मौत सामने थी और गांधीजी ने कहा, ‘चलो डिक्टेशन लो...’

mahatma-gandhi
आज हमारा देश एक संकट से गुजर रहा है। हमारे सोचने के ढंग में बदलाव, हमारे दृष्टिकोण में बदलाव, और हमारे समाज में एक बदलाव की सख्त जरूरत है। अपने कईपूर्वजों के द्वारा किये बलिदानों के द्वारा हमें स्वतंत्रता मिल गई। हमें उसकी रक्षा करने की जरूरत है। हम भूल गए हैंकि हमारा देश आध्यात्मिक है। कई लोगों का यह मानना है कि अध्यात्मवाद आज की दुनिया के लिए नहीं है, यह कि सामाजिक परिवर्तन लाने के लिए वह एक व्यावहारिक उपकरण नहीं है। लेकिन यह एक गलत धारणा है।

महात्मा गांधी एक बहुत ही आध्यात्मिक व्यक्ति थे। वह हर दिन भगवद् गीता पढ़ते थे। उन्होंने प्रदेश प्रदेश के जिलों जिलों में जाकर बड़े-बड़े सत्संगों का आयोजन किया। एकता की एक बहुत बड़ी भावना देश में जागृत हुई और उसी से हमें स्वतंत्रता मिली। साथ ही, वह एक राजनीतिज्ञ भी थे। उनमें बलिदान की भावना थी। 'मुझे खुद के लिए कुछ भी नहीं चाहिए, लेकिन मैं अपने लोगों के लिए चाहता हूँ'।यह भावना खत्म होती जा रही है - और हमें राजनीति और व्यापार, दोनों में फिर से उन मूल्यों को जगाने की जरूरत है। जब हम बड़े हो रहे थे तब हम महात्मा गांधी के बारे में प्रेरणादायक कहानियों सुनते आते रहे।

एक घटना तब की थी जब महात्मा गांधी दार्जिलिंग के लिए एक छोटे सी ट्रेन में सफर कर रहे थे। ट्रेन पहाड़ी के ऊपर चल रही थी जब कहीं पर इंजन अपने आप से डिब्बों से कट गया। तो इंजन आगे चला गया और डिब्बे पीछे फिसलना शुरू हो गए। वहाँ चारों ओर भगदड़ मची हुई थी,जबकि महात्मा गांधी पत्र लिखा रहे थे। जो व्यक्ति बापू से डिक्टेशन ले रहा था उसने कहा, "बापू हम जिंदा नहीं बच सकते हैं,हम मौत और जीवन के बीच में बैठे हैं।" आप जानते हैं कि महात्मा गांधी ने क्या कहा?

उन्होंने कहा कि अगर हम मर जाते हैं, तो हम मर जायेंगे, लेकिन अगर हम बच गए तो हमारा कितना समय बर्बाद होगा? चलो, डिक्टेशन लो।' वह अपने जीवन का एक क्षण भी बर्बाद नहीं होने देते। मैं आपके साथएक और कहानी बाँटना चाहता हूँ। एक बार किसी ने बापू से कहा, "बापू , आपकी धोती फटी हुई है।" गांधी बाथरूम में चले गये और अपने वस्त्रों को थोड़ा ठीक करके बाहर निकले और फिर कहा, "अब देखो, कहाँ से फटी दिख रही है ज़रा मुझे बताओ? अब फटने के लिये बहुत सारी जगह बाकी है', कहने का यह मतलब था वे संसाधनों को बर्बाद नहीं करना चाहते थे; वे स्वभाव से एक उपभोक्तावादी नहीं बनना चाहते थे।

महात्मा गांधी के समय में अहिंसा के साथ बहुत गर्व जुड़ा हुआ था, लेकिन आज हिंसा के साथ गर्व जुड़ा हुआ है। समय आ गया है जब हम इस प्रवृत्ति को उल्टा पलट दें। गर्व अहिंसा और शांति में होना चाहिए। दुनिया में चल रहे मसलों को एक नए सिरे से देखने की जरूरत है। लोगों को जागना होगा और राष्ट्र के चरित्र निर्माण की दिशा में और अधिक जागरूक होना पड़ेगा। आजहम फिर सेउस दोराहे पर खड़े हैं जब देश में अनिवार्य रूप से अध्यात्म की एक लहर लाने की आवश्यकता है। अध्यात्म का क्या मतलब है? थोड़ी देर के लिए कहीं बैठकर कीर्तन करना? नहीं। अध्यात्म मायने हर किसी के साथ एकता की भावना का होना। हमें लालच को उदारता, सेवा और समुदाय में अपनेपन की भावना में परिणीत करना है।

हमें अहिंसा, सेवा और प्रेम के रास्ते को अपनाना होगा। हिंसा के हर कार्य के लिए, हम अहिंसा के सौ कृत्यों को बनाना होगा। अहिंसा की आवाज को जोर से और स्पष्ट सुना जाना है। यदि हम जीवन को देखने केइस उदार दृष्टिकोण को लेकर अधिक से अधिक लोगों को प्रेरित करने की जिम्मेदारी लेते हैं, और दूसरों की अच्छी भावनाओं बनी रहने के प्रति जिम्मेदारी लेते हैं तो मानव समाज और अधिक शांतिपूर्ण और सामंजस्यपूर्ण बनने का वाकई में एक मौका है। इसलिए हम जहाँ पर हैं परिवर्तन वहीं से और हरेक व्यक्ति से शुरू होता है। और तभी एक सच्चा समाज या 'राम राज्य' का महात्मा गांधी का सपना एक वास्तविकता बनेगा। लेखक श्रीश्री रविशंकर आर्ट ऑफ लिविंग के संस्‍थापक हैं।

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