Manipur Explainer: क्यों भड़की मणिपुर में हिंसा, क्या है कुकी, मेइती, ड्रग्स और म्यांमार कनेक्शन?

कई दिनों से मणिपुर में हिंसा जारी है। राज्य में 3 मई को शुरू हुए कुकी और मेइती समुदायों के बीच हिंसक संघर्ष में अब तक 52 लोगों की मौत हो चुकी है।

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Manipur Explainer: 22,347 वर्ग किमी में फैला पूर्वोत्तर राज्य मणिपुर बीते कई दिनों से हिंसा की आग में झुलस रहा है। मणिपुर की सरकार ने बेहद विषम परिस्थिति में हिंसा को रोकने के लिए, हिंसा करने वालों को देखते ही गोली मारने का आदेश दे दिया है। बता दें कि 3 मई को मणिपुर हाईकोर्ट के एक आदेश के बाद से पूरा राज्य हिंसा की आग में समा गया। इस हिंसा में अब तक सैकड़ों गांवों पर हमला किया गया, घरों में आग लगा दी गईं, दुकानों में तोड़फोड़ की गई और मंदिरों व चर्चों में भी तोड़फोड़ की गई।

अब सवाल यह उठता है कि क्या रातोंरात लोगों (मेइती समुदाय और कुकी समुदाय) के बीच इतना द्वेष फैल गया कि वे हिंसा पर उतारू हो गये? दरअसल इस हिंसा के पीछे की कहानी कागज पर तो 10 साल पुरानी है। लेकिन, मामला वास्तव में दशकों पुराना है। चलिए कुछ बिंदुओं के जरिए समझते हैं मणिपुर हिंसा की पूरी कहानी।

क्या है 10 साल पुराना मामला?

दरअसल साल 2012 से ही शिड्यूल ट्राइब डिमांड कमेटी ऑफ मणिपुर (एसटीडीसीएम), मेइती समुदाय को जनजाति का दर्जा देने की मांग कर रही है। इसे लेकर हाईकोर्ट में एक याचिका डाली गई। याचिकाकर्ताओं ने कोर्ट को बताया कि 1949 में मणिपुर का भारत में विलय होने से पहले उनके पूर्वजों को यहां जनजाति का दर्जा था। उनके पूर्वजों की जमीन, परंपरा, संस्कृति और भाषा की रक्षा के लिए उन्हें जनजाति का दर्जा जरूरी है। क्योंकि उनके समुदाय को पहाड़ों से अलग किया जा रहा है जबकि जिन्हें जनजाति का दर्जा मिला हुआ है, वे इंफाल वैली में भी जमीन खरीद रहे हैं।

किस आदेश पर जला मणिपुर?

इस मामले पर मणिपुर हाईकोर्ट ने राज्य सरकार को 19 अप्रैल 2023 को 10 साल पुरानी केंद्रीय जनजातीय मामलों के मंत्रालय की सिफारिश प्रस्तुत करने के लिए कहा। इस सिफारिश में मेइती समुदाय को जनजाति का दर्जा देने के लिए कहा गया था। तभी कोर्ट ने 2013 यानि 10 साल पहले जनजाति मंत्रालय के एक पत्र का हवाला देते हुए 3 मई 2023 को सरकार को निर्देश दिया कि वह 10 साल पुरानी सिफारिश पर विचार करे, जिसमें मेइती समुदाय को जनजाति में शामिल करने की बात कही गई थी।

कोर्ट ने कहा था कि 10 सालों से यह मांग हो रही है। इस पर कोई संतोषजनक जवाब नहीं आता है, तो मेइती ट्राइब यूनियन अगले 4 हफ्ते में बताएं। हालांकि, कोर्ट ने अभी मेइती समुदाय को जनजाति का दर्जा देने का आदेश नहीं दिया है, सिर्फ एक ऑब्जर्वेशन दी है लेकिन कोर्ट के इस ऑब्जर्वेशन को गलत समझा गया। उसी दिन से राज्य में चारों तरफ हिंसा फैल गई।

क्या हिंदू और ईसाई का भी है मुद्दा?

