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EVM or Ballot: डिजिटल युग में पुराने मतपत्रों को वापस लाने की मांग क्यों?

EVM or Ballot: चुनाव आयोग द्वारा इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीन (ईवीएम) को लेकर उठे संदेहों पर कई बार स्पष्टीकरण देने के बाद भी कुछ राजनीतिक दल इस सवाल को मतदाताओं के दिमाग में डालने की कोशिश कर रहे हैं कि एनडीए, मोदी सरकार के काम के बल पर नहीं, बल्कि ईवीएम में गड़बड़ी कर चुनाव जीतने की कोशिश करेगा।

मुंबई में तो विपक्ष ने बाकायदा यह घोषणा कर दी है कि वे यदि सरकार में आएं तो भविष्य में ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराएंगे।

EVM or Ballot

हालांकि चुनाव आयोग ने पिछले आम चुनाव के समय ही एक दशक से अधिक पुरानी तकनीक वाली ईवीएम को पूरी तरह बदल दिया है और नवीनतम तकनीक वाली मशीनों का उपयोग हो रहा है। इसके अलावा किसी भी अन्य इलेक्ट्रॉनिक्स उपकरण और सॉफ्टवेयर की तरह इसमें भी लगातार अनुसंधान एवं विकास कार्य चल रहा है।

निर्वाचन आयोग सभी चुनाव ईवीएम के साथ वीवीपैट (वोटर वेरिफाइड पेपर ऑडिट ट्रेल) मशीन से ही कराता है। यही नहीं सीईसी ने ईवीएम से छेड़छाड़ की सार्वजनिक चुनौती दी थी, पर उस चुनौती को स्वीकार करने कोई नहीं आया। हालांकि जर्मनी, जापान, इटली, आयरलैंड, इंग्लैंड, फ़्रांस आदि कई देश हैं, जिन्होंने पारदर्शिता की कमी के कारण ईवीएम का उपयोग करना बंद कर दिया गया है। अमेरिका में भी बैलट पेपर्स से ही चुनाव होते हैं।

पुराने मतपत्रों को वापस लाने का विकल्प

चुनाव आयोग के अनुसार देश में 97 करोड़ से अधिक पंजीकृत मतदाता हैं। इतनी बड़ी आबादी के जनादेश की गिनती करना बहुत कठिन ही नहीं बल्कि इसमें त्रुटियां होने का भी खतरा है। आज भी जहां पंचायतों या स्थानीय निकायों का चुनाव मतपत्रों के जरिए होते हैं वहाँ गलत गिनती के कई मामले सामने आते ही हैं।

राज्य चुनाव आयोग द्वारा पुनर्मतगणना के बाद कई उम्मीदवारों की जीत की घोषणा की जाती है। यह निश्चित रूप से नहीं कहा जा सकता कि पहली गिनती सही थी या दूसरी। बैलेट पत्र से चुनाव में राजनीतिक बेईमानी का आरोप धड़ल्ले से लगता है। बिहार , यूपी और पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में बूथ कैप्चरिंग का एक लंबा इतिहास रहा है।

ओडिशा में 2017 में हुए पंचायत चुनाव में बूथ कैप्चरिंग के वीडियो मीडिया में खूब वायरल हुए थे। चुनाव अधिकारी भी गलत गणना की रिपोर्ट करते देखे गए और कई बार कागजात भी बदल दिए गए। कुछ लोगों द्वारा मत पत्र को फाड़ने या उसपर कुछ अनाप शनाप लिख कर मत पत्रों को खारिज कराए जाने का भी मामला सामने आता है।

आजकल कंप्यूटर या स्मार्टफोन को हैक करने की खबरें खूब आती हैं। इसका मतलब यह नहीं है कि स्मार्टफोन और कंप्यूटर को छोड़ कर कागज और कलम पर हम आ जाएं। इसी तरह ईवीएम आधुनिक एवं स्वतंत्र मशीनें हैं, उन्हें हैक किया जा सकता है या नहीं? इसपर कई अध्ययन आ चुके हैं।

इलेक्ट्रॉनिक डिवाइस के विशेषज्ञ यह दावा करते हैं कि जब तक ईवीएम इंटरनेट से कनेक्ट नहीं होती सारी ईवीएम से छेड़छाड़ कैसे हो सकती है। कई लोग यह तर्क देते रहे हैं कि ईवीएम में चिप लगे हो सकते हैं, और इसे दूर से नियंत्रित किया जा सकता है। फिर भी यह एक ही मशीन के लिए संभव है। सभी मशीनों पर नियंत्रण के लिए विशेषज्ञों की एक विशाल टीम की आवश्यकता होगी।

ईवीएम का उपयोग 1982 से हो रहा है। तब केरल में ईवीएम से चुनाव कराए गए थे। 32 साल तक तक ईवीएम सफल रही और अचानक 2014 में जब एक चुनाव परिणाम कुछ पार्टियों के अनुमान के मुताबिक नहीं आए, तो यह बुरी हो गई है। इसी ईवीएम से 2015 में हुए दिल्ली विधानसभा के चुनावों में केजरीवाल को रिकार्ड जीत हासिल हुईं, तो क्या उन्होंने भी ईवीएम हैक कर ली? पिछले 10 सालों में कई राज्यों में काँग्रेस की सरकारें भी बनीं, तब भी क्या ईवीएम को हैक किया गया?

ईवीएम पर संदेह और एक्सपर्ट की राय

ईवीएम पर संदेह करने वाले एक खास वर्ग को लेकर कई बार स्पष्टीकरण दिया जा चुका है। अभी तक कोई ऐसा सबूत सामने नहीं आया है जिसके आधुनिक ईवीएम पर संदेह करने का तर्क उचित लगे। विशेषज्ञों के अनुसार चुनाव प्रक्रिया से पहले कोई नहीं जानता कि कौन सा उम्मीदवार किस क्रमांक पर होगा। भारत में आजकल इस्तेमाल होने वाली आधुनिक ईवीएम में तीन यूनिट होती हैं।

पहला नियंत्रण इकाई है, जिसका संचालन पीठासीन अधिकारी (बूथ अधिकारी) द्वारा किया जाता है। वह सरकार का एक राजपत्रित अधिकारी होता है। वोट डालने के लिए पीठासीन अधिकारी नियंत्रण इकाई पर एक "मतपत्र" बटन दबाएगा, जो आपको कुछ दूरी पर रखी "मतपत्र इकाई" से मतदान करने के लिए अधिकृत करेगा।

दूसरी इकाई बैलट यूनिट है, जहां दो भाषाओं में प्रतीक और नाम होते हैं। इस इकाई से ही वांछित बटन दबाना होता है। तीसरी है वीवीपैट यूनिट, जहां डाले गए वोट का भौतिक प्रमाण देखा जा सकता है। जब भी कोई अपना वोट डालता हैं, तो वीवीपैट पर्ची पर दो भाषाओं में प्रतीक और नाम के साथ एक मुद्रित पर्ची दिखाई देती है। यह पर्ची मतदाता को वीवीपैट यूनिट के अच्छी रोशनी वाले डिब्बे में 6-7 सेकंड तक के लिए दिखाई देती है। यह पर्ची अपने आप बॉक्स में गिर जाती है।

यही नहीं यदि वोट की पर्ची किसी और के नाम पर दिखती है तो मतदाता इसे तुरंत चुनौती भी दे सकता है। यदि पांच मतदाताओं में से दो के संदेह की पुष्टि हो जाती है, तो मतदान निलंबित कर दिया जा सकता है और विवादित ईवीएम का पूरा सेट (तीनों इकाइयां) सील कर दिया जाता है।

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