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PV Narasimha Rao: जीवनभर कांग्रेस के सिपाही रहे नरसिम्हा राव, लेकिन पार्टी ने पार्थिव शरीर को सम्मान नहीं दिया

PV Narasimha Rao: जीवन भर कांग्रेस के सिपाही रहे नरसिम्हा राव, लेकिन पार्टी ने पार्थिव शरीर को सम्मान नहीं दिया

P.V. Narasimha Rao : 1991 में किसी भी पार्टी को बहुमत नहीं मिला था। चुनाव प्रचार के दौरान राजीव गांधी की बम धमाके में असामयिक मृत्यु से कांग्रेस पार्टी को सहानुभूति मिली थी और इस कारण पार्टी को 545 में से 232 सीटें मिलीं थी। जबकि इससे पहले 1989 के लोकसभा चुनावों में पार्टी को 200 से कम सीटें मिली थीं। 1991 में बहुमत नहीं मिलने पर तत्कालीन उपराष्ट्रपति शंकर दयाल शर्मा के नाम पर पार्टी ने सहमति बनानी चाही पर उन्होंने स्वास्थ्य समस्याओं का हवाला देते हुए इस ऑफर को ठुकरा दिया। फिर से गहन विचार-विमर्श शुरू हुआ और राजनीति से लगभग सन्यास ले चुके पी. वी. नरसिम्हा राव का नाम सामने आया।

ऐसे में कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक बुलाई गई और नरसिम्हा राव को पार्टी का नया अध्यक्ष चुना गया और कई कद्दावर नेताओं ने चुप्पी साध ली। नरसिम्हा राव ने 21 जून को ऐतिहासिक शपथ ली। पर उन्होंने लोकसभा चुनाव लड़ा नहीं था। ऐसे में नरसिम्हा राव ने आंध्र प्रदेश की नांदयाल सीट से उपचुनाव लड़ा और रिकॉर्ड मतों से विजयी हुए। आज नरसिम्हा राव के जन्मदिन पर उनसे जुड़ी कुछ जानकारियां हम आपके साथ साझा करेंगे।

birth anniversary of PV Narasimha Rao who devoted his whole life to congress

शुरुआती जीवन व राजनीतिक सफर

पी.वी. नरसिम्हा राव का जन्म 28 जून 1921 को आंध्र प्रदेश के करीमनगर जिले में स्थित भीमाडेवरल्ली मंडल गांव में हुआ था। यह क्षेत्र वर्तमान में तेलंगाना राज्य का हिस्सा है। पी.वी. नरसिम्हा राव का पूरा नाम पामुलापति वेंकट नरसिम्हा राव था। वह एक छात्र नेता के तौर पर राजनीति में आए। उन्होंने आंध्र प्रदेश के विभिन्न इलाकों में कई सत्याग्रही आंदोलनों का नेतृत्व किया। वंदे मातरम आंदोलन के भी सक्रिय भागीदार रहे। यह आंदोलन 1930 के दशक में हैदराबाद में हुआ था।

हालांकि उनकी मातृभाषा तेलुगू थी। फिर भी 6 विदेशी भाषाओं के अलावा 9 अन्य भारतीय भाषाओं पर उनकी अच्छी पकड़ थी। भारत की स्वतंत्रता के बाद नरसिम्हा राव भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के साथ जुड़े। 1971 से लेकर 1973 तक वह आंध्र प्रदेश के मुख्यमंत्री रहे। इसके बाद पी.वी. नरसिम्हा राव इंदिरा गांधी और राजीव गांधी दोनों की सरकारों में केंद्रीय मंत्रिमंडल में रहे। अपनी विद्वता, अनुभव और शांत स्वभाव के कारण वे 1991 में पहले दक्षिण भारतीय प्रधानमंत्री बने।

प्रेम में पड़कर सन्यासी होना चाहते थे राव

विनय सीतापति ने अपनी किताब 'द हाफ लॉयन' में राव के एक प्रेम प्रसंग का जिक्र किया है। विनय ने लिखा कि राव को लक्ष्‍मी कांतम्‍मा नाम की प्रसिद्ध नेता से प्रेम था। दोनों की मुलाकात आंध्र प्रदेश के विधानसभा सत्रों के दौरान हुई थी। लक्ष्मी भी विधायक चुनकर आई थी और राव भी। राजनीति में बढ़ रहे नरसिम्हा राव से लक्ष्‍मी की करीबियां अब और बढ़ रही थीं। दोनों ने इसे दबाने की काफी कोशिश तो की थी पर ऐसा हुआ नहीं। उधर, लक्ष्‍मी भी संसद में अपनी पहचान बना चुकी थीं। इंदिरा को भी दोनों के प्रेम प्रसंग के बारे में मालूम था।

