Nitish Kumar Birthday: जब पुलिसवालों को देर रात ससुराल लेकर पहुंचे थे नीतीश कुमार
Nitish Kumar Birthday: "मैंने नीतीश को अचानक उत्तेजित होते हुए देखा। गुस्सा उनके चेहरे तक आ गया था। उन्होंने मेज पर मुक्का मारा और कहा कि मैं सत्ता प्राप्त करुंगा, किसी भी तरह से, लेकिन सत्ता लेकर अच्छा काम करुंगा। उसके बाद वो खड़े हो गए और अपने दुस्साहसपूर्ण वचन को पूरा करने की दिशा में करीब 30 साल तक भटकने के लिए निकल गए।"
यह संस्मरण संकर्षण ठाकुर की किताब बंधु बिहारी 'कहानी लालू यादव व नीतीश कुमार की' से लिया गया है। यहां पर ये बातें नीतीश कुमार ने 70-80 के दशक में तब कही थी, जब बिहार में कर्पूरी ठाकुर की सरकार के दौरान रोज किसी न किसी मंत्री, विधायक पर भ्रष्टाचार के आरोप लगते थे। हालांकि, 2005 में वे मुख्यमंत्री बने और तब से आज तक इस पद पर बैठे हैं। बीच में 2014-15 का साल छोड़कर।

बिहार की पूरी राजनीति तीन नामों के आसपास घूमती है। वह नाम हैं लालू यादव, नीतीश कुमार और सुशील मोदी। नीतीश, मोदी और लालू 70 के दशक में छात्र आंदोलन से उभरे चेहरे, जिनके इर्द-गिर्द आज भी बिहार की राजनीति बुनी हुई है। आज की तारीख में ये तीनों एक-दूसरे के बड़े राजनीतिक विरोधी भी हैं। आज बात करते हैं नीतीश कुमार की, क्योंकि आज (1 मार्च) 73वां जन्मदिन है। देश के प्रधानमंत्री से लेकर कई राज्यों के मुख्यमंत्री, विधायक व नेताओं ने उन्हें इस मौके पर बधाई दी है।
नौकरी में मन नहीं लगा तो राजनेता बन गए
नीतीश कुमार का जन्म बिहार के बख्तियारपुर में हुआ था। उनके पिता कविराज राम लखन सिंह एक आयुर्वेदिक डॉक्टर (वैद्य) थे और माता परमेश्वरी देवी (गृहिणि) थीं। नीतीश काफी शिक्षित परिवार से आते हैं। उन्होंने 10वीं तक की पढ़ाई गांव के ही एक स्कूल से की थी, बाद में बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (अब एनआईटी पटना) से साल 1972 में मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री ली। पढ़ाई के बाद उन्होंने बिहार इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में काम करना शुरू किया। यहां उनका मन नहीं लगा तो वह राजनीति में उतर आए।
70 के दशक में इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली कांग्रेस पार्टी की नीतियों के खिलाफ पूरे देश में गुस्सा था। तब जय प्रकाश नारायण (जेपी) ने कांग्रेस के खिलाफ बड़ा आंदोलन किया। नीतीश कुमार इस आंदोलन से जुड़ गए और आपातकाल के दौरान कई महीनों तक जेल में गुजारे। जेपी आंदोलन के बाद कई युवा नेता उभर कर सामने आए, इनमें से एक नीतीश कुमार भी थे। इस दौरान का एक किस्सा बहुत ही ज्यादा मशहूर है कि आपातकाल के दौरान नीतीश ने भूखे पुलिसवालों को अपने ससुराल ले जाकर खाना खिलाया था।
जब पुलिसवालों को 'आधी रात' नीतीश ले गए ससुराल
राजकमल से प्रकाशित उदय कांत द्वारा लिखित किताब "नीतीश कुमार: अंतरंग दोस्तों की नज़र से" में बताया गया है कि 1977 के समय जब नीतीश बक्सर जेल में बंद थे, तब एक युवा नेता के रूप में उनकी लोकप्रियता से दक्षिणपंथी विचारधारा वाले राजनैतिक कैदी उनसे बौखलाने लगे थे। इस वजह से उन्हें पुलिस एस्कॉर्ट के साथ बक्सर से भागलपुर सेंट्रल जेल भेजना तय हुआ।
