Sarojini Naidu: महात्मा गांधी को ‘मिकी माउस' कहती थी सरोजिनी नायडू
समाज सुधारक, स्वतंत्रता सेनानी और क्रांतिकारी कवयित्री के रूप में सरोजिनी नायडू ने आजादी की लड़ाई में अहम भूमिका निभाई थी। वह स्वाधीन भारत में पहली महिला राज्यपाल भी बनी।

Sarojini Naidu: सरोजिनी नायडू का जन्म 13 फरवरी 1879 को हैदराबाद में हुआ था। इनके पिता डॉक्टर अघोरनाथ चट्टोपाध्याय एक प्रतिष्ठित वैज्ञानिक और शिक्षा शास्त्री थे। नाइटिंगेल ऑफ इंडिया अर्थात 'भारत कोकिला' के नाम से विख्यात सरोजिनी नायडू ने मात्र 14 वर्ष की उम्र में अंग्रेजी कवियों की रचनाओं का अध्ययन कर लिया था। सरोजिनी अपने पिता की पहली संतान थीं, इसलिये पिता ने इनकी शिक्षा की ओर विशेष ध्यान दिया। यह पिता की शिक्षा का ही प्रभाव था कि सरोजिनी अभी पूरे बारह वर्ष की भी नहीं हो पायी थी कि उन्होंने मद्रास यूनिवर्सिटी की मैट्रिक्युलेशन परीक्षा पास कर ली थी। सरोजिनी का 19 साल की उम्र में सन 1898 में डॉ. गोविन्द राजालु नायडू से विवाह हुआ।
सरोजिनी ने की थी इंटरकास्ट मैरिज
सरोजिनी नायडू ने इंटरकास्ट मैरिज की थी। यह तब की बात है जब अंतरजातीय विवाह के बारे में सोचना भी 'पाप' माना जाता था। लेकिन सरोजिनी ने आगे बढ़ने का फैसला लिया। उनकी शादी डॉक्टर गोविंदराजुलु नायडू के साथ हुई थी जोकि आर्मी में डॉक्टर थे। पहले तो सरोजिनी के पिता ने इस शादी से इंकार कर दिया था, लेकिन बाद में शादी के लिए मान गए। दरअसल, सरोजिनी नायडू एक बंगाली चट्टोपाध्याय ब्राह्मण परिवार से थी। वहीं उनके पति तमिल नायडू थे।
महात्मा गांधी को मिकी माउस बुलाती थी सरोजिनी
तारा अली ने अपनी किताब 'आधुनिक भारत की निर्माता - सरोजनी नायडू' में जिक्र किया है कि सरोजिनी नायडू ने तो महात्मा गांधी को 'मिकी माउस' की उपाधि दे डाली थी। यह नाम उस दौर में बेहद लोकप्रिय हुआ था। जबकि महात्मा गांधी भी अपने पत्रों में सरोजिनी नायडू को 'डियर बुलबुल' कहकर संबोधित करते थे। यही नहीं, जब भारत विभाजन के दौरान साम्प्रदायिक हिंसा भड़की और महात्मा गांधी उसे शांत कराने का प्रयत्न कर रहे थे तो उस वक्त सरोजनी नायडू ने उन्हें 'शांति का दूत' कहा था।
एक उत्कृष्ट और ओजस्वी वक्ता
सरोजिनी नायडू अपने हंसमुख स्वभाव के साथ-साथ बेहतरीन भाषण शैली के लिए भी प्रसिद्द थी। तारा अली अपनी किताब में लिखती हैं कि 1906 के अखिल भारतीय सामाजिक सम्मेलन में महिलाओं को शिक्षा से संबंधित प्रस्ताव पेश करते समय सरोजिनी नायडू का भाषण सुनने के बाद गोपाल कृष्ण गोखले ने लिखा कि "मैं आपके उत्साहपूर्ण भाषण के लिए बधाई देता हूं। आपका भाषण श्रेष्ठतम कोटि की बौद्धिक वक्ता से कहीं अधिक था।" जवाहरलाल नेहरू की बहन रामेश्वरी नेहरू ने भी एकबार सरोजिनी नायडू के भाषण की तारीफ करते हुए कहा कि उनके भाषण से श्रोता अपनी सुध बुध तक खो देते हैं।