इस बात का जिक्र आंध्र प्रदेश के मुख्‍यमंत्री रह चुके वेंगल राव ने अपनी ऑटोबायोग्रफी 'माई लाइफ स्‍टोरी' में भी किया था। पर राव का यह प्रेम सिर्फ प्रेम तक ही रह गया। आखिर में, लक्ष्‍मी ने राजनीति छोड़कर अध्‍यात्‍म का रास्ता पकड़ लिया और साध्वी बन गई। वे चाहती थी कि राव भी ऐसा ही करें। पर नियति को कुछ और ही मंजूर था। राजीव गांधी की हत्या के बाद संन्यास की तैयारी कर रहे नरसिम्‍हा राव पर देश संभालने की जिम्‍मेदारी आ गई और उनकी प्रेम कहानी अधूरी रह गई।

आखिर क्यों नहीं रखा गया कांग्रेस मुख्यालय में शव

23 दिसंबर 2004 को पूर्व प्रधानमंत्री नरसिम्हा राव ने दिल्ली के अखिल भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान में अंतिम सांस ली। राव को श्रद्धांजलि के लिए उनका शव 10 अकबर रोड स्थित कांग्रेस मुख्यालय लाया गया। मगर शव वाहन को गेट पर ही रोक दिया गया। पूर्व प्रधानमंत्री के शव को अपनी ही पार्टी के मुख्यालय में रखे जाने की अनुमति नहीं मिली। सोनिया गांधी के इस रुख से पूरा देश हैरान रह गया था। इस बात को पूरा होने से पहले हम आपको बता दें कि शुरुआत में सोनिया और राव की बहुत अच्छी बनती थी। सोनिया हर मामले में राव की सलाह भी लेती थी। फिर आखिर ऐसा क्या हुआ था कि राव ने सोनिया गांधी का भरोसा खो दिया था।

विनय सीतापति ने अपनी किताब हाफ लॉयन में इस बात का जिक्र किया है। अप्रैल 1992 में तिरुपति में कांग्रेस का राष्ट्रीय अधिवेशन हुआ। उसके बाद से कुछ कांग्रेसी नेता राव की शिकायतें लेकर सोनिया से मिलने लगे थे। पर कुछ खास हुआ नहीं। 6 दिसंबर 1992 को अयोध्या में बाबरी मस्जिद गिरा दी गई। इसके बाद सोनिया का पहला सियासी बयान सामने आया था।

इसके बाद भी नरसिम्हा राव सोनिया गांधी से हर हफ्ते मिलते रहे। वहीं विपक्ष सवाल उठाता रहा कि आखिर देश के प्रधानमंत्री को एक आम नागरिक को रिपोर्ट करने की जरूरत क्या है। आखिरकार 1993 में उन्होंने सोनिया गांधी के घर 10 जनपथ जाना छोड़ दिया। विरोधियों को मौका मिला और उन्होंने सोनिया के कान भरने शुरू कर दिए। 20 अगस्त 1995 को सोनिया ने अमेठी मे जनसभा की। सोनिया ने भाषण में कहा कि उनके पति को गुजरे कई दिन हो गए लेकिन धीमी गति से चल रही है। इशारा राव सरकार पर था। भीड़ से भी 'राव हटाओ, सोनिया लाओ' के नारे गूंजने लगे थे। 1998 में कांग्रेस की कमान खुद सोनिया गांधी ने संभाली। 1999 के चुनाव में राव को टिकट तक नहीं मिला था। 23 दिसंबर 2004 को जब नरसिम्हा राव की मृत्यु हुई तो न तो उनका शव कांग्रेस मुख्यालय में रखा गया और न ही दिल्ली में उनका अंतिम संस्कार होने दिया गया। कांग्रेस के अंदर और कांग्रेस के बाहर भी लोग यही मानते हैं कि इस फैसले के लिए सिर्फ और सिर्फ सोनिया गांधी जिम्मेदार थी।

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