मणिपुर में 16 जिले हैं। इसमें से केवल 10 प्रतिशत भूभाग पर ही मेइती समुदाय का बाहुल्य है। जबकि राज्य की कुल आबादी में मेइती समुदाय की आबादी 64 प्रतिशत से भी ज्यादा है। वहीं मणिपुर के कुल 60 विधायकों में 40 विधायक इसी समुदाय से हैं। मेइती समुदाय का बहुत बड़ा हिस्सा हिन्दू है और बाकी मुस्लिम हैं और इंफाल घाटी में ही मेइती समुदाय की बहुलता है।

जबकि जिन 33 समुदायों को जनजाति का दर्जा मिला है, वे नागा और कुकी जनजाति के रूप में जाने जाते हैं। वहीं 90 प्रतिशत पहाड़ी भौगोलिक क्षेत्र में प्रदेश की 35 फीसदी मान्यता प्राप्त जनजातियां रहती हैं। ये दोनों जनजातियां मुख्य रूप से ईसाई हैं। यही वजह है कि जबसे हिंसा फैली तब से सैकड़ों मंदिरों और चर्चों को भी निशाना बनाया गया है। हालांकि, कितने धर्म स्थलों को निशाना बनाया गया है इसका कोई स्पष्ट आंकड़ा सामने नहीं आया है।

पहाड़ों पर कब्जे की है रणनीति?

प्रदेश में भड़की हिंसा कोई एक या दो दिन पुरानी नहीं है। पहले भी कई मुद्दों को लेकर यहां की जनजातियां आपस में नाराजगी जताती आई हैं। कई खबरों के मुताबिक पहाड़ी और कस्बों के इलाके में कई जनजातियों द्वारा जबरन कब्जा की गई जमीनों को सरकार द्वारा खाली कराया जा रहा है। इन पहाड़ी जमीनों पर ज्यादातर कुकी समुदाय के लोग ही रहते हैं। वहीं पहाड़ों पर अगर मेइती समुदाय के लोग बसना चाहते हैं तो कुकी समुदाय के लोग हिंसा करते हैं। यही वजह है कि चुराचंदपुर इलाके से भी हिंसा भड़की थी, यह कुकी बहुल है। इन सब बातों को लेकर भी तनाव पैदा हो गया है। वहीं दावा ये भी किया जाता है कि भारतीय भूवैज्ञानिक सर्वेक्षण ने कुकी जिलों में खनिजों के भंडार पाये गये हैं। वहीं कुकी समुदाय का आरोप है कि मेइती समुदाय के लोग ही राज्य मशीनरी को चलाते हैं और अब वो उनका सब कुछ लूट लेना चाहते हैं।

... तो क्या ड्रग्स के कारण हुई हिंसा?

दरअसल मणिपुर सरकार ने ड्रग्स के खिलाफ व्यापक अभियान छेड़ रखा है। मणिपुर में सरकार समर्थक समूहों का कहना है कि जनजाति समूह अपने हितों को साधने के लिए मुख्यमंत्री नोंगथोंबन बीरेन सिंह को सत्ता से हटाना चाहते हैं क्योंकि उन्होंने ड्रग्स के खिलाफ जंग छेड़ रखी है। खबरों के मुताबिक मुख्यमंत्री बीरेन सिंह की सरकार अफीम की खेती को नष्ट कर रही है और कहा जा रहा है कि इसकी मार, म्यांमार के अवैध प्रवासियों पर भी पड़ रही है। जो सीमाई क्षेत्रों में पहाड़ों पर कब्जा करके रह रहे हैं। बता दें कि 2 मई, 2023 को मुख्यमंत्री ने चुराचंदपुर में पुलिस द्वारा दो लोगों के पास से 16 किलो अफीम बरामदी पर ट्वीट किया था। मुख्यमंत्री ने लिखा था कि ये लोग हमारे वनों को बर्बाद कर रहे हैं और सांप्रदायिक मुद्दे को अपने ड्रग्स बिजनेस के लिए भड़का रहे हैं। यानी ड्रग्स भी एक बड़ा मुद्दा है।

क्या अवैध अप्रवासी और एनआरसी है छिपा मुद्दा?

