Caste Census in India: बिहार में जातिगत जनगणना शुरू, लेकिन सरदार पटेल ने इसका विरोध किया था

देश में जातिगत जनगणना की शुरुआत 1881 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान हुई थी। स्वतंत्रता के बाद से एससी और एसटी को छोड़कर किसी अन्य वर्ग की ऐसी कोई गणना नहीं हुई हैं।

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Caste Census in India: बिहार में जातिगत जनगणना की शुरुआत हो गयी है। यह गणना दो चरणों में होगी। पहले चरण को पूरा करने का लक्ष्य 21 जनवरी तक रखा गया है। इस चरण में लोगों के घरों एवं परिवारों की गिनती होगी। जबकि, दूसरा चरण 1 अप्रैल से 30 अप्रैल तक चलेगा। इस चरण में जातिगत जनगणना के साथ-साथ आर्थिक स्थिति से संबंधित आंकड़े भी एकत्रित किये जायेंगे।

घरों की गणना की शुरुआत करते हुए बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने कहा कि जनगणना की रिपोर्ट केंद्र सरकार को भी भेजी जाएगी। उन्होंने कहा कि सभी राजनैतिक दलों की सहमति से ही जातिगत जनगणना का काम शुरू हुआ है। उनका कहना है कि उन्होंने केंद्र सरकार से भी गणना कराने का आग्रह किया था, लेकिन वे इसके लिए तैयार नहीं हुए।

बिहार के उपमुख्यमंत्री तेजस्वी यादव ने कहा कि जातिगत जनगणना के बाद हमारे पास सही और वैज्ञानिक आंकड़ा होगा, जिसके हिसाब से बजट का स्वरूप बनेगा और उसी के अनुसार योजनाएं बनाई जाएगी। हालांकि, भाजपा की बिहार ईकाई भी परोक्ष रूप से जातिगत जनगणना का समर्थन कर रही है। गौरतलब है कि जातिगत जनगणना की प्रक्रिया को पांच महीनों में पूरी करने की योजना है और इस पर 500 करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है। यह खर्च राज्य सरकार के फंड से होगा।

क्या राज्य सरकारों को अधिकार है जनगणना करने का

संविधान की 7वीं अनुसूची के तहत जनगणना का काम केंद्र के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे में राज्य सरकार अगर कोई गणना कराती भी है तो उसे जनगणना नहीं कहा जा सकता। बल्कि, यह आंकड़ा संकलन तक ही सीमित रह जायेगा।

जातिगत जनगणना कराने से केंद्र का इंकार

सितंबर 2021 में केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में एक हलफनामा दायर कर कहा था कि जनगणना में ओबीसी (Other Backward Caste) की गिनती करना प्रशासनिक रूप से जटिल काम है और ऐसी जानकारी को जनगणना से बाहर रखना एक नीतिगत निर्णय है। इस हलफनामे में कहा गया था कि 2011 में हुई सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना में काफी त्रुटियां थीं।

गौरतलब है कि केंद्र सरकार ने यह हलफनामा महाराष्ट्र सरकार की ओर से दाखिल एक याचिका के जवाब में दायर किया था। जिसमें केंद्र सरकार से 2011 की सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना के आंकड़े को जारी करने की मांग की गई थी।

इसके अतिरिक्त, जुलाई 2021 में केंद्रीय गृह राज्यमंत्री नित्यानंद राय ने लोकसभा में एक सवाल के जवाब में कहा कि 2021 की जनगणना में केंद्र सरकार सिर्फ एससी और एसटी वर्ग के लोगों की ही गिनती कराने के पक्ष में हैं। दिसंबर 2022 में भी डीएमके के सांसद ए. गणेश मूर्ति के सवाल के जवाब में नित्यानंद राय ने लोकसभा में बताया कि स्वतंत्रता के बाद केंद्र सरकार ने कभी जातिगत जनगणना नहीं कराई है। जनगणना में सिर्फ एससी और एसटी की ही गिनती होती आई है।

इससे पहले, बिहार विधानमंडल के दोनों सदनों में दो बार (2019 और 2020 में) जातिगत जनगणना के पक्ष में सर्वसम्मति से प्रस्ताव पारित कर इसे केंद्र सरकार को भेजा गया था। इसके अतिरिक्त, अगस्त 2021 में मुख्यमंत्री नीतीश कुमार के नेतृत्व में बिहार से 11 सदस्यीय सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल ने जातिगत जनगणना के मुद्दे पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से भी मुलाकात की थी।

आजादी से पहले जातिगत जनगणना की स्थिति

भारत में पहली बार जातिगत जनगणना 1881 में ब्रिटिश शासनकाल के दौरान हुई थी और उसके आंकड़े भी जारी किये गये थे। यह सिलसिला 1931 की जनगणना तक चला। हालांकि, इन जातिगत जनगणनाओं में सभी जातियों को शामिल न कर कुछ ही जातियों को शामिल किया गया था। सभी जातियों को शामिल न करने का कारण आर्थिक था। फिर 1941 की जनगणना में जातिगत जनगणना तो हुई, लेकिन इसके आंकड़े जारी नहीं किए गए। इस दौरान, हिन्दू महासभा ने 1910 में सेंसस कमिश्नर से मिलकर हिन्दुओं में जातिगत जनगणना को खत्म करने का ज्ञापन सौंपा था। अकोला, महाराष्ट्र में 13वीं अखिल भारतीय हिन्दू महासभा में भी जातिगत जनगणना के विरोध में एक प्रस्ताव पारित किया गया था।

