के. कृष्णा मेनन ने जम्मू और कश्मीर पर भारत के रुख का बचाव करते हुए 8 घंटे लंबा भाषण दिया था। कृष्णा मेनन का यह भाषण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में दिया गया अभी तक का सबसे लंबा भाषण है।

VK Krishna Menon: कश्मीर मामले पर संयुक्त राष्ट्र में आठ घंटे लगातार भाषण देकर दुनिया की नजर में एक पहचान पाने वाले भारतीय कूटनीतिज्ञ, राजनीतिज्ञ तथा साल 1957 से 1962 तक भारत के रक्षा मंत्री रहे वी.के. कृष्ण मेनन का जन्म 3 मई 1896 को कालीकट, मद्रास के एक नायर परिवार में हुआ था। इनका पूरा नाम 'वेंगालिल कृष्णन कृष्ण मेनन' था। इनके पिता का नाम कोमाथु कृष्ण था, जो एक वकील थे। मेनन की प्रारंभिक शिक्षा थालास्सेरी में हुई। इसके बाद उन्होंने चेन्नई के प्रेसीडेंसी कॉलेज से बी.ए. की उपाधि प्राप्त की। वह मद्रास लॉ कॉलेज में अध्ययन के दौरान ब्रह्म समाज में शामिल हो गए थे और सक्रिय रूप से एनी बीसेंट तथा होम रूल आंदोलन के साथ जुड़े रहे।
मेनन का राजनयिक जीवन
मेनन ने 1929-1947 तक इंग्लैंड में एक पत्रकार और इंडिया लीग के सचिव के रूप में कार्य किया। इसके साथ ही उनका संपर्क जवाहरलाल नेहरू से हुआ। 1932 में उन्होंने लेबर सांसद एलन विल्किंसन के नेतृत्व में एक तथ्य-खोज प्रतिनिधिमंडल को भारत की यात्रा के लिए प्रेरित किया था। मेनन इसके सचिव थे और उन्होंने 'भारत में परिस्थितियां' शीर्षक वाली इसकी रिपोर्ट का संपादन किया था।
देश की आजादी के बाद प्रधानमंत्री नेहरू ने उन्हें लंदन में भारत का हाई कमिश्नर बना दिया। इस पद पर वह सन 1947 से 1952 तक रहे। इसी दौरान उन्होंने संयुक्त राष्ट्र संघ के लिए भारतीय प्रतिनिधिमंडल का नेतृत्व किया। यहां उन्होंने अमेरिका की तीव्र आलोचना करते हुए गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई। वह उस प्रतिनिधिमंडल का भी हिस्सा रहे जो संयुक्त राष्ट्रसंघ की सुरक्षा परिषद में जम्मू और कश्मीर मामले पर भारतीय पक्ष को लगातार रख रहा था। 23 जनवरी 1957 को उन्होंने कश्मीर पर भारत के रुख का बचाव करते हुए 8 घंटे तक भाषण दिया था। कृष्णा मेनन द्वारा दिया गया यह भाषण संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में दिया गया आज तक का सबसे लंबा भाषण है।
इजरायल को मान्यता देने में गतिरोध
14 मई 1948 को इजरायल देश का गठन किया गया जिसे अगले दिन अमेरिका ने और 17 मई को सोवियत यूनियन ने अपनी मान्यता दे दी। कुछ दिन बाद 20 मई को जब प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू शिमला के पास मशोबरा में छुट्टियाँ बिताने में व्यस्त थे, तब उनके पास भी इजरायल को मान्यता देने का अधिकारिक प्रस्ताव आया। मगर उन्होंने इस पर कोई स्टैंड नहीं लिया।
फिर कुछ महीनों बाद, 29 जनवरी 1949 को यूनाइटेड किंगडम ने भी इजरायल को अपनी मान्यता दे दी। अब भारत सरकार पर दवाब था कि वह भी अपनी स्वीकार्यता जल्दी ही दे। हालांकि, प्रधानमंत्री ने मुस्लिम देशों को समर्थन देने की नीति को जारी रखा और 1 फरवरी को ब्रिटिश सरकार को पत्र लिखकर बताया कि वह अभी इजरायल को मान्यता नहीं दे रहे हैं।
प्रधानमंत्री नेहरू की यह कोई विदेश नीति नहीं, बल्कि भारत के मुसलमानों को साधने की एक कोशिश थी। इसका खुलासा सरदार पटेल ने 28 मार्च 1950 को नेहरू को ही लिखे एक पत्र में किया था। उनका स्पष्ट मानना था कि "भारतीय मुसलमानों के कारण ही इजरायल को मान्यता देने में देरी की गई, जबकि कुछ मुस्लिम देशों ने भी उसे मान्यता दे दी है।" यही नहीं, खुद प्रधानमंत्री 5 फरवरी 1949 को वी.के. कृष्णा मेनन को लिखे एक पत्र में यही बात दोहरा चुके थे। उन्होंने मेनन को बताया कि "अगर इजरायल को मान्यता दी गई तो मुसलमानों के बीच इसका गलत सन्देश जाएगा।"
