Delhi Mayor: कैसे अरुणा आसफ अली बनी थीं दिल्ली की पहली मेयर
दिल्ली नगर निगम चुनाव का पहला चुनाव कब हुआ था? कितने दल मैदान में थे और कौन-कौन नेता मेयर बनने की होड़ में थे? कैसे अरुणा आसफ अली बनी दिल्ली की पहली मेयर?

दिल्ली नगर निगम चुनाव के 84 दिन के लंबे इंतजार के बाद आखिरकार आम आदमी पार्टी ने मेयर और डिप्टी मेयर के पद पर कब्जा जमा लिया है। आम आदमी पार्टी की शैली ओबेरॉय 34 वोटों से मेयर पद का चुनाव जीती हैं। हालांकि, वह महज 38 दिन ही महापौर के पद पर रह कर काम कर सकेंगी। शैली दिल्ली एमसीडी में 31 मार्च तक मेयर रहेंगी और उसके बाद एक अप्रैल को फिर से मेयर का चुनाव होगा। एमसीडी के नियम अनुसार प्रत्येक वित्त वर्ष के लिए नए मेयर का चुनाव होता है।
दिल्ली का नगरीय इतिहास
दिल्ली नगरीय प्रशासन का इतिहास 1862 के बाद से ही अस्तित्व में है। जब नगरीय प्रशासन के ढांचे की शुरुआत हुई, तब दिल्ली की जनसंख्या महज 1.21 लाख थी और शहर 520 हेक्टेयर तक फैला हुआ था। 1863 में दिल्ली के सदर बाजार से पहली बार जन्म और मृत्यु का पंजीकरण शुरू हुआ। तब निगम में 21 मनोनीत सदस्य (5 सरकारी अधिकारी, 3 यूरोपीय, 5 हिंदू, 5 मुस्लिम और बाकि गैर सरकारी) रखे गये थे। इसके बाद धीरे-धीरे दूसरे कार्य जैसे सफाई, सड़क निर्माण, पुलिस व्यवस्था व जल आपूर्ति हेतु धन की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए साल 1902 में पहली बार हाउस टैक्स लेने का प्रावधान रखा गया। तब 46 हजार संपत्तियों से कुल 85 हजार के आस-पास टैक्स लिया गया था। वहीं अन्य आय स्रोतों में चुंगी आदि टैक्स थे।
इसके बाद 12 दिसंबर 1911 में कलकत्ता की जगह दिल्ली को भारत की राजधानी बनाने की घोषणा की गई। अब जाहिर सी बात है कि निगम पर बोझ बढ़ने वाला था। इसके तहत यहां वायसराय, अधिकारियों के लिए बंगले, संसद भवन, नॉर्थ ब्लॉक, साउथ ब्लॉक, उद्यान आदि का निर्माण किया गया। तब अंग्रेज अधिकारियों ने सोचा कि निगम की बजाए दिल्ली को केन्द्र सरकार (अंग्रेजी हुकूमत) के अधीन ही रखा जाये। जिसके परिणामस्वरुप 25 मार्च 1913 को रायसीना नगर समिति (नई दिल्ली नगर निगम) का गठन हुआ।
आजादी के बाद बना नगर निगम अधिनियम
आजादी के बाद विभाजन जैसी आपदा ने दिल्ली की आबादी को अचानक कई गुना बढ़ा दिया। जिसके तहत अनेक नई कॉलोनी बनीं, और कई स्थानीय प्रशासन इकाईयों का गठन हुआ। जिसमें प्रमुख रुप से वेस्ट दिल्ली म्युनिसिपल कमेटी और साउथ म्युनिसिपल कमेटी थी। इन कमेटियों का पहला चुनाव 1951 में हुआ, जिनमें 50 सदस्य निर्वाचित हुए। इसके बाद भी समस्याएं बनी हुई थी। तब तत्कालीन नेहरू सरकार ने दिल्ली का एकीकृत नगर निगम अधिनियम संसद में पारित किया। इस प्रकार दिल्ली नगर निगम अधिनियम 1957 अस्तित्व में आया।
पहला चुनाव - किसे कितनी सीटें मिली
इसके बाद 1958 में दिल्ली नगर निगम के लिए 80 सीटों पर मतदान हुआ। इस चुनाव में कांग्रेस महज 31 सीट ही जीत सकी, जबकि कुछ साल पहले बनी भारतीय जनसंघ ने 25 सीटों पर जीत दर्ज की थी। गौरतलब है कि जनसंघ ने सिर्फ 54 सीटों पर चुनाव लड़ा था, जबकि कांग्रेस ने सभी 80 सीटों पर चुनाव लड़ा था।
इस चुनाव में 14 निर्दलीय और 8 सीटें कम्युनिस्ट पार्टी को मिली। जबकि प्रजा-सोशलिस्ट पार्टी और हिंदू महासभा को 1-1 सीटें मिलीं। गौरतलब है कि इस चुनाव में तकरीबन 12,76,250 वोट पड़े थे, जिसमें चुनाव ऑथोरिटी के द्वारा 6,850 वोटों को अमान्य घोषित किया गया था। वहीं नगर निगर के इस चुनाव में 54 प्रतिशत वोट पड़े थे। जिसमें शहरी क्षेत्रों की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों में अधिक मतदान हुआ था। उदाहरण के लिए, नरेला में ही लगभग 68 प्रतिशत मतदाता मतदान करने पहुंचे थे।
ऐसे चुनी गई अरुणा आसफ अली मेयर
