दानवीर भामाशाह: अकबर से युद्ध के लिए महाराणा प्रताप को अर्पित कर दी थी अपनी सब जमा-पूँजी

bhamashah jayanti 2022: Who was Bhama Shah? How did he help Maharana Pratap against Mughals?, know the story of Bhama Shah and maharana pratap

मेवाड़, 28 जून 2022: राजस्थान की धरा अनेक वीर सपूतों की जननी है। यहां आज ही के दिन भामाशाह का जन्म हुआ था। भामाशाह वो नाम है, जो यहां आदर से लिया जाता है। उनके नाम से सरकारी योजनाएं चल रही हैं। और दानवीरों की बात आती है तो भी उनका नाम जुबां पर आ जाता है। वह सैकड़ों बरस पहले महाराणा प्रताप के समय जन्मे थे। कहा जाता है कि, भामाशाह ने प्रताप के लिए अपनी सारी जमा-पूंजी अर्पित कर दी थी।

दानवीर भामाशाह की कहानी

दानवीर भामाशाह की कहानी

वो दौर जब मुगलों के हमले हो रहे थे तो भामाशाह ने अपनी मातृभूमि की रक्षा के लिए महाराणा प्रताप को अपना सब-कुछ न्यौछावर कर दिया। उन्होंने दूजों की भलाई के लिए जीवनभर दान किया। ऐसे दानवीर का जन्म राजस्थान के अलवर जिले में 28 जून, 1547 को हुआ था। इतिहासकार बताते हैं कि, उनके पिता भारमल्ल तथा माता कर्पूरदेवी थीं। भारमल्ल राणा साँगा के समय रणथम्भौर के किलेदार थे। अपने पिता की तरह भामाशाह भी राणा परिवार के लिए समर्पित थे।

आज ही के दिन हुआ था भामाशाह का जन्म

आज ही के दिन हुआ था भामाशाह का जन्म

मुगल बादशाह अकबर से लोहा लेते हुए जब महाराणा प्रताप को अपनी मातृभूमि का त्याग करना पड़ा तो वे अपने परिवार सहित जंगलों में रहने लगे। महलों में रहने और सोने चाँदी के बरतनों में स्वादिष्ट भोजन करने वाले महाराणा के परिवार को उन दिनों अपार कष्ट उठाने पड़ रहे थे। राणा को बस एक ही चिन्ता थी कि किस प्रकार फिर से सेना जुटाएँ, जिससे मेवाड़ को आक्रांताओं से चंगुल से मुक्त करा सकें। उस समय राणा के सम्मुख सबसे बड़ी समस्या धन की थी। उनके साथ जो विश्वस्त सैनिक थे, उन्हें भी काफी समय से वेतन नहीं मिला था। कुछ लोगों ने राणा को आत्मसमर्पण करने की सलाह दी, लेकिन राणा जैसे देशभक्त एवं स्वाभिमानी को यह कतईं मंजूर नहीं था।

महाराणा प्रताप को अर्पित की जमा पूंजी

महाराणा प्रताप को अर्पित की जमा पूंजी

महाराणा प्रताप के कष्टों के बारे में जब भामाशाह को पता चला तो उनका दिल दहल उठा। भामाशाह ने मदद की ठानी। उनके पास स्वयं का धन और पुरखों की वसीयत थी। उन्होंने वो सब महाराणा प्रताप को अर्पित कर दिया। इतिहास में ऐसा उल्लेख है कि, राणा के लिए भामाशाह ने 25 लाख रुपए की नकदी तथा 20,000 अशर्फी दीं। तब राणा ने आँखों में आँसू भरकर भामाशाह को गले से लगा लिया। वहीं, राणा की पत्नी महारानी अजवान्दे ने भामाशाह को पत्र के जरिए इस सहयोग के लिए कृतज्ञता व्यक्त की।

महारानी ने सिर झुकाकर आभार जताया था

महारानी ने सिर झुकाकर आभार जताया था

भामाशाह महाराणा प्रताप की महारानी के सम्मुख उपस्थित हुए और नम्रता से कहा कि, मैंने तो अपना कर्त्तव्य निभाया है। यह सब धन मैंने देश से ही कमाया है। यदि यह देश की रक्षा में लग जाए, तो यह मेरा और मेरे परिवार का अहोभाग्य ही होगा। महारानी यह सुनकर क्या कहतीं, उन्होंने भामाशाह के त्याग के सम्मुख अपना सिर झुका दिया। उधर, जब अकबर को यह घटना पता लगी, तो वह भड़क गया।

और, महाराणा प्रताप को मिल गई नई ताकत

और, महाराणा प्रताप को मिल गई नई ताकत

अकबर सोच रहा था कि सेना के अभाव में राणा प्रताप उसके सामने झुक जायेंगे, लेकिन इस धन से तो राणा को नई ताकत मिल गई। चिढ़े हुए अकबर ने क्रोधित होकर भामाशाह को पकड़ लाने को कहा। अकबर को उसके कई साथियों ने समझाया कि एक व्यापारी पर हमला करना उन्हें शोभा नहीं देता। इस पर उसने भामाशाह को कहलवाया कि वह उसके दरबार में मनचाहा पद ले ले और राणा प्रताप को छोड़ दे। मगर, दानवीर भामाशाह ने उसका प्रस्ताव ठुकरा दिया। इतना ही नहीं, उन्होंने अकबर से युद्ध की तैयारी भी कर ली। यह समाचार मिलने पर अकबर ने अपना विचार बदल दिया।

अकबर की धमकियों से नहीं डरे

अकबर की धमकियों से नहीं डरे

पुस्तकों में आज भी यह पढ़ाया जाता है कि, भामाशाह से प्राप्त धन के सहयोग से महाराणा प्रताप ने नई सेना बनाई। मुगलों से लोहा लिया और अपने काफी क्षेत्र को मुक्त करा लिया। वहीं, भामाशाह जीवन भर राणा की सेवा में लगे रहे। महाराणा के देहान्त के बाद उन्होंने उनके पुत्र अमरसिंह के राजतिलक में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी। इतना ही नहीं, जब उनका अन्त समय निकट आया, तो उन्होंने अपने पुत्र को आदेश दिया कि वह अमरसिंह के साथ सदा वैसा ही व्यवहार करे, जैसा उन्होंने महाराणा प्रताप के साथ किया। ऐसे थे भामाशाह।

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