Centre vs Delhi: दिल्ली में ट्रांसफर पोस्टिंग पर मचा है घमासान, केंद्र व दिल्ली सरकार के बीच खींचतान

Centre vs Delhi: 23 जून 2023 को पटना में कांग्रेस, टीएमसी, शिवसेना, जदयू, राजद, एनसीपी, सपा और आम आदमी पार्टी समेत लगभग 15 दलों ने तकरीबन 4 घंटे की मैराथन बैठक की। बैठक में हिस्सा लेने पहुंचे आम आदमी पार्टी के मुखिया अरविंद केजरीवाल और पंजाब के मुख्यमंत्री भगवंत मान अचानक बैठक छोड़कर चले गये। इस पर पार्टी की तरफ से बयान दिया गया कि पटना की बैठक में समान विचारधारा वाली 15 पार्टियां शामिल हुईं थी। इनमें से 12 का प्रतिनिधित्व राज्यसभा में है। कांग्रेस को छोड़कर बाकी सभी दलों ने दिल्ली में लाये जाने वाले 'काले' अध्यादेश के खिलाफ अपना रुख स्पष्ट किया है। वे सभी दल राज्यसभा में अध्यादेश का विरोध करेंगे। लेकिन, कांग्रेस ने अध्यादेश को लेकर अपना रुख अभी तक सार्वजनिक नहीं किया है।

विवाद की जड़ क्या है?

दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने 2015 में एक आदेश दिया कि जमीन, पुलिस और कानून व्यवस्था से जुड़ी सभी फाइलें पहले उनके पास आनी चाहिए। इसके बाद उन्हें एलजी के पास भेजा जाये। तत्कालीन उपराज्यपाल नजीब जंग ने इस आदेश को नहीं माना। साथ ही उपराज्यपाल ने दिल्ली सरकार की तरफ से नियुक्त किये गये अधिकारियों की नियुक्ति को रद्द कर दिया। उपराज्यपाल ने कहा कि नियुक्ति का अधिकार उनके पास है।

Center and the Delhi government ruckus over transfer posting in Delhi.

यहां से अफसरों की नियुक्ति और तबादले का मामला उठा। केजरीवाल सरकार ने हाईकोर्ट का रुख किया और अगस्त 2016 में दिल्ली हाईकोर्ट ने फैसला सुनाया कि दिल्ली में उपराज्यपाल ही असली 'बॉस' हैं। प्रशासनिक मामलों में उपराज्यपाल की सहमति जरूरी है। इसलिए मंत्रिमंडल कोई भी फैसला लेने से पहले उसे उपराज्यपाल को भेजेगा।

सुप्रीम कोर्ट की बेंच भी समाधान में फेल

दिल्ली हाईकोर्ट के फैसले को दिल्ली सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी। इसके बाद मामले की लंबी सुनवाई चली और 4 जुलाई 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र बनाम दिल्ली विवाद के कई मसलों पर फैसला सुनाया लेकिन सर्विसेज यानी अधिकारियों पर नियंत्रण जैसे कुछ मुद्दों को आगे की सुनवाई के लिए छोड़ दिया था। इसके बाद दोनों के बीच विवाद जारी रहा और 14 फरवरी 2019 को इस मसले पर 2 जजों की बेंच ने फैसला दिया। मगर दोनों जजों जस्टिस ए.के. सीकरी और जस्टिस अशोक भूषण के मत अलग-अलग थे।

जस्टिस सीकरी ने अपने फैसले में कहा कि सरकार में निदेशक स्तर की नियुक्ति दिल्ली सरकार कर सकती है। जबकि जस्टिस भूषण का फैसला उलट था, उन्होंने अपने फैसले में कहा कि दिल्ली सरकार के पास सारी कार्यकारी शक्तियां नहीं हैं। अधिकारियों के तबादले-नियुक्ति के अधिकार उपराज्यपाल के पास होने चाहिए।

