Caste Politics: जब अंग्रेजों ने करायी थी जातिगत जनगणना

'नाम-धाम कुछ कहो, बताओ कि तुम जाति हो कौन?' कर्ण पर लिखी गई राष्ट्रकवि रामधारी सिंह दिनकर की ये पंक्तियां आज की जातिगत सियासत पर एकदम फिट बैठती है। जो गाँधी, जातिवादी राजनीति के खिलाफ थे, उन्हीं के जन्म दिन 2 अक्टूबर को बिहार सरकार के मुख्य सचिव ने बिहार की जातीय जनगणना के आंकड़े विस्तार रूप से जारी कर दिए। बिना देरी किए आरजेडी प्रमुख ने यह नारा दुहरा दिया कि जिसकी जितनी आबादी उसकी उतनी भागीदारी। कांग्रेस नेता राहुल गाँधी ने भी ताल ठोक दी कि उनकी सरकार बनी तो पहला फैसला कास्ट सेंसस का ही होगा। क्या आप जानते हैं कि जातिगत जनगणना सबसे पहले कब हुई और पिछड़ों की राजनीति देश में आगे कैसे बढ़ी?

caste census

1931 में अंग्रेजों ने कराई थी जातिगत जनगणना
साल 1931 में जब बिहार, झारखंड और उड़ीसा (अभी ओडिशा) एक साथ थे, तब जाति जनणगना रियासतों के आधार पर हुई थी। कुल 97 जातियों की संख्या जिले के साथ प्रकाशित की गई थी। वर्णित 97 में से 14 जातियां-बेटकट, चासा, गदबा, गंडा, घसुरिया, गोडरा, गोरवा, इरिका, कंदरा केला, कोली, कोलता, महुरिया और मांगन अब ओडिशा में रहती हैं। मतलब ये कि साल 1931 में बिहार और झारखंड में 83 जातियां ही रहती थीं।

इस लिहाज से आज के दौर में देखें तो बिहार सरकार ने जो जातीय जनगणना के लिए 214 जातियों को कोड दिया है, उसमें 29 मुस्लिम समुदाय की जातियों का उल्लेख है। शेष बचीं 185 जातियों में से अगर 83 जातियों को निकाल दे तो 102 जातियों का उल्लेख साल 1931 की जनगणना के समय था ही नहीं। ये 102 जातियां कब और किसने बनाईं, वर्तमान बिहार सरकार ने नहीं बताया है? साल 1931 की जनगणना में जातीय जनगणना के आंकड़े अगड़े-पिछड़े के रूप में नहीं, बल्कि अंग्रेजी वर्णमाला के अनुसार दिखाए गए थे। फिर अगड़ों -पिछड़ों की राजनीति कैसे हावी हुई?

गोलमेज सम्मेलन और जातीय जनगणना
साल 1931 में हुई जातीय जनगणना का संबंध अंग्रेजों के गोलमेज सम्मेलन (1930-32) से जुड़ा है। इस सम्मेलन के बाद ब्रिटिश शासकों ने अछूत जातियों के लिए अलग से एक अनुसूची बनाई थी। इन्हें प्रशासनिक सुविधा के लिए अनुसूचित जातियों का नाम दे दिया गया। बड़ी बात यह हुई कि आजादी के बाद भारतीय संविधान में भी इस व्यवस्था को बनाए रखा गया। इसके लिए संवैधानिक (अनुसूचित जाति) आदेश, 1950 जारी किया गया। इसमें भारत के 29 राज्यों की 1108 जातियों के नाम शामिल किए गए और इसे अमली जामा पहनाने के लिए संविधान में व्यवस्था की गई।

संविधान सभा में पिछड़ों पर हुई जोरदार बहस
तब भारत के संविधान को बनाने की प्रक्रिया में आरक्षण के मसले पर संविधान सभा में काफी विस्तार से चर्चा की गई। 30 नवम्बर, 1948 को संविधान सभा की बैठक में धारा-10 में अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए नौकरियों में आरक्षण का प्रावधान रखा गया था लेकिन सिर्फ एक वोट के अंतर से प्रस्ताव खारिज हो गया। तब डॉ. भीमराव अंबेडकर ने अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति की जगह 'पिछड़ा वर्ग' शब्द का इस्तेमाल किया था।

इस शब्द का जिक्र आते ही टी. टी. कृष्णामाचारी ने खड़े होकर पूछा कि क्या मैं जान सकता हूं कि भारत के किन नागरिकों को पिछड़ा समुदाय कहा जाए? इस पर ए. ए. गुरूंग ने भी टिप्पणी करते हुए कहा कि इसमें अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति को तो शामिल किया गया है पर शैक्षणिक और आर्थिक रूप से पिछड़ों को नहीं।

वहीं कन्हैया माणिकलाल मुंशी ने कहा कि बंबई में कई वर्षों से 'पिछड़ा वर्ग' की परिभाषा प्रचलन में है। इसके अंतर्गत अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति के अलावा आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोगों को भी शामिल किया गया है। इसीलिए इस शब्द को समुदाय विशेष तक सीमित नहीं रखना चाहिए। वहीं संविधान सभा में मैसूर से सदस्य रहे टी. चेन्नया ने कहा कि पिछड़े वर्ग को परिभाषित करने की जरूरत है क्योंकि हकीकत में ऐसा कोई समुदाय नहीं है, जिसमें आर्थिक, शैक्षणिक और सामाजिक रूप से पिछड़े लोग मौजूद न हों।