इस साल मार्च में कई मणिपुरी संगठनों ने 1951 को आधार वर्ष मानते हुए राष्ट्रीय नागरिक रजिस्टर (NRC) लागू करने के लिए नई दिल्ली में जंतर-मंतर पर प्रदर्शन किया था। इन संगठनों का दावा है कि मणिपुर के पहाड़ी इलाकों (कुकी समुदाय के क्षेत्रों) में अचानक ही 24.5 प्रतिशत की वृद्धि दर से जनसंख्या में बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसलिए मणिपुर में एनआरसी लागू करें। क्योंकि मणिपुर सरकार ने आरक्षित वन क्षेत्रों में अवैध बस्तियों को खाली करने के लिए एक बेदखली अभियान शुरू किया। यह अभियान सभी क्षेत्रों में था, जिसमें मेइती और मुस्लिम लोग भी थे, लेकिन इसका विरोध केवल कुकी समुदाय ही क्यों कर रहे हैं? आरोप है कि म्यांमार के अवैध अप्रवासी 1970 के दशक से मणिपुर में बसते जा रहे हैं, लेकिन आंदोलन अब तेज हो गया है। इसलिए एनआरसी की हुई मांग।

हिंसा के पीछे है म्यांमार कनेक्शन?

मणिपुर राज्य, म्यांमार के सागैंग और चिन क्षेत्रों के साथ 398 किलोमीटर की सीमा साझा करता है। वहीं मणिपुर के पांच जिले चंदेल, टेंग्नौपाल, कामजोंग, उखरूल, चुरचंदपुर ये सभी म्यांमार की सीमा के साथ लगते हैं। खबरों के मुताबिक सबसे ज्यादा हिंसा इन्हीं जिलों में देखी गई है। वहीं आरोप है कि आग भड़काने में सीमा पार से स्थानीय लोगों को मदद मिल रही है। साथ ही सीमा पार कुकी व अन्य समुदायों से जुड़े कई विद्रोही संगठनों के कैंप भी हैं।

क्या कुकी समुदाय म्यांमार से हैं?

मैतेई समुदाय के लोग मानते हैं कि कुकी म्यांमार से आए लोगों की एक जनजाति है। इसे म्यांमार में कुकी-जोमी जनजाति कहा जाता है। आरोप है कि अभी भी लगातार म्यांमार से अवैध प्रवासी आकर कुकी गांवों में बस रहे हैं और ये मणिपुर में वन भूमि पर कब्जा कर रहे हैं। कुकी लोग भारत में मिजोरम और मणिपुर के दक्षिणपूर्वी हिस्से में एक जातीय समूह हैं। यह भारत और म्यांमार के भीतर कई पहाड़ी जनजातियों में से एक है।

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    भारत में कुकी लोगों की कुछ पचास जनजातियों को अनुसूचित जनजातियों के रूप में मान्यता प्राप्त है। उस विशेष कुकी समुदाय द्वारा बोली जाने वाली बोली और साथ ही उनके मूल क्षेत्र के आधार पर इन्हें कुकी कहा जाता है। कुकी समुदायों को लेकर 1859 में प्रकाशित अपने लेख में डब्ल्यू. मैक्कुलो और 1835 में प्रकाशित ईस्टर्न फ्रंटियर पर अपनी रिपोर्ट में आरबी पेम्बर्टन ने भी 19वीं शताब्दी की शुरुआत में मणिपुर में कुकी समुदायों के बड़े स्तर पर प्रवास का जिक्र किया है।

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