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Deendayal Upadhyaya: प्रभावी राजनेता होने के साथ ही कुशल संगठक, विचारक और लेखक भी थे दीनदयाल उपाध्याय

पंडित दीनदयाल उपाध्याय की कुशल संगठन क्षमता को देखते हुए डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी ने कहा था कि अगर भारत को दो दीनदयाल मिल जाते, तो भारत का राजनीतिक परिदृश्य ही अलग होता।

deendayal

पंडित दीनदयाल उपाध्याय का जन्म 25 सितंबर 1916 को मथुरा के नगला चंद्रभान गांव में एक निम्न मध्यम वर्गीय परिवार में हुआ था। उनके पिता का नाम भगवती प्रसाद उपाध्याय और माता का नाम रामप्यारी था। दीनदयाल के बाल्यकाल में ही उनके माता-पिता का निधन हो गया था। इस कारण दीनदयाल ने अपने मामा के घर पर रहकर पढ़ाई-लिखाई की।

उन्होंने साल 1935 में सीकर (राजस्थान) के कल्याण हाई स्कूल से मैट्रिक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से पास की। यह परीक्षा दीनदयाल उपाध्याय ने न सिर्फ प्रथम श्रेणी से पास की, बल्कि संपूर्ण बोर्ड की परीक्षा में प्रथम स्थान हासिल किया। फिर 1937 में पिलानी (राजस्थान) के बिड़ला कॉलेज से इंटर की परीक्षा पास की। सीकर के महाराजा कल्याण सिंह ने दीनदयाल उपाध्याय की प्रतिभा को देखकर उन्हें छात्रवृत्ति प्रदान की।

इसके बाद, उन्होंने 1939 में कानपुर के सनातन धर्म कॉलेज से बी.ए. किया। फिर एमए करने के लिए सेंट जॉन्स कॉलेज, आगरा चले गये। लेकिन, ममेरी बहन की बीमारी के कारण वे एम.ए. की परीक्षा नहीं दे सके। अपने मामा के आग्रह पर उन्होंने सिविल सेवा की परीक्षा में भाग लिया और उत्तीर्ण भी हुए। मगर, प्रशासनिक नौकरी में रुचि नहीं होने के कारण उन्होंने वह छोड़ दी। 1941 में उन्होंने प्रयाग से बी.टी. की परीक्षा पास की। लेकिन, उन्होंने नौकरी नहीं की।

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़ना

दीनदयाल उपाध्याय जब बी.ए. की पढ़ाई कर रहे थे, तभी वे अपने सहपाठी बालूजी महाशब्दे के माध्यम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संपर्क में आए और शाखा लगाने लगे। 1942 में वे संघ के प्रचारक बन गए और आजीवन प्रचारक रहे। संघ में काम करते हुए 1952 में दीनदयाल उपाध्याय भारतीय जनसंघ के राष्ट्रीय महामंत्री बने और 1967 तक वे इस पद पर रहे। दिसंबर 1967 में दीनदयाल को भारतीय जनसंघ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया गया।

जातिगत ध्रुवीकरण के घोर विरोधी

दीनदयाल उपाध्याय राजनीति में शुचिता के समर्थक थे। वे कभी खुद चुनावी अखाड़े में नहीं उतरना चाहते थे। उनके मार्गदर्शक और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के दूसरे सरसंघचालक माधव सदाशिव गोलवलकर भी दीनदयाल जी के चुनाव लड़ने के पक्ष में नहीं थे। हालांकि, 1963 में हालात कुछ ऐसे बने कि उन्हें जीवन में पहली और आखिरी बार चुनाव लड़ना पड़ा। इस चुनाव पर टिप्पणी करते हुए गोलवलकर ने कहा, "इस चुनाव में चाहे जीते या हारे, हर हालत में हानि होगी। हारने पर कम तथा जीतने पर ज्यादा हानि होगी।"

दरअसल, 1962 में चीनी आक्रमण के बाद 1963 में देश में चार महत्त्वपूर्ण उपचुनाव हुए। उत्तर प्रदेश के अमरोहा से आचार्य कृपलानी, फर्रूखाबाद से डॉ. राम मनोहर लोहिया, जौनपुर से पंडित दीनदयाल उपाध्याय तथा स्वतंत्र पार्टी के महामंत्री मीनू मसानी गुजरात की राजकोट सीट से संयुक्त विपक्ष के प्रत्याशी थे। इस चुनाव में आचार्य कृपलानी, डॉ. लोहिया तथा मीनू मसानी विजयी हुए। जबकि दीनदयाल उपाध्याय चुनाव हार गए।