इस बेंच में मतभेद के बाद असहमति वाले मुद्दों को तीन जजों की बेंच के पास भेजा गया। फिर 2022 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से अपील कर कहा कि मामला बड़ी संवैधानिक बेंच को भेजा जाये क्योंकि यह देश की राजधानी के अधिकारियों से जुड़ा मसला है। इसके बाद यह फैसला पांच जजों की संवैधानिक बेंच को भेजा गया। जिसमें चीफ जस्टिस डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली बेंच में जस्टिस एम.आर. शाह, कृष्णा मुरारी, हिमा कोहली और पी.एस. नरसिम्हा शामिल हैं।

केजरीवाल सरकार को मिली राहत

11 मई 2023 को चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया डी.वाई. चंद्रचूड़ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संवैधानिक बेंच ने दिल्ली सरकार के पक्ष में एक फैसला सुनाया था। इस फैसले में कहा गया कि सार्वजनिक व्यवस्था, पुलिस और भूमि संबंधित सेवाओं को छोड़कर बाकी अधिकार दिल्ली सरकार को दिये जाने चाहिए। सभी अधिकारियों की पोस्टिंग और ट्रांसफर का अधिकार लोकतांत्रिक रूप से चुनी हुई सरकार के पास होंगे। उपराज्यपाल को दिल्ली सरकार की सलाह से ही काम करना होगा।

केंद्र सरकार के अध्यादेश का विवरण

सुप्रीम कोर्ट के फैसले के खिलाफ केंद्र सरकार 19 मई की देर शाम एक अध्यादेश ले आयी। इस अध्यादेश के तहत तबादले और नियुक्ति से जुड़ा मामला उपराज्यपाल को हस्तांतरित कर दिया गया। केंद्र सरकार राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र दिल्ली (संशोधन) अध्यादेश, 2023 लेकर आयी है। इसके तहत दिल्ली में सेवा दे रहे 'दानिक्स' कैडर के 'ग्रुप-ए' अधिकारियों के तबादले और उनके संबंधित अनुशासनात्मक कार्रवाई के लिए 'राष्ट्रीय राजधानी लोक सेवा प्राधिकरण' गठन किया जायेगा।

इस प्राधिकरण में तीन सदस्य होंगे। जिसमें दिल्ली के मुख्यमंत्री, दिल्ली के मुख्य सचिव और दिल्ली के गृह प्रधान सचिव शामिल होंगे। साथ ही दिल्ली के मुख्यमंत्री को इस प्राधिकरण का अध्यक्ष बनाया गया है। इस प्राधिकरण को सभी ग्रुप A और दानिक्‍स (दिल्ली, अंडमान एवं निकोबार द्वीपसमूह सिविल सेवा) के अधिकारियों के तबादले और नियुक्ति से जुड़े फैसले लेने का हक तो होगा लेकिन अंतिम फैसला लेने का हक उपराज्यपाल को दिया गया है। अगर इस फैसले पर कोई मतभेद की स्थिति बनती है तो अंतिम फैसला उपराज्यपाल का ही मान्य होगा।

अध्यादेश को लेकर केंद्र का कहना है कि दिल्ली देश की राजधानी है। कई महत्वपूर्ण राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय संस्थान और अथॉरिटी जैसे राष्ट्रपति भवन, संसद, सुप्रीम कोर्ट दिल्ली में हैं। संवैधानिक पदाधिकारी जैसे सभी देशों के राजनयिक दिल्ली में रहते हैं और अगर कोई भी प्रशासनिक भूल होती है तो इससे पूरी दुनिया में देश की छवि धूमिल होगी। इसलिए दिल्ली का सम्पूर्ण प्रशासन दिल्ली सरकार को नहीं सौंपा जा सकता।

