BJP in North East: पूर्वोत्तर में बीजेपी के लिए मणिपुर अभिशाप बनेगा या फिर मोदी का सिक्का चलेगा?
BJP in North East: लगभग एक साल से मणिपुर में जारी हिंसा से क्या भाजपा और उसके सहयोगियों को पूर्वोत्तर में लोकसभा के चुनाव में इस बार मुश्किल होने वाली है, या फिर बीजेपी 2019 की ही तरह 2024 में भी कोई बड़ी जीत हासिल करेगी।
पूर्वोत्तर में कुल 25 लोक सभा की सीटें है, जिनमें से बीजेपी ने 14 और सहयोगियों ने चार सीटें जीती थीं। यानी एनडीए के खाते में कुल 25 लोकसभा सीटों में से 18 सीटें आई थी।

उल्लेखनीय है कि 3 मई 2023 को मणिपुर में इम्फाल घाटी में रहने वाले बहुसंख्यक मैतेई लोगों और आसपास की पहाड़ियों में बसे कुकी समुदाय के बीच जातीय हिंसा भड़क उठी थी और अभी तक हिंसा में 300 से अधिक लोग मारे जा चुके हैं। विपक्ष मणिपुर को लेकर मोदी की सरकार पर लगातार हमलावर रहा है, और आगामी लोक सभा चुनाव में इसे नॉर्थ ईस्ट में बड़ा मुद्दा बनाने वाला है।
2024 चुनाव पूर्वोत्तर के लिए अहम
हालांकि केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह मणिपुर को लेकर काफी सक्रिय रहते हैं और वहाँ बैठकों का दौर भी जारी रखते हैं। पूर्वोत्तर में भाजपा विकास और नागरिकता (संशोधन) बिल सीएए को बड़ा मुद्दा बनाकर चुनाव लड़ने जा रही है। 2014 में बीजेपी ने असम में सात और अरुणाचल प्रदेश में एक सीट जीती थी जबकि कांग्रेस ने असम में तीन और शेष पूर्वोत्तर में पांच सीटें जीती थीं।
2024 का यह चुनाव काफी महत्वपूर्ण होने वाला है, क्योंकि 2026 में परिसीमन आयोग का मौजूदा कार्यकाल खत्म हो जाएगा और देश में नए सिरे से संसदीय क्षेत्रों के गठन की प्रक्रिया शुरू हो जाएगी। इसके बाद कई नए निर्वाचन क्षेत्र जुड़ने की संभावना है। पूर्वोत्तर राज्यों की बात करें तो असम में 14, अरुणाचल प्रदेश में 2, मणिपुर में 2, मेघालय में 2, त्रिपुरा में 2, मिजोरम में 1, नागालैंड में 1 और सिक्किम में 1 सीट है।
क्षेत्रफल और जनसंख्या के हिसाब से उत्तर पूर्वी राज्यों का प्रतिनिधित्व हर तरह से कम है। अरुणाचल प्रदेश में एक लोक सभा सीट का क्षेत्रफल 41,872 वर्ग किमी भूमि है, जबकि मिजोरम में 21,081 वर्ग किमी। नागालैंड में 16,579 वर्ग किमी का क्षेत्रफल एक सांसद की सीट का है।
काँग्रेस के लिए करो या मरो
कभी उत्तर-पूर्व राज्यों में एकछत्र राज करने वाली काँग्रेस इस समय वहाँ सत्ता से लगभग बाहर है। अरुणाचल में बीजेपी और एनपीपी की सरकार है तो, असम में बीजेपी और एजीपी की है, तो मणिपुर में भी बीजेपी के साथ एनपीपी और अन्य पार्टियां सरकार में हैं। मेघालय में एनपीपी यूडीपी के साथ बीजेपी है, मिजोरम में ज़ोरम पीपुल्स मूवमेंट की सरकार है तो नागालैंड में भी बीजेपी, एनडीपीपी के साथ सरकार में है।
कांग्रेस के लिए सबसे बड़ी मुसीबत यह है कि पूर्वोत्तर के उसके सभी मंजे हुए नेता पार्टी छोड़ चुके हैं। वे या तो बीजेपी से जा मिले हैं या फिर उन्होंने अपना कोई क्षेत्रीय दल बना लिया है। काँग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे और एआईसीसी महासचिव केसी वेणुगोपाल उत्तर पूर्वी राज्यों की इकाइयों को जिंदा करने में लगे हैं। अरुणाचल प्रदेश कांग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष बोसीराम सिरम जरूर सक्रिय हैं।
कांग्रेस उत्तर पूर्वी राज्यों के लिए अलग से एजेंडा तैयार कर रही है और हाल की मणिपुर हिंसा के कारण उसमें पूर्वोत्तर में लड़ने का उत्साह भी आया है। काँग्रेस विविध और समृद्ध संस्कृतियों, भाषाओं और परंपराओं को मान्यता देते हुए स्थानीय लोगों के हितों की रक्षा का मुद्दा उठाएगी। काँग्रेस उत्तर पूर्वी राज्यों को विशेष श्रेणी का दर्जा बहाल करने का भी वादा करने वाली है। सभी पूर्वोत्तर राज्यों के लिए अलग औद्योगिक नीति और नागरिकता संशोधन विधेयक को वापस लेने का भी काँग्रेस वादा कर सकती है। काँग्रेस अवैध आप्रवासन के मुद्दे को भी चुनावी मुद्दा बनाएगी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का पूर्वोत्तर प्रेम क्या परिणाम में बदलेगा?
मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार ने पिछले 10 वर्षों में पूर्वोत्तर राज्यों का कायापलट कर दिया है। निर्बाध कनेक्टिविटी से लेकर तेज बुनियादी ढांचे के विकास तक पूर्वोत्तर राज्यों ने अभूतपूर्व बदलाव देखा है। मणिपुर को छोड़ दें तो मोदी सरकार के कार्यकाल में पूर्वोत्तर क्षेत्र में शांति रही है। कई क्षेत्रों में उग्रवाद का सफाया हो चुका है और विद्रोही गुटों को वार्ता की मेज पर लाया गया है। इसमें गृह मंत्री अमित शाह की भी बड़ी भूमिका रही है।
मोदी ने ही लुक ईस्ट के बदले एक्ट ईस्ट पॉलिसी को आगे बढ़ाया। पूर्वोत्तर के विकास के लिए नई नीतियां बनाई गई, ताकि पूर्वोत्तर राज्यों में विकास की संभावनाओं को महत्वाकांक्षी परियोजना में बदल दिया जाए। पीएम मोदी पूर्वोत्तर राज्यों को भारत के दक्षिण पूर्व एशिया के प्रवेश द्वार के रूप में बदलना चाहते हैं।
पूर्वोत्तर भारत में हवाई अड्डों की संख्या में अभूतपूर्व वृद्धि हुईं है। इस क्षेत्र में हवाई अड्डों की संख्या नौ से बढ़कर 16 और उड़ानों की संख्या 2014 में 900 से बढ़कर लगभग 1900 हो गई है। कुछ पूर्वोत्तर राज्य पहली बार भारत के रेलवे मानचित्र पर आए हैं। ऐतिहासिक रूप से रोड कनेक्टिविटी बढ़ी है। सिक्किम-कलिम्पोंग-दार्जिलिंग रोड, इंफाल-मोरे खंड रोड, मणिपुर में 75.4 किमी की दो लेन, नागालैंड में दीमापुर-कोहिमा रोड, अरुणाचल प्रदेश में नागांव बाईपास से होलोंगी (167 किमी) की चार लेन और आइजोल-तुइपांग एनएच की दो लेन इनमें प्रमुख हैं।
पिछले 10 वर्षों में उग्रवाद की घटनाओं में बड़ी गिरावट देखी गई है। असम के 60 फीसदी इलाकों से सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम (AFSPA) हटा लिया गया है। अरुणाचल प्रदेश में, केवल एक जिला अफ़सपा के अंतर्गत आता है। नागालैंड में इसे सात जिलों से हटा दिया गया है और त्रिपुरा और मेघालय में भी अफ़सपा को पूरी तरह से हटा दिया गया है। ऑप्टिकल फाइबर नेटवर्क के जरिए पूर्वोत्तर में डिजिटल कनेक्टिविटी को बेहतर बनाने पर लगातार काम हो रहा है। वहां भी 5जी नेटवर्क काम करने लगा है। चुनावों में इन पर लोगों की राय जरूर सामने आएगी।












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