दरअसल प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल की वजह से बिहार की तकरीबन सभी जेलें भरी हुईं थी। इसलिए पकड़े गए राजनैतिक कैदियों को एक जगह नहीं रखा जाता था ताकि वे आंदोलन न कर दें। इसी क्रम में नीतीश जेल में रहते हुए नाम कमाने लगे थे। जो कुछ लोगों को पसंद नहीं आ रहा था। तब उनकी सुरक्षा के लिहाज से उनको बक्सर से भागलपुर भेजने का प्लान बना।
बिहार पुलिस के कई कर्मचारी उन्हें बक्सर से भागलपुर के लिए ट्रेन से रवाना हुए। ट्रेन चलने के थोड़ी देर में ही सभी पुलिसवाले नीतीश कुमार से प्रभावित होने लगे। इसी क्रम में ट्रेन बक्सर से पटना देर शाम तक पहुंची, जहां नीतीश कुमार का ससुराल था कंकड़बाग में। पटना में उस दिन तेज बारिश के बाद हल्की-हल्की बूंदाबंदी हो रही थी। तभी पुलिसवालों को इस बात की जानकारी मिलती है कि भागलपुर के लिए अगली ट्रेन अब सुबह को मिलेगी।
कहते हैं कि तब नीतीश कुमार ने सभी पुलिसवालों को पटना में ही अपने ससुराल में भोजन करने और रात वहीं गुजारने का निमंत्रण दिया। पुलिसवाले भी इंसान होते हैं, वे भी मान गए। कहते हैं कि बिन बुलाए मेहमान की तरह से नीतीश कुमार के साथ सभी पुलिसवाले उनके ससुराल पहुंचे।
घर तक पहुंचने के रास्ते में घुटना भर पानी भरा था, लेकिन देर रात तक सभी लोग पहुंचे। जब नीतीश अचानक आ धमके तो सभी लोग आर्श्चयकित हुए और सबके लिए खाने-पीने और सोने की व्यवस्था की गई। कहते हैं उस रात उनकी पत्नी उन्हें सकुशल देख बहुत खुश हुई थीं। उसके अगली सुबह ही पुलिस के साथ नीतीश कुमार भागलपुर के लिए रवाना हो गए।
बिहार और नीतीश की राजनीति
● नीतीश कुमार ने पहली बार जनता पार्टी की तरफ से 1977 का बिहार विधानसभा चुनाव लड़ा, लेकिन हार गए। 1985 में फिर से विधानसभा चुनाव लड़ा और जीत हासिल की। 1987 में उन्हें लोक दल के प्रदेश अध्यक्ष के रूप में नियुक्त किया गया था।
● 1989 में नीतीश कुमार बिहार में जनता दल के महासचिव नियुक्त किए गए। उसी साल बिहार की बाढ़ लोकसभा क्षेत्र से सांसद चुने गए। अप्रैल, 1990 से नवंबर, 1990 तक नीतीश कुमार ने केंद्रीय कृषि और सहकारिता मंत्री के रूप में काम किया। 1991 में जब दूसरी बार सांसद बने तब नीतीश कुमार को संसदीय दल का उपनेता बनाया गया।
● 1995 में बिहार विधानसभा चुनाव में लालू प्रसाद यादव के खिलाफ लड़ाई लड़ी। जॉर्ज फर्नांडीस के साथ समता पार्टी की शुरुआत की। चुनाव में पार्टी को सफलता नहीं मिली, केवल छह सीटें ही जीती। तभी 1996 में नीतीश ने लोकसभा चुनाव लड़ा और सांसद बने। अटल बिहारी वाजपेयी सरकार में केंद्रीय रेल मंत्री, भूतल परिवहन मंत्री और कृषि मंत्री की जिम्मेदारी दी। इसी दौरान 2 अगस्त, 1999 में गैसल ट्रेन दुर्घटना की नैतिक जिम्मेदारी लेते हुए नीतीश ने रेल मंत्री के पद से इस्तीफा दे दिया।
● मार्च, 2000 में वह पहली बार बिहार के मुख्यमंत्री बने। हालांकि, केवल सात दिनों तक ही उनका कार्यकाल रहा। इसके बाद 2005, 2010, 2013, 2015, 2017, 2020, 2022 और 28 जनवरी 2024 में नौंवी बार मुख्यमंत्री बने।
(इस लेख में लेखक ने अपने निजी विचार व्यक्त किए हैं। लेख में प्रस्तुत किसी भी विचार एवं जानकारी के प्रति Oneindia उत्तरदायी नहीं है।)












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