कम्युनिस्ट प्रेम के चलते हुई थी भारी आलोचना
मेनन के कम्युनिस्ट प्रेम और अक्खड़पन से ब्रिटिश इतने नाराज थे कि जब वह ब्रिटेन में भारत के उच्चायुक्त थे, तब उन्होंने सारे कूटनीतिक नियमों को दरकिनार करते हुए न सिर्फ उनके फोन टैप किए बल्कि चोरी छिपे उनके पत्र भी पढ़े। चीन के प्रति उनकी उदारता के कारण भी भारत चीन से युद्ध हार गया था। बताया जाता है कि मेनन का मानना था कि चीन साम्राज्यवादी नहीं है। न ही उसकी कोई सीमा विस्तार की इच्छा है। उस समय जब वह रक्षा मंत्री थे, तब जनरल एस. थिमैय्या ने उनसे कहा था कि पाकिस्तान के बजाय चीन के बॉर्डर पर सैनिकों की संख्या ज्यादा रखी जाए लेकिन मेनन नहीं माने और तर्क दिया कि चीन से हमें कोई खतरा नहीं है।
मंत्रिपद से हटाने के प्रयास
1959 से लेकर 1961 के बीच चीन ने भारत पर आक्रामक रुख अपनाना शुरू कर दिया था। एक के बाद एक मौकों पर भारतीय रक्षा नीति हल्की पड़ रही थी। ऐसे में प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू सहित उनके करीबी और खास समझे जाने वाले रक्षा मंत्री वी.के. कृष्णा मेनन की भूमिका पर भी सवाल उठने लगे। उस दौरान अधिकतर विपक्षी नेताओं और उच्च सैन्य अधिकारियों का मानना था कि इस विवाद के पीछे मेनन की भूमिका संदिग्ध है। इसलिए उन्हें मंत्रीपद से हट जाना चाहिए।
इस क्रम में सबसे बड़ा कदम जनरल थिमैय्या ने उठाया और उन्होंने 31 मई 1959 को मेनन के विरोध में प्रधानमंत्री नेहरू को अपना इस्तीफा सौंप दिया। हालांकि, प्रधानमंत्री नेहरू ने उनके इस्तीफे को स्वीकार नहीं किया लेकिन मेनन को भी नहीं हटाया।
कश्मीर पर दिया भाषण, बिना प्रचार जीते थे चुनाव
'अ चेकर्ड ब्रिलियंस: द मैनी लाइव्स ऑफ वीके कृष्ण मेनन' के लेखक और कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने लिखा कि 1957 में मेनन ने सुरक्षा परिषद में कश्मीर पर आठ घंटे का भाषण दिया। चार घंटे एक दिन और फिर चार घंटे दूसरे दिन। इस भाषण के तुरंत बाद वह बेहोश होकर गिर पड़े और उन्हें होश में लाने के लिए डॉक्टर को बुलाना पड़ा था। यह भाषण देने के बाद जब वह मुंबई के सांताक्रूज हवाई अड्डे पर उतरे थे तो वहां बहुत से कश्मीरियों ने उनका स्वागत किया था। इसके बाद उन्होंने मुंबई से एक दिन भी प्रचार नहीं करते हुए चुनाव जीता था। उस समय उनके चुनाव प्रचार की जिम्मेदारी बलराज साहनी, ख्वाजा अहमद अब्बास, राज कपूर, नूतन, नर्गिस, देवानंद और दिलीप कुमार ने ली थी।
सैनिक स्कूल सोसाइटी मेनन की देन
1953 में कृष्ण मेनन राज्यसभा के सदस्य बने। इसके बाद 3 फरवरी 1956 को उन्हें केंद्रीय मंत्रिमंडल में बिना विभाग के मंत्री के रूप में शामिल किया गया। 1957 में वह मुंबई से लोकसभा के लिए चुने गए और उसी वर्ष अप्रैल में उन्हें प्रधानमंत्री नेहरू के अधीन रक्षामंत्री नामित किया गया था। सैनिक स्कूल सोसाइटी, जो वर्तमान में देश में कुल 24 सैनिक स्कूल चला रही है। इसकी स्थापना भी मेनन के प्रयासों से ही हुई थी।
1962 के भारत-चीन युद्ध में भारत की हार के बाद उन्होंने अपने पद से त्यागपत्र दे दिया। सन 1967 में संसदीय चुनाव में उनकी हार हो गई। इसके बाद 1969 में वे मिदनापुर (बंगाल) संसदीय क्षेत्र से निर्वाचित हुए। सन 1971 में वे तिरुवनंतपुरम संसदीय क्षेत्र से सांसद चुने गए। 6 अक्टूबर 1974 को मेनन की मृत्यु हो गई।
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