Chandra Shekhar: ऐसा राजनेता जिसने कह दिया था कि बनूंगा तो सिर्फ PM ही, जानें युवा तुर्क चंद्रशेखर के बारे में
Chandra Shekhar: देश में लोकसभा चुनाव की सरगर्मी और विपक्षी एकजुटता की सुगबुगाहट के बीच पूर्व प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की यादें ताजा हो गई हैं। हालांकि चंद्रशेखर को मात्र कुछ महीने ही प्रधानमंत्री पद पर रहने का अवसर मिला, लेकिन उनके प्रधानमंत्री बनने के पहले और पद पर रहते हुए देश की राजनीति में अनेक ऐसी घटनाएं हुईं, जिनसे उनका कार्यकाल हमेशा चर्चा में रहेगा। आइए आपको पूर्व प्रधानमंत्री के जन्मदिन पर उनसे जुड़ी कुछ खास बातों के बारे में बताते हैं।
छात्र जीवन से ही राजनीति में सक्रिय
उत्तर प्रदेश के बलिया जिले के इब्राहिमपट्टी गांव के किसान परिवार में जन्मे चंद्रशेखर इलाहाबाद यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दौरान समाजवादी आंदोलन से जुड़े थे। चंद्रशेखर अपने छात्र जीवन से ही राजनीति की ओर आकर्षित हो गये थे। इलाहाबाद विश्वविद्यालय से अपनी मास्टर डिग्री करने के बाद वह समाजवादी आंदोलन में शामिल हो गये। वह उत्तर प्रदेश में राज्य प्रजा समाजवादी पार्टी के संयुक्त सचिव बने। इसके बाद 1955-56 में वे उत्तर प्रदेश में राज्य प्रजा समाजवादी पार्टी के महासचिव बने। 1962 में उन्हें उत्तर प्रदेश से राज्य सभा के लिये चुना गया।

लालबहादुर शास्त्री के प्रधानमंत्री काल में 1965 में चंद्रशेखर ने भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ज्वाइन कर ली थी। कांग्रेस में रहते हुए अपने बेबाक विचारों के कारण इंदिरा गांधी के प्रधानमंत्री काल में चंद्रशेखर को युवा तुर्क के नाम से जाना जाने लगा। बाद में वे जयप्रकाश नारायण एवं उनके आदर्शवादी जीवन से प्रभावित होकर कांग्रेस पार्टी के भीतर असंतुष्ट नेताओं की धुरी बन गये। यही कारण था कि कांग्रेस के नेता होने के बाद भी आपातकाल के दौरान उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया था। उस समय वह भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के शीर्ष निकायों, केंद्रीय चुनाव समिति तथा कार्य समिति के सदस्य थे।
निर्भीक जीवन जीते थे चंद्रशेखर
राज्यसभा के वर्तमान उपसभापति हरिवंश ने अपनी किताब 'चंद्रशेखर द लास्ट आइकन ऑफ आइडियोलॉजिकल पॉलिटिक्स' लिखी है। उन्होंने लिखा कि चंद्रशेखर पूरी तरह फियरलेस थे। चाहे अपनी बात को लेकर सत्ता के शिखर पर बैठे लोगों से टकराने का मामला हो या फिर अपनी दोस्ती को लेकर। वह हर बात बिना किसी लाग लपेट के कहते थे। चंद्रशेखर, अटल बिहारी वाजपेयी को सार्वजनिक तौर पर गुरु कहते थे। हालांकि आलोचना से परहेज भी नहीं करते थे। बाद में आपातकाल लगने के बाद विपक्षी दलों की बनाई गई जनता पार्टी का उन्हें अध्यक्ष बनाया गया। जब सरकार बनी तो चंद्रशेखर ने मंत्री बनने से इनकार कर दिया था। उस समय मीडिया में यह चर्चा हुई थी कि चंद्रशेखर खुद प्रधानमंत्री बनना चाहते थे और जब मोरराजी देसाई को प्रधानमंत्री चुन लिया गया तो चंद्रशेखर ने कह दिया कि बनूंगा तो प्रधानमंत्री ही बनूंगा, सरकार में कोई दूसरा पद नहीं लूंगा।
