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Electoral Bonds: चुनावी बॉन्ड विवाद: हमाम में सब नंगे हैं

Electoral Bonds: कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और पूर्व अध्यक्ष राहुल गांधी ने चुनावी बॉन्ड पर खुलासे के बाद सीधे तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है। उनका कहना है कि आंकड़ों से पता चला है कि भाजपा ने खरीदे गए सभी बांड का लगभग 50 प्रतिशत हासिल किया है।

भाजपा ने बॉन्ड के जरिए कुल 6060.5 करोड़ रुपये प्राप्त किए। यह आंकड़ा 12 अप्रैल, 2019 से 24 जनवरी, 2024 के बीच का है। पर क्या मालूम है कि इसी काँग्रेस ने यूपीए 1 और यूपीए 2 के शासन के दौरान चुनावी चंदे के रूप में 4000 करोड़ रुपये प्राप्त किए थे, उसमें से 83 प्रतिशत दानदाताओं का कोई अता पता नहीं था। यही नहीं इन दस सालों में काँग्रेस को सबसे ज्यादा चंदा मिला था।

Electoral bonds

काँग्रेस की आलोचना और वास्तविकता

खड़गे ने कहा कि 'पीएम मोदी कहते थे कि न खाऊंगा, न खाने दूंगा, लेकिन ऐसा लगता है कि उनका मतलब सिर्फ यह था कि सिर्फ बीजेपी को खिलाऊंगा।'" खड़गे का मोदी पर यह कटाक्ष काफी हद तक काँग्रेस के मुकाबले बीजेपी को मिली भारी रकम को लेकर था। यह सही है कि चुनावी बॉन्ड से भाजपा और कांग्रेस को मिलने वाली राशि में भारी असमानता है।

काँग्रेस को केवल 11 प्रतिशत चुनावी बॉन्ड के पैसे मिले तो बीजेपी को 47.5 प्रतिशत। लेकिन यदि यह असमानता किसी भ्रष्टाचार का सूचक है, तो काँग्रेस को अपने दस साल के शासन मे प्राप्त चुनावी दान को भ्रष्टाचार के जरिए प्राप्त धन ही मानना पड़ेगा। आंकड़े बताते हैं कि काँग्रेस ने भी अपने दस साल के शासन में अन्य पार्टियों के मुकाबले सबसे ज्यादा चंदा बटोरे थे।

अज्ञात लोगों से करोड़ों के चंदे

टाइम्स ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के अनुसार 2004 से 2014 के दौरान सभी पार्टियों ने लगभग 11,600 करोड़ के चंदे प्राप्त किये थे, उनमें से 6400 करोड़ के चंदे के स्रोत का कोई पता नहीं था। इन बेनामी चंदे का 83 प्रतिशत हिस्सा अकेले काँग्रेस पार्टी के खाते में गया था। कॉंग्रेस को कुल 4000 करोड़ के चंदे मिले थे। इस अवधि में बीजेपी को भी 3273 करोड़ रुपये के चंदे प्राप्त हुए थे, और उसके भी 65 प्रतिशत दान दाताओं की कोई जानकारी नहीं थी।

केवल काँग्रेस या बीजेपी ही नहीं, लगभग सभी राजनीतिक पार्टियों के चंदे से प्राप्त धन में पारदर्शिता नहीं थी। आम आदमी पार्टी जो कि राजनीति में स्वच्छता स्थापित करने के नाम से आई थी, उसने भी 110 करोड़ रुपये का चंदा अज्ञात स्रोतों से लिया था। सीपीआई को इस दौरान 893 करोड़ का चंदा मिला था, पर इस चंदे का 53 प्रतिशत हिस्सा अज्ञात स्रोत से था। बीएसपी ने इन दस सालों में 764 करोड़ का चंदा लिया, लेकिन एक भी दानदाता का नाम नहीं दे पाई।

ईडी, आईटी और सीबीआई के छापों और चंदे का संबंध

जाहिर है चुनावी चंदे के साथ संदिग्ध दानदाताओं का मामला लंबे समय से चल रहा है। इस संबंध में यह कहावत लागू होती है कि हमाम में सभी नंगे हैं। आज यह कहना कि ईडी, आईटी और सीबीआई के छापों के बाद ही संदिग्ध दान दाताओं की सूची सामने आई है, तथ्य से अलग है। यदि कंपनियों पर दबाव डाल कर चंदा लिया जाता है, तो यह काम बहुत पहले से हो रहा है। यह किसी एक पार्टी या किसी एक सरकार के साथ लागू नहीं होता। सर्वोच्च न्यायालय से सिर्फ भाजपा के भ्रष्टाचार के इस मामले की जांच करने की अपील की मांग अन्य पार्टियों को माफ कर देने जैसा है।

कांग्रेस और अन्य विपक्ष अब चुनावी बॉन्ड योजना पर हंगामा मचा रहे हैं और यह आरोप लगा रहे हैं कि इससे सत्तारूढ़ दल को अनुचित लाभ हुआ है, फिर यह क्यों भूल जा रहे हैं कांग्रेस भी 10 साल सत्ता में रही है। जयराम रमेश, कपिल सिब्बल सहित अन्य विपक्षी नेताओं ने भाजपा पर वित्तीय जांच एजेंसियों के साथ कॉरपोरेट्स को परेशान करके जबरन वसूली करने का आरोप कितना तर्कसंगत है।

चुनावी बॉन्ड नहीं तो क्या?

अब भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने चुनावी बांड योजना को असंवैधानिक करार दिया है। आलोचकों का भी कहना है कि इसमें पारदर्शिता की कमी है, जबकि सरकार का कहना है कि चुनावी बॉन्ड की योजना राजनीतिक फंडिंग प्रणाली में सुधार लाने और नकद दान को समाप्त करने के लिए लाई गई थी। वित्त मंत्री निर्मला सीतारमन ने इस योजना का बचाव करते हुए कहा है कि मौजूद विकल्पों में यह सबसे अच्छा विकल्प है। हालांकि यह नहीं कह सकते कि यही एक मात्र विकल्प है।

वैसे तो राजनीतिक चंदा किसी देश के राजनीतिक जीवन में भाग लेने का एक वैध तरीका है। लेकिन अलग अलग देशों में चुनावी अभियानों और राजनीतिक दलों के वित्त पोषण के अलग अलग नियम हैं। अधिकतर ओईसीडी देश एक सीमित राशि तक ही उम्मीदवारों और पार्टियों को दान देने की इजाजत देते हैं।

कुछ देशों में विदेशी व्यक्तियों और संस्थाओं से दान लेने पर प्रतिबंध है। यूरोप में भी विदेशी दाताओं और कानूनी संस्थाओं से दान नहीं लिया जा सकता। हालाँकि निजी क्षेत्र से चुनावी चंदा लेने पर प्रतिबंध कहीं नहीं है। ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल का कहना है कि कॉर्पोरेट और विदेशी चंदे को सीमित किया जाना चाहिए और राजनीतिक दलों या उम्मीदवारों के चंदे के लिए दानदाताओं के व्यापक आधार को प्रोत्साहित करना चाहिए।

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