दरअसल, जौनपुर की लोकसभा सीट जनसंघ के सदस्य ब्रह्मजीत सिंह के निधन के कारण खाली हुई थी। जौनपुर में चुनाव राजपूतवाद और ब्राह्मणवाद के आधार पर लड़े जाते थे। कांग्रेस ने राजपूतवाद का पूरी तरह से सहारा लिया। राजपूतवाद का प्रतिवाद वहां ब्राह्मणवाद से ही किया जा सकता था। स्थानीय लोगों ने जब इस प्रकार का प्रयत्न करना चाहा, तो दीनदयाल अपने समर्थकों पर बिगड़ पड़े और कहा कि अगर इस प्रकार चुनाव जीतने की कोशिश की गई, तो मैं चुनाव से हट जाऊंगा।

दीनदयाल राजनीति में अवसरवाद और सिद्धांतहीनता के हमेशा खिलाफ रहे। यही वजह थी कि उन्होंने उपचुनाव में जातिगत समीकरणों के आधार पर प्रचार करने से इंकार कर दिया। कांग्रेस के प्रत्याशी राजदेव सिंह ने इस सीट पर जीत के लिए हर चुनावी हथकंडे अपनाए। इस चुनाव में दीनदयाल उपाध्याय हार गए। लेकिन, उन्होंने राजनीति के उच्च आदर्शों से कभी समझौता नहीं किया। शायद इसीलिए अटल बिहारी वाजपेयी ने दीनदयाल जी को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा था, "दीनदयाल जी संसद सदस्य नहीं थे, बल्कि संसद सदस्यों के निर्माता थे।"

दीनदयाल के विचारों से प्रभावित थे कांग्रेस के नेता
जब दीनदयाल उपाध्याय की मृत्यु के बाद उनके लेखों का संकलन 'पॉलिटिकल डायरी' प्रकाशित हुई, तो उसकी प्रस्तावना कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे डॉ. संपूर्णानंद ने लिखी। उन्होंने प्रस्तावना में लिखा कि अगर स्वर्गीय दीनदयाल उपाध्याय के विचारों को पूर्ण प्रकाश में लाने में सहायता करने के अनुरोध को अस्वीकार कर दूं, तो मैं अपने कर्तव्य से विमुख हो जाऊंगा।

संपूर्णानंद ने लिखा कि दीनदयाल उपाध्याय का चरित्र निर्मूल था और सार्वजनिक जीवन में एक मापदंड की तरह था। उनका समर्पण और देश प्रेम उच्च कोटि का था। पंडित दीनदयाल उपाध्याय के ये लेख भविष्य में राजनीतिक कार्यकर्ताओं के लिए एक मार्गदर्शन की तरह होंगे।

लोहिया और दीनदयाल में समानता
लोहिया और दीनदयाल उपाध्याय सामाजिक-राजनीतिक कार्यकर्ता के नाते अच्छे मित्र थे। डॉ. महेशचंद्र शर्मा ने अपनी पुस्तक 'दीनदयाल उपाध्याय : कर्तृत्व एवं विचार' में लिखा है, "1962 में चीनी आक्रमण के दौरान लोहिया और उपाध्याय के बीच मित्रता बढ़ी। 1963 में लोहिया का फर्रूखाबाद से लोकसभा का उपचुनाव जीतने का श्रेय भी जनसंघ के कार्यकर्ताओं और दीनदयाल उपाध्याय को ही जाता है। 1964 में पाकिस्तान में हिंदुओं पर व्यापक रूप से आक्रमण किए जाने पर डॉ. लोहिया ने पंडित दीनदयाल जी से चर्चा की तथा दोनों ने 'भारत-पाक महासंघ' के निर्माण के लिए संयुक्त वक्तव्य जारी किया।"

महेशचंद्र शर्मा ने अपनी पुस्तक में लिखा, "डॉ. लोहिया भारत-विभाजन के खिलाफ तथा भारत-पाक महासंघ के पक्षधर थे, तो दीनदयाल अखंड भारत के उपासक तथा भारत-पाक एकीकरण के प्रवक्ता थे। डॉ. लोहिया समाजवादी होते हुए भी भारतीयवादी थे, तो दीनदयाल भारतीयवादी संस्कृतिवादी होते हुए भी संपत्ति पर समाज के स्वामित्व तथा समतावाद के समर्थक थे। दोनों हिंदी के भी प्रबल समर्थक थे। दोनों अविवाहित एवं सांस्कृतिक सामाजिक-राजनीतिक कार्यों को समर्पित राष्ट्रीय नेता थे। डॉ. लोहिया, गैर-कांग्रेसवाद के पुरोधा तथा उपाध्याय सबसे बड़े गैर-कांग्रेसी दल के नेता थे।"

भाजपा के वरिष्ठ नेता डॉ. मुरली मनोहर जोशी का कहना है कि सिद्धांतों की दृष्टि से डॉ. लोहिया व दीनदयाल एक दूसरे के पूरक थे। सामान्यतः माना जाता है कि दीनदयाल जी राष्ट्रवादी और डॉ. लोहिया समाजवादी थे। लेकिन, राम मनोहर लोहिया समाजवादी मंच से राष्ट्रवाद के प्रवक्ता थे, तथा दीनदयाल राष्ट्रवादी मंच से समाजवादी विचारक थे।

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