कन्याकुमारी से दिल्ली तक की थी पदयात्रा
यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि चंद्रशेखर ने 6 जनवरी 1983 से 25 जून 1983 तक दक्षिण के कन्याकुमारी से नई दिल्ली में राजघाट तक लगभग 4260 किलोमीटर की मैराथन दूरी पैदल (पद यात्रा) तय की थी। उनकी इस पद यात्रा का एकमात्र लक्ष्य लोगों से मिलना एवं उनकी महत्वपूर्ण समस्याओं को समझना था।
प्रधानमंत्री बनने और इस्तीफा देने की कहानी
यह जानना भी रोचक है कि "बनूंगा तो प्रधानमंत्री ही", यह कहने वाले चंद्रशेखर आखिर कैसे बने प्रधानमंत्री? राजीव गांधी सरकार के पतन के बाद जनता दल ने भाजपा और वामपंथी दलों के समर्थन से सरकार बनाने का दावा किया था। लेकिन चंद्रशेखर को धोखे में रखकर वी.पी. सिंह देश के प्रधानमंत्री बन गए। मंडल कमीशन पर मचे बवाल और 23 अक्टूबर 1990 को लाल कृष्ण आडवाणी की गिरफ्तारी के बाद भाजपा ने वी.पी. सिंह की सरकार से अपना समर्थन वापस ले लिया था। इसके बाद जनता दल की सरकार अल्पमत में आ गई।
चंद्रशेखर ने अपनी आत्मकथा 'जिंदगी का कारवां' में राजीव गांधी द्वारा समर्थन देने की बात का जिक्र किया है। उन्होंने लिखा कि एक दिन अचानक कांग्रेस नेता आर.के. धवन मेरे पास आ कर बोले कि राजीव गांधी आपसे मिलना चाहते है। इसके बाद राजीव गांधी ने मुझसे पूछा कि क्या आप सरकार बनाएंगे? तो मैंने कहा कि मेरे पास सरकार बनाने के लिए पर्याप्त संख्या नहीं है। इस पर राजीव ने कहा कि आप सरकार बनाइए। हम आपको बाहर से समर्थन देंगे। राजीव गांधी ने उस समय जब चंद्रशेखर को समर्थन दिया तो पत्रकारों ने उनसे पूछा कि आप इनसे मिलकर कितने दिन तक सरकार चलाएंगे।
इस पर राजीव ने कहा था कि वी.पी. सिंह की सरकार से एक महीने ज्यादा। पर ऐसा हुआ नहीं। 10 नवंबर 1990 को चंद्रशेखर ने कांग्रेस के समर्थन से भारत के 8वें प्रधानमंत्री पद की शपथ ली। प्रधानमंत्री बनने के बाद जब उनके काम में कांग्रेस ने हस्तक्षेप करना शुरु किया तो चंद्रशेखर ने कांग्रेस के नियंत्रण में सरकार चलाने से इंकार कर दिया। इसके बाद कांग्रेस द्वारा समर्थन वापस लेने का दवाब बनाने की खबरों के बीच चंद्रशेखर ने खुद ही प्रधानमंत्री पद से इस्तीफा दे दिया।
इस बारे में 'ऑन माई टर्म: फ्रोम द ग्रासरूट्स टू द कॉरिडोर्स ऑफ पावर' में शरद पवार ने लिखा कि राजीव ने मुझे दिल्ली बुलाया और कहा कि चंद्रशेखर से इस्तीफा वापस लेने को मनाइए। शरद पवार इसके बाद चंद्रशेखर के पास गये। पर वो नहीं माने। शरद ने अपनी किताब में लिखा कि चंद्रशेखर ने उनसे कहा था कि राजीव से यह कह दो कि चंद्रशेखर एक दिन में तीन बार अपने विचार नहीं बदलता। उनके त्यागपत्र देने के बाद किसी अन्य पार्टी के पास सरकार बनाने जितना बहुमत न होने के कारण लोकसभा भंग कर दी गई और नए चुनावों की घोषणा कर दी गई।
चंद्रशेखर को पीएम के रूप में काम करने लिए महज चार महीने मिले। इसके बाद चुनाव प्रक्रिया चलने और अगले प्रधानमंत्री के चुने जाने तक 21 जून 1991 तक उन्होंने यह पद संभाला। 8 जुलाई 2007 को लंबी बीमारी के बाद चंद्रशेखर का दिल्ली में निधन हो गया था।












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