बेचैन नेताओं को कैसे आराम दूं, इस प्यार को मैं क्या नाम दूं?

[कोणार्क रतन] बिहार में राजनीतिक उठापटक को देखा तो तुषार कपूर की फिल्म 'मुझे कुछ कहना है' का एक गीत याद आ गया- बेचैन दिल को कैसे आराम दूं.... बस फर्क इतना है कि इस स्टोरी में दिल के बजाये हमारे माननीय नेता गण आ गये और गीत की लाइनें बन गईं, "बेचैन नेताओं को कैसे आराम दूं, इस प्यार को मैं क्या नाम दूं?"

यहां बेचैनी है, बिहार की सत्ता पाने की, जिसके चुनाव साल के अंत में होने हैं, और प्यार है कई सारे दिग्गजों के बीच, जो सारे मिलकर भाजपा को ऑल आउट करना चाहते हैं। दिल्ली में आम आदमी पार्टी द्वारा किये गये बड़े उलटफेर के बाद भाजपा के ख‍िलाफ खड़े इस महादल का मनोबल और भी बढ़ गया है।

मोदी सरकार के रथ को रोकने के लिए दिल्ली में हुई बैठक के बाद अब जनता परिवार का विलय हो गया। जहां एक ओर भाजपा की नजर आने वाले बिहार के चुनावों पर है और वह अभी से वहां रैलियां करने में जुटी है तो वहीं जनता परिवार में समाजवादी पार्टी, जेडीयू, जनता दल सेक्युलर, आरजेडी, आईएनएलडी और समाजवादी पार्टी राष्ट्रीय का मिलन हो गया है।

देश के लगभग हर हिस्सें में भगवा रंग को बढ़ता हुआ देखते हुए अन्य पार्टियों में चर्चाएं पहले ही तेज हो चुकी थीं जिसके बाद जनता परिवार ने एक साथ आने का फैसला कर लिया। जनता परिवार के इस विलय में समाजवादी पार्टी के नेता मुलायम सिंह यादव को अध्यक्ष के रूप में चुना गया है लेकिन जो बड़ा प्रश्न सामने निकलकर आया है, वह यह है कि अभी भी इस दल का चुनाव चिन्ह, झंडा और पार्टी का नाम अभी तक तय नही हो पाया है। खैर, इसके लिए 6 नेताओं की कमेटी बनाई गई है जो कि पार्टी का नाम, चुनाव चिन्ह, झंडा तय करेगी।

महादल को तोड़ने वाली कीलें

  • 6 दलों को मिलाकर बने इस महादल में अभी से एकता की कमी दिखने लगी है।
  • हाल ही में पता चला कि यूपी के मुख्यमंत्री अखिलेश यादव इस मिलन के खिलाफ हैं।
  • आईएनएलडी में भी पार्टी के निशान को लेकर एक राय नहीं है।
  • दल में विवाद, मतभेद अभी से जारी दिख रहा है। आंतरिक कलह तब और ज्यादा बढ़ने के आसार दिख रहे हैं।

इतिहास की कुछ लाइनें

इसके इतर अगर इतिहास को उठाकर देखें तो 1988 में जनता दल का गठन हुआ था तब सभी नेता एक साथ थे। 1988 में जनता दल बनने के दो साल बाद ही यह टूट गई थी। 1999 में जनता दल का नाम और चक्र निशान खत्म हो गया था। इस हिसाब से अगर देखा जाए तो यह कोई बहुत ही क्रांतिकारी फैसला नहीं हुआ है, लेकिन हां यह जरूर है कि बीजेपी को रोकने के लिए उठाए गए इस कदम के बाद बिहार में मोदी सरकार की राह आसान नहीं होगी।

कब होगी इस प्यार में तकरार

इन राजनीतिक दलों में वैसे तो इधर प्यार उमड़ रहा है, लेकिन वो दिन भी दूर नहीं जब तकरार होगी। असली परीक्षा तब होगी जब बिहार में मुख्यमंत्री पद के दावेदार के लिए फैसला लेने की बात आयेगी। भले ही लालू यादव ने यह कह दिया हो कि उनका अब नीतीश से कोई मतभेद नहीं है लेकिन आने वाले समय में दोनों के बीच मुंख्यमंत्री पद को लेकर होने वाली रार इस दल में मुश्किलें खड़ी कर सकती है। इन 6 पार्टियों से राज्यसभा में 30 सांसद हैं और लोकसभा में 15 सांसद हैं।

अगर आंकड़ों पर गौर करें तो पाएंगे कि 2014 के लोकसभा चुनावों में भाजपा ने 22 सीटें जीती थीं और अगर उसकी सहयोगी पार्टियों को भी मिला लें तो एलजेपी ने 6 और आरएसएलपी ने 3 सीटें जीतीं थीं और एनडीए का वोट प्रतिशत 39 था। वहीं दूसरी ओर, जनता परिवार का वोट प्रतिशत 36 था और एनडीए बिहार में सबसे बड़े राजनीतिक दल के तौर पर उभरी थी।

बिहार में राह आसान नहीं

बिहार की अगर बात करें तो वहां की राजनीति इतनी आसान नहीं है। जिस तरह से बीते लोकसभा के चुनावों में जनता ने अपनी ताकत दिखाई है, उससे कुछ भी पहले से कहना मुश्किल है। हां, अब यह जरूर है कि जनता पहले की अपेक्षा काफी समझदार ओर जागरूक हुई है और उसे भी सांप्रदायिक और जातिगत राजनीति के बजाए विकास के मुद्दे पर काम करने वाली सरकार चाहिए। आने वाले चुनावों में एक बार फिर युवाओं की अहम भूमिका होने की उम्मीद है। मौजूदा वक्त में बिहार की देश में क्या दशा है, इससे हर कोई वाकिफ है। बिहार की बिसात में मांझी का भी आने वाले चुनावों में अहम किरदार होगा।

कुछ समय पहले ही नीतीश कुमार ने जीतनराम मांझी पर भरोसा किया था लेकिन उसका क्या हश्र हुआ, वह भी सभी के सामने है। इस विलय पर अपनी राय रखते हुए मांझी ने भी साफ कर दिया कि यह महाविलय नहीं, महाप्रलय है। धीरे धीरे बिहार की राजनीति में नए नए मोड़ देखने को मिलेंगे। अब देखना दिलचस्प होगा कि जनता बिहार में अपना सरताज किसे चुनती है। भाजपा अपना विजय रथ आगे बढ़ा पाती है, यह इस मिलन से एक बार फिर देश में एक नई राजनीति का उदय होता है, यह देखने वाली बात होगी।

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