दिल्ली सरकार मतलब उपराज्यपाल

जब दो जजों के फैसले के बाद पांच जजों की बेंच को मामला ट्रांसफर किया गया था तो इस बीच अप्रैल 2021 में केंद्र सरकार संसद में एक विधेयक ले आयी। जिसमें उपराज्यपाल और दिल्ली सरकार की शक्तियों को परिभाषित किया गया था। इस विधेयक में साफतौर पर कहा गया कि दिल्ली में सरकार का मतलब उपराज्यपाल ही होगा। तर्क दिया गया कि दिल्ली राष्ट्रीय राजधानी है और यहां की सरकार को पूर्ण राज्य की सरकार जैसे अधिकार कतई नहीं दिये जा सकते।

आम आदमी पार्टी के भारी हंगामे के बीच 'गवर्नमेंट ऑफ नेशनल कैपिटल टेरिटरी ऑफ दिल्ली बिल 2021' ससंद के दोनों सदनों से पास हो गया। बाद में इसे भी नोटिफाई किया गया और केजरीवाल सरकार ने इस कानून को भी सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी हुई है।

आखिर कौन जारी करता अध्यादेश?

संविधान के अनुच्छेद 123 के मुताबिक राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी करने का उल्लेख है। अगर कोई ऐसा विषय हो जिस पर तत्काल कानून बनाने की जरूरत हो और उस समय संसद नहीं चल रही हो तो अध्यादेश लाया जा सकता है। इस अध्यादेश का प्रभाव उतना ही होगा, जितना संसद से पारित किया गया कानून। यह केंद्रीय मंत्रिमंडल की सलाह पर राष्ट्रपति द्वारा अध्यादेश जारी किया जाता है। हालांकि, इसे कभी भी राष्ट्रपति द्वारा वापस लिया जा सकता है।

अब मामला यह है कि कानून बनाने का अधिकार संसद के पास है। ऐसे में अध्यादेश को संसद की मंजूरी जरूरी है। इसलिए लागू किये गये अध्यादेश को संसद में छह सप्ताह के भीतर पारित कराना होता है। हालांकि, सदन के दो सत्रों के बीच अधिकतम अंतराल 6 महीनों का हो सकता है। इसलिये अध्यादेश का अधिकतम 6 महीने और 6 सप्ताह तक लागू रह सकता है।

राज्यों में राज्यपाल द्वारा अध्यादेश जारी किये जा सकते हैं। इसके लिए संविधान के अनुच्छेद 213 में व्यवस्था की गयी है। शर्तें वही रहती हैं कि विधानसभा का सत्र न चल रहा हो। अध्यादेश को जारी करने के छह महीने के भीतर विधानसभा से पारित भी कराना होता है।

दिल्ली अन्य राज्यों से अलग कैसे?

दिल्ली एक केंद्र शासित प्रदेश है, लेकिन बाकी केंद्र शासित प्रदेशों से यहां के कुछ नियम अलग हैं। साल 1991 में संविधान में संशोधन किया गया था, जिसके बाद अनुच्छेद 239AA और 239AB प्रभाव में आया था। दिल्ली में इन्हीं दोनों अनुच्छेद के तहत प्रशासनिक काम होता है। बाकी केंद्र शासित प्रदेशों में अनुच्छेद 239 लागू होता है।

अनुच्छेद 239AA के तहत दिल्ली का प्रशासक उपराज्यपाल को माना गया है। इस अनुच्छेद के तहत दिल्ली सरकार कानून व्यवस्था, पुलिस और भूमि से जुड़े मामलों में कुछ नहीं कर सकती है। केंद्र सरकार ही इन तीनों व्यवस्थाओं को देखेगी। सरकार के साथ किसी भी तरह के मतभेद होने पर उपराज्यपाल मामले को राष्ट्रपति को भेज सकते हैं। जबकि अनुच्छेद 239AB में आपातकाल की स्थिति का जिक्र है। अगर दिल्ली में कुछ ऐसा होता है, जिससे आपातकाल लगाने की संभावनाएं बनती हैं तो इसके तहत उपराज्यपाल, राष्ट्रपति से आपातकाल की सिफारिश कर सकते हैं।

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