डैडी‬: अर्जुन रामपाल ने निभाया जिस ‪अरुण गवली का किरदार, पढ़िए उसके डॉन बनने की कहानी

डैडी‬: अर्जुन रामपाल ने निभाया जिस ‪अरुण गवली का किरदार, पढ़िए उसके डॉन बनने की कहानी

नई दिल्ली। अर्जुन रामपाल की आने वाली फिल्‍म 'डैडी' का ट्रेलर रिलीज हो चुका है। इस फिल्‍म में अर्जुन के लुक को लेकर खूब चर्चा हो रही है। अर्जुन, मुंबई के जानेमाने 'डैडी' यानी अरुण गवली के किरदार में नजर आने वाले हैं। अरुण गवली अपराध जगत से राजनेता बने हैं और उनकी बेटी गीता गवली भी अब पार्षद हैं। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे एक मजदूर का बेटा दाउद की टक्कर पर खड़ा हो गया और मुंबई उसके नाम से कांपने लगी।

डैडी‬: अर्जुन रामपाल ने निभाया जिस ‪अरुण गवली का किरदार, पढ़िए उसके डॉन बनने की कहानी

अर्जुन ने दिलाई गवली की याद

अर्जुन ने दिलाई गवली की याद

अर्जुन रामपाल ने 'डैडी' के ट्रेलर में छाप छोड़ी है। फिल्म के ट्रेलर के बाद गवली के बारे में भी लोग जानने चाहते। मुंबई के लोगों के लिए तो गवली एक जाना-पहचाना नाम है, लेकिन फिल्म बनने के बाद सभी की उसके लिए उत्सुकता बढ़ रही है। आइए जानते हैं कि कैसे एक मजदूर का बेटा मुंबई का डॉन और नेता बना।

मध्य प्रदेश से आए थे गवली के पिता

मध्य प्रदेश से आए थे गवली के पिता

अरुण गवली के पिता गुलाबराव मध्यप्रदेश के खंडवा जिले से काम की तलाश में मुंबई पहुंचे थे। 60 के दशक में अरुण के पिता ने मुंबई में मजदूरी की। अरुण बड़ा हुआ तो पिता गरीबी की वजह से पढ़ ना सका और 5वीं में ही उसको स्कूल छोड़ना पड़ा। अरुण ने परिवार के साथ घर-घर जाकर दूध बेचना शुरू कर दिया।

70 के दशक में रखा अंडरवर्ल्ड में कदम

70 के दशक में रखा अंडरवर्ल्ड में कदम

मुंबई में 70 के दशक में अंडरवर्ल्ड का प्रभाव बढ़ रहा था।इन दिनों में अपराध की दुनिया में कई नाम उभरे इन्ही में एक दगली चॉल में रहने वाले अरुण गवली का भी था। 1980 के दशक में वो अपराध की दुनिया का बड़ा नाम बन चुका था। वो राम नाइक की गैंग से जुड़ा और दाऊद के कनसायमेंट की देख-रेख का काम करने लगा। इसी दौरान उसके साथी उसे डैडी नाम से पुकारने लगे थे और आगे चलकर गवली को डैडी के नाम से ही पहचाना जाने लगा।

दाउद और राजन के भागने के बाद किया राज

दाउद और राजन के भागने के बाद किया राज

1993 में हुए मुंबई बम धमाकों के बाद इब्राहिम दुबई भाग गया। छोटा राजन और अंडरवर्ल्ड के दूसरे कई बड़े नाम भी मुंबई से भाग गए। ऐसे में दगली चॉल से निकलकर गवली का राज पूरे मुंबई पर फैल गया। 1990 में टाडा कोर्ट द्वारा गवली को सजा सुनाए जाने के बाद उसे पुणे की यरवदा जेल में रखा गया था। वह यरवदा जेल के अंदर से फिरौती और कांट्रेक्ट किलिंग जैसे कामों को अंजाम देता था। जेल के अंगर से ही उसका नेटवर्क चलता रहा और मुंबई में उसका खौफ बढ़ता ही गया। ये वो दौर था, जब मुंबई में पुलिस अंडरवर्ल्ड के लोगों के लगातार एनकाउंटर कर रही थी। उसे भी अहसास हो गया था कि अपराध की दुनिया मे उसके लिए रहना अब मुश्किल होगा। ऐसे में जेल से निकलते ही उसने एक बड़ा काम किया।

जेल से छूटकर बनाई राजनीतिक पार्टी

जेल से छूटकर बनाई राजनीतिक पार्टी

वह पुणे की यरवदा जेल में 2004 तक रहा। जेल से निकलने के बाद गवली ने पॉलिटिक्स में आने का फैसला लिया और अपनी पार्टी 'अखिल भारतीय सेना' तैयार की। गवली को राजनीति में एक समय तक शिवसेना का समर्थन मिलता रहा। बाल ठाकरे ने यहां तक कहा था कि पाकिस्तान के पास अगर दाऊद है तो हमारे पास गवली। हालांकि बाद में उसके शिवसेना से रिश्ते खराब हो गए। अपनी पार्टी से लड़कर गवली 2004 चिंपपोकली से विधायक बन गया।

हत्या के मामले में पहली बार हुई सजा

हत्या के मामले में पहली बार हुई सजा

विधायक बन जाने के बाद अरुण ने कहा था कि अब वो विधायक बन गया है पुलिस उसे नहीं मार सकती। 2008 में शिवसेना कॉरपोरेटर कमलाकर जामसांडेकर की हत्या में गवली का नाम आया। इस मामले में अदालत ने आरोपी बनाए गए अरुण गवली को दोषी मानते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई. 2102 में हाई कोर्ट ने भी इसे बरकरार रखा. यह पहली मौका था जब गवली को किसी अदालत ने दोषी मानकर सजा सुनाई। गवली अभी जेल में सजा काट रहा है।

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