Foreign Interference: भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी हस्तक्षेप, जानें हाल की घटनाएं
भारत में जब भी कोई भी बड़ी राजनैतिक हलचल होती है, तो अमेरिका सहित यूरोप के देश उस मामले में एकदम सक्रिय हो जाते हैं।

हाल ही में भारत के विदेशमंत्री एस. जयशंकर ने पश्चिमी देशों को आड़े हाथों लेते हुए कहा कि पश्चिमी देश यह सोचते हैं कि दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में बोलने का अधिकार उन्हें ईश्वर ने दिया है। उन्होंने कहा कि पश्चिमी देशों की यह बुरी आदत लंबे समय से रही है कि वे दूसरे देशों के आंतरिक मामलों में टिप्पणी करते हैं। विदेशमंत्री जयशंकर ने यह भी कहा कि पश्चिमी देशों को यह समझना होगा कि अगर आप दूसरे देशों पर टिप्पणी करना जारी रखेंगे, तो दूसरे देश भी पलटकर आपके खिलाफ टिप्पणी करेंगे और यह आपको अच्छा नहीं लगेगा।
गौरतलब है कि कांग्रेस के पूर्व सांसद राहुल गांधी की संसद की सदस्यता रद्द किए जाने के बाद अमेरिका और जर्मनी ने भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप करते हुए इस मुद्दे पर अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त की थी। इससे पहले कांग्रेस के पूर्व सांसद राहुल गांधी ने अपने लंदन दौरे के दौरान कहा था कि भारत में लोकतंत्र समाप्त हो रहा है और यूरोपीय देश तथा अमेरिका जो खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताते हैं, वे चुप बैठे हैं। राहुल गांधी ने कहा कि व्यापार और पैसे का मामला है, इसलिए अमेरिका और यूरोपीय देश चुप हैं।
राहुल गांधी की संसद सदस्यता रद्द होने पर जर्मनी का बयान
पिछले दिनों राहुल गांधी की संसद सदस्यता रद्द होने के मामले पर जर्मन विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता ने अपने बयान में कहा कि हम भारत में विपक्षी पार्टी के नेता राहुल गांधी के खिलाफ आए कोर्ट के फैसले और उनकी संसद सदस्यता रद्द होने के मामले पर नजर रख रहे है। उन्होंने कहा कि जहां तक हमें पता है कि राहुल गांधी इस फैसले के खिलाफ अपील करने की स्थिति में है। अपील के बाद ही यह स्पष्ट हो पाएगा कि राहुल की सदस्यता रद्द करने का फैसला कोर्ट में टिक पाएगा कि नहीं। हम उम्मीद करते हैं कि भारत में न्यायिक स्वतंत्रता और मौलिक लोकतांत्रिक सिद्धांतों का पालन किया जाएगा।
जर्मन विदेश मंत्रालय के इस बयान के बाद कांग्रेस के नेता दिग्विजय सिंह ने जर्मन विदेश मंत्रालय को शुक्रिया अदा करते हुए कहा था कि राहुल गांधी के उत्पीड़न के नाम पर भारत में लोकतंत्र से समझौता किया जा रहा है।
मोहम्मद जुबैर के मामले में भी जर्मनी ने हस्तक्षेप किया
जर्मनी इससे पहले भी भारत के आंतरिक मामलों में हस्तक्षेप कर चुका है। साल 2022 में भारतीय 'फैक्ट चेकर' मोहम्मद जुबैर को जब सांप्रदायिक नफरत फैलाने और धार्मिक भावनाओं को आहत करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया, तो जर्मनी ने इसकी कड़ी आलोचना की थी। जर्मन विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता क्रिश्चियन वैगनर ने कहा था कि हम दुनियाभर में अभिव्यक्ति की आजादी पर जोर देते हैं और मीडिया की स्वतंत्रता को लेकर प्रतिबद्ध हैं, जोकि भारत पर भी लागू होता है। किसी भी समाज के लिए यह बेहद जरूरी है कि वहां बिना दबाव और रोकटोक के पत्रकारिता हो। लेकिन भारत में ऐसा नहीं हो पाना चिंता की बात है।
अमेरिका की प्रतिक्रिया
राहुल गांधी को लेकर जर्मन विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता के बयान से कुछ दिन पहले अमेरिकी विदेश विभाग के उप-प्रवक्ता वेदांत पटेल ने कहा था कि कानून और न्यायिक स्वतंत्रता का सम्मान किसी भी लोकतंत्र की आधारशिला है। भारत की अदालतों में चल रहे राहुल गांधी के मामलों पर हमारी नजर है। हम अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के साथ-साथ लोकतांत्रिक मूल्यों के प्रति अपनी प्रतिबद्धता भारत सरकार के साथ साझा कर चुके हैं।
यह पहला मौका नहीं है जब भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी शक्तियों ने दखल दी हो। इससे पहले, कई बार भारत के आंतरिक मामलों में विदेशी शक्तियों खासकर पश्चिमी देशों ने टिप्पणी की है।
किसान आंदोलन पर विदेशी बयान
दिसंबर 2020 में भारत में चल रहे किसान आंदोलन पर टिप्पणी करते हुए कनाडा के प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कहा था कि भारत में हालात चिंताजनक हैं और हम वहां के हालातों को लेकर बहुत परेशान हैं। शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा के लिए कनाडा हमेशा खड़ा रहेगा। उन्होंने कहा कि हम संवाद के महत्व को अहमियत देते हैं और मैंने भारतीयों से इस मुद्दे पर बात भी की है।
गौरतलब है कि हॉलीवुड की सिंगर रिहाना, पोर्न स्टार मिया खलीफा और स्वीडन की पर्यावरण कार्यकर्ता ग्रेटा थनबर्ग ने भी भारत में चल रहे किसान आंदोलन का कथित समर्थन किया था।
नागरिकता संशोधन कानून पर ब्रिटेन में चर्चा
फरवरी 2020 में ब्रिटिश संसद के उच्च सदन हाउस ऑफ लॉर्ड्स में भारत में लागू नागरिकता संशोधन कानून पर चर्चा की गयी। इस चर्चा में शामिल हाउस ऑफ लॉर्ड्स के एक सदस्य जॉन मोंटगु ने मांग करते हुए कहा कि ब्रिटिश सरकार प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से नागरिकता संशोधन कानून की समीक्षा करने की अपील करें। इस पर ब्रिटिश सरकार ने कहा कि हम स्थिति पर नजर बनाए हुए हैं। क्योंकि, यह कानून भारत में स्पष्ट रूप से विभाजनकारी है और उसके प्रभाव को लेकर हम चिंतित भी हैं।












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