संविधान सभा में प्रस्ताव

स्वाधीन भारत में सेंसस बिल 18 अगस्त 1948 को संविधान सभा में सरदार पटेल ने पेश किया था। उनके इस बिल पर सभा के सदस्य बसंता कुमार दास ने प्रस्ताव पेश किया कि जनगणना से जाति का कॉलम अब समाप्त कर देना चाहिए। उन्हें संविधान सभा की दो महिला सदस्यों - दुर्गाबाई और रेणुका रे का समर्थन मिला। इसके अलावा, हुकुम सिंह और महावीर त्यागी ने भी बसंता कुमार दास के प्रस्ताव का समर्थन किया।

आखिरकार, सरदार पटेल ने इसके जवाब में कहा कि जो मैंने बिल पेश किया है इसमें जाति और पंथ की कोई जगह ही नहीं हैं। दरअसल, सरदार पटेल का स्पष्ट मानना था कि अगर हम इस बिल के सन्दर्भ में जातियों की बात करते है तो इसका मतलब है कि भारत में जातियां आज भी मौजूद हैं। इस प्रस्ताव से जातियों की समस्या हल नहीं होगी उसके लिये अलग से ही एक प्रस्ताव पेश करना चाहिए जोकि जातियों को ही समाप्त करने की बात करता हो।

स्वाधीनता के बाद जातिगत जनगणना

स्वाधीनता के बाद 1951 से लेकर 2011 तक हुई सभी जनगणनाओं में केंद्र सरकार सिर्फ एससी (Scheduled Castes) और एसटी (Scheduled Tribes) के आकंड़े इकठ्ठा करती हैं। प्रधानमंत्री विश्वनाथ प्रताप सिंह के कार्यकाल में मंडल आयोग की सिफारिशों को लागू करके पिछड़े वर्ग को आरक्षण देने का फैसला किया, तो उस समय भी 1931 की जनगणना को ही आधार मानकर देश में ओबीसी की जनसंख्या 52 प्रतिशत मानी गयी थी।

1998 में प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के कार्यकाल में कानून एवं न्याय मंत्री एम थाम्बी दुराई ने लोकसभा में कहा था कि केंद्र सरकार ने जातिगत जनगणना पर कोई निर्णय नहीं लिया है। यही नहीं, कांग्रेस के नेतृत्व वाली यूपीए सरकार में गृह मंत्री पी. चिदंबरम ने भी 7 मई 2010 को लोकसभा में जातिगत जनगणना को अस्वीकृति दी थी। हालांकि, 8 मई 2010 को द हिन्दू की एक खबर के अनुसार तत्कालीन वित्त मंत्री प्रणब मुखर्जी जातिगत जनगणना के पक्ष में थे। जब मामला आगे बढ़ा तो प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने ससंद में कहा था कि जल्दी ही केंद्रीय मंत्रिमंडल में इस पर फैसला होगा।

मुलायम सिंह यादव, शरद यादव और लालू प्रसाद यादव के दबाव पर यूपीए सरकार ने 2011 के जनगणना के दौरान सामाजिक, आर्थिक और जातिगत जनगणना कराई थी। मगर, इसके आंकड़े जारी नहीं किये गये। अगस्त 2014 में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार में केंद्रीय मंत्री उपेन्द्र कुशवाह ने बताया कि साल 2011 के जातिगत सर्वे में काफी त्रुटियां थीं और उन्हें जल्दी ही ठीक करवाया जायेगा। आखिरकार, 2016 में केंद्र सरकार ने इस जनगणना से संबंधित जाति के आंकड़े को छोड़कर बाकी सभी आंकड़े जारी कर दिए।

कर्नाटक में भी हो चुकी है जातिगत जनगणना

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    साल 2015 में कर्नाटक की तत्कालीन कांग्रेस सरकार ने जातिगत जनगणना का काम कराया था। इस जनगणना में 150 करोड़ रुपये खर्च किये गये। इस जनगणना के आंकड़ों में त्रुटि की वजह से सरकार ने इसके आंकडे को प्रकाशित नहीं किया। इस जनगणना में अधिकांश लोगों ने उपजाति का नाम जाति के कॉलम में दर्ज कराया था। इस कारण कर्नाटक में 192 से अधिक नई जातियां सामने आईं। जहां एक ओर, इस जनगणना में ओबीसी की संख्या में भारी वृद्धि हुई, वहीं दूसरी ओर, लिंगायत और वोक्कालिगा जैसे प्रभावी समुदाय के लोगों की संख्या घट गई। जब इस पर विवाद हुआ तो सिद्धारमैया सरकार ने इस रिपोर्ट को सार्वजनिक नहीं किया।

    यह भी पढ़ें: Caste Census in Bihar: जाति जनगणना के बहाने राजनीतिक तिकड़म साधने की कोशिश

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