अंग्रेजी की प्रखर कवियत्री
'श्रीमति सरोजनी नायडू' पुस्तक में श्रीयुत मातासेवक पाठक ने लिखा कि "जैसी संगति तैसी बुद्धि" की लोकोक्ति सरोजिनी देवी के सम्बन्ध में भी ठीक सिद्ध होती है। दरअसल, उन्होंने बचपन से ही अंग्रेजी बोलने वालों की मंडली में रहकर शिक्षा प्राप्त की थी और पन्द्रह वर्ष की अवस्था में विलायत चली गयी। इसलिए अंग्रेजी शिक्षा पाने के साथ सरोजिनी नायडू में कवित्व की रुचि भी अंग्रेजी में बन गयी। सरोजिनी के मुख्य काव्य 'बर्ड ऑफ टाइम' और 'ब्रोकन विंग' अंग्रेजी भाषा में ही थे।
1922 में लिया खादी पहनने का व्रत
सरोजिनी की महात्मा गांधी से पहली मुलाकात 1914 में इंग्लैंड में हुई थी। 1919 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में महात्मा गांधी से प्रेरणा पाकर होमरूल के मुद्दे पर चर्चा हेतु सरोजिनी नायडू 1919 में इंग्लैंड गईं। 1922 में उन्होंने खादी पहनने का व्रत ले लिया। 1922 से 1926 तक वे दक्षिण अफ्रीका में भारतीयों के समर्थन में आंदोलनरत रहीं और गांधी जी के प्रतिनिधि के रूप में 1928 में अमेरिका भी गईं। सरोजिनी नायडू ने गांधी के अनेक आंदोलनों में भाग लिया। 'भारत छोड़ो' आंदोलन में वे जेल भी गईं। 1925 में सरोजिनी नायडू भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कानपुर अधिवेशन की प्रथम भारतीय महिला अध्यक्ष बनीं थी।
केसर ए हिंद की मिली थी उपाधि
भारत में प्लेग की भयंकर बीमारी के दौरान सरोजिनी नायडू ने लोगों के लिए खूब कार्य किया। उनके इस काम के लिए 1928 में उन्हें 'केसर ए हिंद' से सम्मानित किया गया था। देश की आजादी के बाद उन्हें उत्तर प्रदेश का राज्यपाल चुना गया। सरोजिनी नायडू देश की पहली महिला राज्यपाल थीं। सरोजनी नायडू अपने निधन तक इस पद पर रहीं। 2 मार्च 1949 को हार्ट अटैक से 70 वर्ष की उम्र में लखनऊ में उनका निधन हुआ।
पर्दा प्रथा के खिलाफ रहीं सरोजिनी
भारतीय नारी के उत्थान में सरोजिनी नायडू ने प्रशंसनीय कार्य किया था। वे पर्दा-प्रथा, दहेज़ प्रथा, बालविवाह आदि कुप्रथाओं के बहुत अधिक खिलाफ थीं। वे स्त्री-पुरुषों के समान अधिकारों की आवाज उठाती थीं। उन्होंने मांटेग्यु के ऐतिहासिक भारतीय दौरे के समय 'अखिल भारतीय महिला डेपुटेशन' का नेतृत्व किया। कुप्रथाओं में जकड़ी हुई महिलाओं को देश की स्वतंत्रता के लिए सामने लाना सरोजिनी के लिए बहुत कठिन कार्य था। पर वह पीछे नहीं हटी और औरतों को उनके अधिकारों के बारे में बताया। उनका कहना था कि ''देश की उन्नति के लिए रूढ़ियों, परम्पराओं, रीति-रिवाजों के बोझ को उतार फेंकना होगा।''
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