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R.D. Burman: संगीत में नए प्रयोग करते थे आरडी बर्मन, इसलिए पंचम दा के गाने आज भी लोकप्रिय

R.D. Burman: "कुछ तो लोग कहेंगे, लोगों का काम है कहना...", "तेरे बिना जिंदगी से कोई शिकवा तो नहीं...", "दम मारो दम..." जैसे अनगिनत लोकप्रिय गानों का संगीत देने वाले राहुल देव बर्मन को कौन नहीं जानता। लोग उन्हें पंचम दा के नाम से भी जानते हैं। वह एक सफल संगीत निर्देशक थे। जिन्हें हिंदी संगीत जगत के सबसे महान और सबसे सफल संगीत निर्देशकों में से एक माना जाता है। आर.डी. बर्मन का जन्म 27 जून 1939 को हुआ था। वह मशहूर संगीतकार सचिन देव बर्मन के बेटे थे। इसलिए संगीत उन्हें अपने परिवार से विरासत में मिला। गुलजार ने एक इंटरव्यू में कहा था कि पंचम के संगीत में नवीनतम प्रयोग होते थे इसलिए आज भी उनका संगीत पुराना नहीं लगता।

पंचम नाम के पीछे की कहानी

कहते हैं नाम में कुछ नहीं रखा होता। पर नाम ही सब कुछ होता है। आर.डी. बर्मन का नाम पंचम दा कैसे पड़ा इसके पीछे भी एक कहानी है। वैसे आपको बता दें कि उन्हें यह नाम दिग्गज अभिनेता अशोक कुमार ने दिया था। आर.डी. बर्मन जब भी किसी धुन को गुनगुनाते थे, तो वह अक्सर 'प' शब्द का इस्तेमाल किया करते थे। उनकी इसी आदत को अशोक कुमार ने नोटिस कर लिया और सरगम में 'प' पांचवें स्थान पर आता है। जिसके बाद अशोक कुमार ने उन्हें पंचम नाम दिया और राहुल देव पंचम दा बन गए। धीरे-धीरे यह नाम इतना लोकप्रिय हो गया कि दुनिया भर में सभी लोग उन्हें राहुल नाम से कम और पंचम दा के नाम से ज्यादा जानते हैं।

birth anniversary of R.D. Burman Pancham Das songs are popular even today

संगीत में करियर की शुरूआत

आर.डी. बर्मन को करियर का पहला ब्रेक 1959 में मिला था। उस फिल्म का नाम 'राज' था। लेकिन यह पूरी न हो सकी और बीच में ही बंद हो गयी। इसके दो साल बाद फिल्म 'छोटे नवाब' में संगीत देने का मौका मिला। बाद में 1965 में 'भूत बंगला' में पंचम ने एक्टिंग भी की थी। लेकिन पंचम को असली पहचान फिल्म 'तीसरी मंजिल' से मिली। जिसका संगीत लोगों को बहुत पसंद आया। इस फिल्म के गाने लोग आज भी गुनगुनाते हैं जिनमें "ओ हसीना जुल्फों वाली जाने जहां..", "ओ मेरे सोना रे...", "दीवाना मुझसा नहीं.." जैसे हिट गाने इस फिल्म में पंचम दा ने दिए थे। इसके बाद पंचम दा ने फिर पीछे मुड़ के नहीं देखा।

'वो देखो आरडी बर्मन के पिता जा रहे हैं'

सर्वश्रेष्ठ संगीत निर्देशन के लिए राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार जीतने वाले विख्यात म्यूजिक डायरेक्टर वनराज भाटिया ने एक इंटरव्यू में कहा था कि पंचम एक जीनियस म्यूजिक डायरेक्टर थे। उनके पिता महान संगीतकार सचिन देव बर्मन मुंबई के जूहू में एक पार्क में सुबह के समय अक्सर टहलने जाया करते थे। एक दिन वह सुबह टहलकर घर आए और पंचम से बोले, "पंचम, आज मैं बहुत खुश हूं।" पंचम दा ने बताया था कि "मैं हैरान था कि पिता जी क्या कह रहे हैं? वैसे तो रोज सुबह उठकर ताने देते थे कि देर तक सोता है। आज अचानक पिता जी को क्या हो गया है?" तब उन्होंने आगे की बात बताई कि पिता जी ने कहा कि "पंचम, जब मैं पार्क में टहलने जाता हूं तो लोग अक्सर कहते हैं कि देखो, एस डी बर्मन जा रहे हैं। लेकिन आज तो कमाल ही हो गया। लोग कह रहे थे कि देखो, आरडी बर्मन के पिता जा रहे हैं।"

अंतिम दिनों में थे अकेले

उन्होंने अपने करियर के दौरान लगभग 300 फिल्मों में संगीत दिया था। आर.डी. बर्मन प्रयोगवादी संगीतकार के रूप में जाने जाते है। उन्होंने पश्चिमी संगीत को मिलाकर अनेक नई धुनें तैयार की थी। डॉक्यूमेंट्री 'पंचम अनमिक्स्ड' में इस बात का जिक्र है कि पंचम दा अपने आखिरी दौर में अकेले पड़ गए थे। एक समय ऐसा था कि पंचम हर किसी की पंसद बने हुए थे। पर वक्त एक सा नहीं रहता। डॉक्यूमेंट्री 'पंचम अनमिक्स्ड' में कई गायकों, संगीतकारों ने उनके अकेलेपन को लेकर इसकी कई वजहें बताई है।

शम्मी कपूर ने आर.डी. बर्मन के बारे में कहा था कि हर एक शख्स की जिंदगी में उतार-चढ़ाव आते हैं लेकिन पंचम अपने उतार से अच्छी तरह से निपट नहीं पाए। गीतकार जावेद अख्तर ने कहा था कि हमारे यहां टैलेंट की कोई कद्र नहीं होती। बस वर्तमान देखा जाता है। इसी सोच की वजह से हमने आर.डी. जैसे जीनियस को खो दिया। 80 के दशक में कुछ नाकामयाबी हाथ लगने के बाद आर.डी. बर्मन को फिल्में नहीं मिल रहीं थीं। गायक भूपिंदर ने बताया कि बड़े दुख की बात है कि वह आदमी एक वक्त ढेर सारे दोस्तों से घिरा रहता था लेकिन अपने आखिरी दिनों में बिलकुल अकेला रह गया था। आखिरकार, 4 जनवरी 1994 को मात्र 54 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया था।

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