अब नगर निगम को चलाने के लिए मेयर को चुना जाना था। तब 6 लोगों को एल्डरमैन के तौर पर चुना जाता था, जबकि आज 10 लोगों को उपराज्यपाल के द्वारा एल्डरमैन के तौर पर चुना जाता है। इसी एल्डरमैन के तौर पर उन छह लोगों में अरूणा आसफ अली को भी चुना गया था। उस दौरान उन्हें मेयर पद के सबसे ज्यादा 56 वोट मिले थे। इस तरह अरूणा आसफ अली दिल्ली नगर निगम की पहली मेयर चुनी गईं थी।
दरअसल कांग्रेस और जनसंघ ने एल्डरमैन की दो-दो सीटें साझा कीं थी। एक सीट खुद अरुणा आसफ अली और छठी एक निर्दलीय के पास गई थी। पांच एल्डरमैन जो थे, उसमें बावा बचिततार सिंह और राजा राम (कांग्रेस), कौशल्या देवी और डॉ. केदारनाथ साहनी (जनसंघ) और बल सिसेन (निर्दलीय) थे। वहीं श्रीमती अरुणा आसफ अली का नाम कांग्रेस, कम्युनिस्टों, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और निर्दलीयों द्वारा संयुक्त रूप से प्रायोजित किया गया था।
इस तरह 86 सदस्यों के निगम (एल्डरमैन समेत) में कांग्रेस (33), जनसंघ (27), निर्दलीय (15), कम्युनिस्ट (8), हिंदू महासभा (1), प्रजा सोशलिस्ट पार्टी (1) और अरुणा अली (किसी पार्टी संबद्धता नहीं) शामिल थे।
जनसंघ के उम्मीदवार को हराकर बनी थी मेयर
14 अप्रैल 1958 को अरुणा को कुल 86 मेंबर (6 एल्डरमैन) में से 56 वोट मिले थे, जबकि जनसंघ के उम्मीदवार हरि चंद को 28 वोट मिले थे। अरुणा वैसे तो किसी पार्टी से नहीं थीं लेकिन कम्युनिस्ट, कांग्रेस और निर्दलीय का पूरा सपोर्ट था। वहीं आसफ ने खुद अपना वोट नहीं डाला था, जबकि एक वोट निरस्त किया गया था।
वहीं डिप्टी मेयर के तीन उम्मीदवार मैदान में थे। जिसमें आर.सी. अग्रवाल, एक निर्दलीय उम्मीदवारने रूप में थे। उन्होंने जनसंघ के सहदेव मल्होत्रा को हराकर यह पद जीता। दरअसल इस पद के लिए दो चरणों में वोटिंग थी। आर.सी. अग्रवाल (निर्दलीय), कंवरलाल गुप्ता (निर्दलीय) और सहदेव मल्होत्रा (जनसंघ) मैदान में थे। पहले राउंड में 23 वोट पाकर कंवरलाल गुप्ता बाहर हो गये। वहीं दूसरे राउंड में आर.सी. अग्रवाल को 57 वोट मिले, जबकि जनसंघ के उम्मीदवार को 27 वोट मिले।
कौन थीं अरुणा आसफ अली?
16 जुलाई 1909 को कालका (हरियाणा) के हिन्दू बंगाली परिवार में जन्मी अरुणा गांगुली बचपन से आजादी के आंदोलनों में हिस्सा लेती रहती थीं। अपनी ग्रेजुएशन की पढ़ाई पूरी करने के बाद उनकी मुलाकात इलाहाबाद में आसफ अली से हुई। आसफ अली वकालत करते थे, जो अरुणा से उम्र में 23 साल बड़े थे। साल 1928 में अरुणा ने अपने मां-बाप की मर्जी के बिना उनसे शादी कर ली। तब से वो गांगुली की जगह आसफ अली लिखने लगीं। आसफ अली ही वो शख्स थे जिन्होंने भगत सिंह का बाद में केस लड़ा था।
आजादी का जुनून अरुणा पर इस कदर था कि वो कितनी ही बार जेल जा चुकी थीं। साल 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन के समय अरुणा ने मुंबई के गोवालिया टैंक मैदान में झंडा फहरा दिया था। तब उनकी पूरी संपत्ति को जब्त कर लिया गया। अंग्रेजों ने उन्हें पकड़ने के लिए 5000 रुपये के इनाम की घोषणा कर दी थी। अरुणा, महात्मा गांधी के भी काफी करीबी थी। वहीं कांग्रेस की सक्रिय नेता भी थीं। आजादी के बाद साल 1948 में अरुणा आसफ अली और समाजवादियों ने मिलकर एक सोशलिस्ट पार्टी बनाई। दो साल बाद 1950 में अरुणा भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी की सदस्य बनीं। कम्युनिस्ट पार्टी से मोह भंग होने के बाद 1956 में अरुणा ने पार्टी छोड़ दी। फिर 1958 में दिल्ली की मेयर चुनी गईं। साल 1975 में उन्हें लेनिन शांति पुरस्कार, 1991 में जवाहर लाल नेहरू पुरस्कार दिया गया। 29 जुलाई, 1996 में 87 साल की उम्र में अरुणा का देहांत हो गया। 1998 में मरणोपरांत उन्हें भारत का सर्वोच्च नागरिक सम्मान 'भारत रत्न' प्रदान किया गया।
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