तब जाकर यह कहा गया कि आरक्षण, कोई गरीबी उन्मूलन कार्यक्रम नहीं है। यह छुआछूत जैसे जातिगत भेद को मिटाने का एक जरिया है, और इस तरह संविधान में जातिगत आरक्षण की व्यवस्था की गई। एससी, एसटी को आरक्षण दिया गया। इसलिए साल 1951 में संविधान के अनुच्छेद-15 में संशोधन कर धारा-दो में उपधारा-चार एवं पांच को जोड़ा गया। यह सामाजिक-शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए लोगों को राष्ट्र की मुख्यधारा में लाने के लिए राज्य को विशेष उपबंध करने की शक्ति प्रदान करता है। वहीं अनुसूचित जाति एवं जनजाति के अलावा पिछड़ा वर्ग का यह क्रम आगे बढ़कर पिछड़ा और अति पिछड़ा हुआ।

कभी सामान्‍य वर्ग में शामिल थे ओबीसी?
साल 1991 में अन्य पिछड़ा वर्ग यानी ओबीसी अस्तित्व में आया था। इससे पहले तक ये सामान्य वर्ग की श्रेणी में आते थे। ओबीसी कैटेगरी में सामान्‍य वर्ग की उन जातियों को शामिल किया गया, जो गरीबी और शिक्षा के स्‍तर पर पिछड़ी हुई थीं। भारतीय संविधान में ओबीसी सामाजिक व शैक्षणिक पिछड़ा वर्ग यानी एसईबीसी के तौर दर्ज किया गया। इसी के तहत ओबीसी वर्ग को सरकारी नौकरी और उच्च शिक्षा के क्षेत्र में 27% आरक्षण दिया जाता है। ओबीसी में नई जातियों को उनके सामाजिक, शैक्षिक और आर्थिक कारकों के आधार पर जोड़ा या हटाया जा सकता है।

जाति आधारित आरक्षण की आग में कई बार जला है देश
साल 1989 में जब मंडल आयोग की सिफारिशों के अनुसार जब अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) के लिए 27 प्रतिशत के आरक्षण का प्रावधान किया गया तो इस आरक्षण के खिलाफ पूरे देश में हिंसक आंदोलन शुरू हो गया था। पूरे देश में युवा सड़कों पर आ गए और 100 से भी अधिक युवाओं ने अलग अलग शहरों में आत्मदाह का प्रयास किया, जिनमें अधिकांश को बचाया नहीं जा सका।

ओबीसी की लिस्ट बढ़ती ही जा रही है
चूंकि ओबीसी की परिभाषा सामाजिक और शैक्षणिक दृष्टि से पिछड़े हुए लोगों को चिन्हित करने से जुड़ी है, इसलिए राजनीतिक रूप से ताकतवर जातियों द्वारा खुद को ओबीसी में शामिल किए जाने की मांग उठती रही है। कई बार यह मांग राजनीतिक आंदोलन से आगे बढ़ कर हिंसक मार्ग पकड़ लेती है। कभी सत्ता में आने के लिए तो कभी सत्ता में बने रहने के लिए भी समुदायों या जातियों को ओबीसी में शामिल करने का फैसला लिया जाता है।

2014 के बाद से केंद्र ने बिहार, हिमाचल, झारखंड, मध्यप्रदेश और जम्मू कश्मीर के 16 नए समुदायों को ओबीसी की सूचि में शामिल किया है। अभी भी कई राज्यों में कुछ जातियों द्वारा आरक्षण के लाभ के लिए खुद को ओबीसी की सूचि में शामिल किये जाने के लिए आंदोलन चलाया जा रहा है। गुजरात के पाटीदार, राजस्थान के गुज्जर, हरियाणा के जाट, असम की चाय जनजाति और सबसे हालिया महाराष्ट्र के मराठा व धनगड़ समुदाय जैसे प्रभावशाली समुदाय का आंदोलन शामिल है।

अभी कई पेंच हैं इस ओबीसी आरक्षण के खेल में
पिछड़ों की राजनीति के खिलाडियों का कहना है कि ओबीसी की जनसंख्या कुल जनसंख्या का 41 प्रतिशत है (राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण संगठन 2006 के अनुसार ) इसलिए लोकसभा, राज्य विधानसभाओं और स्थानीय सरकारों में उनका प्रतिनिधित्व भी उतना ही होना चाहिए। वे एससी और एसटी के लिए आरक्षण की तरह ही लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में ओबीसी के लिए भी अलग कोटा की मांग कर रहे हैं। उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र जैसी कई राज्य सरकारों ने उन्हें स्थानीय निकाय चुनावों में प्रतिनिधित्व प्रदान किया है।

सुप्रीम कोर्ट ने समग्र आरक्षण पर 50 प्रतिशत की सीमा लगा रखी है (विकास किशनराव गवली बनाम महाराष्ट्र राज्य) जिसके कारण ओबीसी आरक्षण अभी 27 प्रतिशत तक सीमित है। 17वीं लोकसभा में ओबीसी समुदाय से लगभग 120 सांसद हैं, जो लोकसभा की कुल ताकत का लगभग 22 प्रतिशत है। अब देखना है कि आने वाले समय में यह जातिगत आधार पर राजनीति का ऊंट किस करवट बैठता है।

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