पत्रकार: कुछ बिक गए, कुछ मर गए!
नयी दिल्ली। ''बोल कि लब आजाद हैं तेरे'' इन पंक्तियों को लिखने के बाद फैज साहब दुनिया से चल बसे। लेकिन आज इन पंक्तियों के लिहाज से एक खेमे को तो स्वतंत्रता है लेकिन दूसरे खेमे को लब की आजादी के नाम पर इतनी दफे मौत का डर दिखाया गया है कि उसकी नजरों में इन पंक्तियों का कोई अस्तित्व ही शेष नहीं रह गया है। दरअसल हम बात कर रहे हैं राजनेता एवं पत्रकारों की। सियासत की जुबानें कितनी तंग हैं ये आप सभी बेहतर तरीके से जानते हैं। बिहार में जंगलराज, पत्रकार की गोली मारकर हत्या

लेकिन पत्रकारों को हकीकत पेश करना भी कई दफे भारी पड़ जाता है। आज असल में अभिव्यक्ति डरी हुई, सहमी हुई है। क्योंकि मौजूदा परिस्थितियों को देखकर तस्वीर साफ हो जाती है कि स्वतंत्रता को फांसी देकर दर्दनाक मौत दी जाती है। और जो मौत से बचना चाहते हैं, वे सियासत के हाथों में खुद को बेच देते हैं। जेल में शहाबुद्दीन की वो फोटो तो नहीं बनी पत्रकार राजदेव की हत्या का कारण!
विचारधाराओं की दीवार, बंट गए पत्रकार !
24 घंटों के भीतर दो पत्रकारों की हत्या बिहार और झारखंड में हुई इन दोनों घटनाओं से ये तो साफ हो जाता है कि भारत में निर्भीक का तमगा ओढ़ना वो भी पत्रकारिता के लिहाज से बेहद खतरनाक है। सरकारें मुआव्जे का ऐलान कर अपने कर्तव्य को पूरा मान लेती हैं। जबकि अपराध, अपराधी और सजा इस मामले से कोसों दूर चलता है। पिछले साल अंतर्राष्ट्रीय संगठन कमिटी टु प्रोटेक्ट जर्नलिस्ट्स ने एक रिपोर्ट जारी की थी जिसमें कहा गया था कि युद्धग्रस्त इराक और सीरिया के बाद दुनिया भर में भारत ही ऐसा देश है जहां पत्रकारों को सबसे अधिक खतरा है और जहां उनकी सबसे अधिक हत्याएं होती हैं।
कुछ बित गए, कुछ मर गए !
कहीं न कहीं ये बातें सरकारों की नाकामी, लोकतंत्र के चौथे स्तंभ की लचर स्थिति एवं पत्रकारों के अपने ही पेशे वालों के लिए ही एकजुट न होने के तथ्य को उजागर करती है। हालांकि इसकी वजह है अपने पेशे के मुताबिक तय किए गए नियमों एवं शर्तों की अनदेखी करना। खबर में जजमेंटल होना। विचारधारा का लबादा ओढ़कर किसी
की मुखालिफत और किसी की वकालत करना। जेएनयू मामले में मीडिया के दो रूप दिखे। जो वास्तव में लोगों के जहन में विश्वास जगाने के लिए किए जा रहे प्रयासों के दोयम दर्जे की ओर इशारा कर रहे थे। राष्ट्रवाद की परिभाषाओं को ढ़ालते हुए कुछ टेलीविजन पुरोधाओं ने असल मामले को लुढ़का दिया। और कन्हैया के किरदार का प्रमोशन करने में जुट गए। यकीन मानिए कन्हैया कुमार के रिश्तेदार लगने लगे। बहरहाल इन सारी बातों में आमूलचूल परिवर्तन की आवश्यकता है।
एकजुट होने की जरूरत
मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक वर्ष 1992 से लेकर 2015 तक भारत के विभिन्न भागों में 64 पत्रकारों को काम के दौरान अपनी जान गंवानी पड़ी है। इनमें से अधिकांश उन छोटे कस्बों में कार्यरत थे जहां भ्रष्टाचार का बोलबाला है और उसे उजागर करने का मतलब स्थानीय अफसरशाही, राजनीतिक नेताओं और गुंडों से दुश्मनी मोल लेना है। जबकि बड़े पत्रकारों में से कुछ जानबूझकर मुखालिफत की वजह से थप्पड़बाजी का भी शिकार हुए। तो कुछ लोगों को किसी खास के लिए एंटी का तमगा लगाने का खामियाजा सोशल मीडिया पर गाली गलौच से भी झेलना पड़ा।
सीवान में दैनिक हिंदुस्तान के पत्रकार की हत्या पत्रकार बिरादरी को एक हो जाने का संकेत दे रही है। जिससे राजदेव रंजन समेत अन्य पत्रकारों को न्याय मिल सके। सुरक्षा के लिए नियम तैयार किए जा सके। पत्रकारों की सुरक्षा के लिए किए जाने वाले दावे हवा-हवाई न हों। इन बातों पर जोर देना काफी महत्वपूर्ण है।
जनता दल के नेता पर शक की सुई
बिहार के सिवान में दैनिक हिंदुस्तान के ब्यूरो प्रमुख राजदेव रंजन भी माफिया डॉन से राजनीतिक नेता बने शहाबुद्दीन की कारगुजारियों की पड़ताल कर रहे थे और उनकी खोजबीन से 2014 में राजनीतिक कार्यकर्ता श्रीकांत भारती की हत्या में शहाबुद्दीन का हाथ होने के संकेत मिल रहे थे। लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के नेता शहाबुद्दीन इस समय भी हत्या के मामले में जेल में ही हैं। जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ के पूर्व अध्यक्ष और भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी-लेनिनवादी) के सक्रिय नेता चंद्रशेखर की हत्या के पीछे भी उन्हीं का हाथ माना जाता है।
हालांकि मुख्यमंत्री नीतीश कुमार पर पत्रकार, हत्या, सवाल, सुरक्षा बारी-बारी से मुंह बाए खड़े हैं। जिसकी वजह हैं बिहार में हत्याओं के क्रमवार सिलसिले। लेकिन सुशासन का दावा करने वाले बिहार के सीएम राजनीतिक लालसा के चक्कर में उत्तर प्रदेश पलायन करने की योजना बना रहे हैं। जिससे उनकी छवि लोगों की नजरों में और ज्यादा धूमिल होती जा रही है।
हत्याओं ने उठाया पत्रकारिता के भविष्य पर सवाल !
झारखंड में भी यही स्थिति है। पत्रकार अखिलेश प्रताप सिंह की हत्या पेशेवर तरीके से की गई। जिसके बाद इन तमाम हत्याओं के पीछे छोटी मोटी रंजिश को कारण के तौर पर देखना असल मामले से आंखें मूंदने जैसा ही है। माना जाता है कि लेखनी में स्वतंत्रता और पत्रकारों के द्ववारा जानकारियों को तथ्यों के साथ पहुंचाने ( जिससे ताकतवर तत्वों का रिश्ता हो ) को काफी परेशानी होती है। जिससे उबरने के लिए वे हत्या जैसी खतरनाक साजिश को भी अंजाम देने से भी पीछे नहीं हटते।
बीते दिनों प्रेस क्लब ऑफ इंडिया और मुंबई प्रेस क्लब जैसी पत्रकारों की संस्थाओं ने बिहार और झारखंड में हुई हत्याओं के दोषियों की तत्काल गिरफ्तारी की मांग करते हुए देश में अभिव्यक्ति की आजादी पर लगातार बढ़ रहे हमलों पर चिंता प्रकट की। जानकारी की मानें तो लोकतांत्रिक और बहुजातीय देश होने के बावजूद भारत प्रेस फ्रीडम की सूची में शामिल 180 देशों में 136वें नंबर पर है।












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