Jagjivan Ram: बचपन में स्कूल के घड़े से पानी पीने से रोका, बाद में देश की संसद में बिताये 50 साल
Jagjivan Ram: एक नेता जिसे बचपन में स्कूल के घड़े से पानी पीने से रोका गया। उन्हें बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की मेस में कोई खाना खिलाने को तैयार नहीं था। एक दिन वह राजनेता कांग्रेस (इंदिरा) का पहला राष्ट्रीय अध्यक्ष बना। वह नेता थे बाबू जगजीवन राम। आज उनकी पुण्यतिथि है। जगजीवन राम को लोग प्यार से बाबूजी भी कहा करते थे। इन्होंने अपने जीवन में अनेक महत्त्वपूर्ण काम किये जिसमें दलित वर्गों के लिए सामाजिक समानता और समान अधिकारों के लिए उनके प्रयास शामिल हैं। देश में छुआछूत जैसी कुप्रथा के खिलाफ उन्होंने बचपन से आवाज उठाई।
शुरुआती जीवन व दलित होने का दंश
बाबू जगजीवन राम का जन्म 5 अप्रैल 1908 को बिहार के भोजपुर जिले के चांदवा गांव में हुआ था। उन्होंने दलितों के साथ हो रहे भेदभाव को बहुत ही करीब से देखा। क्योंकि वह खुद इसी परिवार से आते थे। बचपन में एक बार इन्होंने स्कूल के घड़े से पानी पी लिया। जगजीवन के पानी पीने पर प्रिंसिपल के पास जब यह शिकायत पहुंची कि एक अछूत लड़के ने घड़े से पानी पी लिया है तो बवाल हो गया। प्रिंसीपल ने तीसरा घड़ा स्कूल में रखवाया ताकि दलित बच्चे उस घड़े से पानी पी सकें।

जगजीवन राम ने वह तीसरा घड़ा फोड़ दिया। प्रिंसीपल ने फिर से रखवाया तो फिर उन्होंने वैसा ही किया। दलितों को समानता का अधिकार दिलाने के लिये वह बचपन से ही अग्रसर थे। ये उनके जीवन के शुरुआती दिन थे जब उन्होंने इस तरह से अपने अधिकारों के लिए मटकी फोड़ने जैसा छोटा, पर महत्वपूर्ण कार्य किया।
इसके बाद दूसरा किस्सा धर्म परिवर्तन का है। दरअसल, उनकी मां को एक अंग्रेज नन ने ईसाई बनने का एक ऑफर दिया था। हुआ यूं कि जब जगजीवन राम 10वीं क्लास में फर्स्ट डिविजन से पास हुए, तो आगे की पढ़ाई के लिए उनके पास पैसे नहीं थे। उनकी माताजी स्थानीय नन के पास मदद के लिए पहुंचीं। नन ने लखनऊ स्थित अपने ईसाई मिशनरी स्कूल में मुफ्त पढ़ाई का ऑफर दिया। साथ ही नन ने उच्च अध्ययन के लिए अमेरिका भेजने का वादा भी किया। लेकिन उनकी माताजी ने उस ऑफर को ठुकरा दिया। उन्होंने कहा कि आप मेरे बच्चों को पढ़ाओगी लेकिन उसका धर्म भी बदल दोगी।
इसके बाद बनारस हिंदू विश्वविद्यालय में उनसे हुए भेदभाव का जिक्र उनकी बेटी और लोकसभा स्पीकर रही मीरा कुमार ने एक इंटरव्यू में किया था। उन्होंने बताया था कि कैसे उनके पिता को वहां दलित होने की पीड़ा झेलनी पड़ी थी। वहां रहने के दौरान जब वे मेस में खाना खाने के लिए जाते थे तो उन्हें वहां बैठने तो दिया जाता था पर कोई उन्हें खाना नहीं परोसता था। यहां तक कि वहां के नाई ने उनके बाल काटने से इनकार कर दिया था। मीरा ने बताया कि इन सब बातों से तंग आकर पिता जी ने कलकत्ता यूनिवर्सिटी में अपनी आगे की पढ़ाई की। कलकत्ता यूनिवर्सिटी में पढ़ने के दौरान जगजीवन राम की मुलाकात सुभाष चंद्र बोस से भी हुई। यहीं वे महात्मा गांधी के संपर्क में भी आए। इसके बाद वे 1931 में कांग्रेस से जुड़े।
उन्होंने वर्ष 1934-35 में अखिल भारतीय शोषित वर्ग लीग की नींव रखने में अहम योगदान दिया था। यह संगठन अछूतों को समानता का अधिकार दिलाने हेतु समर्पित था। इसके बाद वर्ष 1935 में उन्होंने हिंदू महासभा के एक सत्र में जाकर प्रस्ताव रखा कि पीने के पानी के कुएं और मंदिर अछूतों के लिये खुले रखे जाएं।
देश के प्रधानमंत्री बनने से चूके
1946 में जवाहरलाल नेहरू ने नेतृत्व में जब केंद्रीय अंतरिम सरकार बनाई गयी तो जगजीवन राम इस सरकार में सबसे कम उम्र के मंत्री बने। उन्हें भारत का पहला श्रम मंत्री नियुक्त किया गया था। आपकी जानकारी के लिए बता दें कि 1971 के भारत-पाकिस्तान युद्ध के दौरान जगजीवन राम देश के रक्षा मंत्री थे।
1977 में इन्होंने इंदिरा गांधी का साथ छोड़कर कांग्रेस फॉर डेमोक्रेसी नामक पार्टी का गठन किया। इसके बाद उन्होंने जनता पार्टी के साथ चुनाव लड़ने का ऐलान कर दिया। जनता पार्टी को भी पता था कि जगजीवन राम के जरिए बड़ा दलित वोट उनके पास आ रहा है। सबको लग रहा था कि जगजीवन राम प्रधानमंत्री बनेंगे। लेकिन जयप्रकाश नारायण ने मोरारजी देसाई को प्रधानमंत्री के तौर पर आगे कर दिया। इससे जगजीवन राम इतना नाराज हुए कि उन्होंने देसाई की कैबिनेट में शामिल होने से इंकार कर दिया। इसके बाद जयप्रकाश नारायण ने उनको बहुत समझाया, तब उन्होंने उप प्रधानमंत्री के तौर पर अपना कार्यभार संभाला।
वह एक ऐसे नेता रहे जिन्होंने 1936 से लेकर 1986 तक संसद के सदस्य के तौर पर कार्य किया। यह एक विश्व रिकॉर्ड बना। साथ ही उनके पास 30 वर्षों तक कैबिनेट मंत्री के तौर पर काम करने का भी रिकॉर्ड शामिल है। वहीं जब देश में हरित क्रांति आई तो वह देश के कृषि मंत्री थे। 6 जुलाई 1986 को जगजीवन राम का देहांत हो गया।












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