African Union in G20: अफ्रीकी संघ के जी 20 में शामिल होने के भारत के लिए मायने
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का यह कहना कि जी20 में अफ्रीकी संघ को शामिल करना समावेशी वैश्विक वार्ता की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। यह दुनिया के लिए संकेत है कि इस वैश्विक व्यवस्था में उन लोगों की भी आवाज शामिल करना जरुरी है जो आर्थिक रूप से भले ही बहुत मजबूत नहीं हैं , लेकिन वे सांस्कृतिक रूप से एक बड़े समूह का प्रतिनिधत्व करते हैं। जिनकी संख्या भी कम नहीं है और जिनके लोगों की अपेक्षाएं विश्व बिरादरी से है। भारत की G20 अध्यक्षता में अफ्रीकी संघ को दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं के समूह का एक नया स्थायी सदस्य बनाया गया। 1999 में जी20 की स्थापना के बाद से यह पहला प्रभावशाली विस्तार है।
अफ्रीकी संघ को 27 सदस्यीय यूरोपीय संघ (ईयू) के समान दर्जा
जी20 में सभी अफ़्रीकी देशों के आ जाने से भारत के लिए भी एक बहुत बड़ा अवसर प्राप्त हुआ है। भारत के इस साहसिक और बड़े कदम ने उसे ग्लोबल साउथ के मजबूत लीडर के रूप में स्थापित कर दिया है। इस मामले में भारत को जापान का भी समर्थन प्राप्त था।

अभी तक चीन ही अफ़्रीकी देशों पर अपने प्रभुत्व का दावा करता रहा था। पिछले कुछ वर्षों में, चीन ने अफ्रीका को बड़ी मात्रा में कनेक्टिविटी बुनियादी ढांचे का निर्माण करने में मदद की है और अफ्रीकी संघ के उपक्षेत्रीय संगठनों के साथ व्यापक सहयोग किया है। चीन अफ्रीका का सबसे बड़ा व्यापार भागीदार भी है। दोनों पक्षों के बीच सालाना 254 बिलियन डॉलर का कारोबार हो रहा है। भारत अभी इससे काफी पीछे है। पर जी20 में सभी सदस्य देशों को एक मंच पर लाकर अफ्रीका संघ को स्थाई सदस्य बनाने की भारत की सफल कोशिश के बाद अफ्रीका से हमारे संबधों का एक नया अध्याय शुरू होगा।
तीन ट्रिलियन डालर की अर्थव्यवस्था है अफ्रीकन यूनियन
अफ्रीकी देशों के संघ में 55 देश शामिल हैं। अफ्रीकी संघ के सदस्य देशों की जीडीपी लगभग तीन ट्रिलियन अमेरिकी डालर और जनसंख्या करीब 1.4 अरब है। भारत की तरह अफ़्रीकी संघ भी एक बड़ा बाजार सिद्ध होने वाला है। पर यहाँ अभी बहुत गरीबी है। पूरी दुनिया के लिए एक चुनौती है कि अफ्रीका में शांति स्थापित कर वहां क्षेत्रीय विकास का कोई बड़ा प्रोग्राम चलाया जाए। भारत खुद अफ़्रीकी देशों को बड़े पैमाने पर मदद पंहुचा जा रहा है।
अफ़्रीकी महाद्वीप नवीकरणीय ऊर्जा संपत्तियों और कम कार्बन प्रौद्योगिकियों के लिए महत्वपूर्ण खनिजों का घर है। अकेले कांगो में दुनिया का लगभग आधा कोबाल्ट मौजूद है - जो लिथियम-आयन बैटरी के लिए आवश्यक धातु है। चीन समेत सभी बड़े देश अभी तक अफ़्रीकी देशों की प्राकृतिक सम्पदाओं का दोहन ज्यादातर अपने फायदे के लिए करते रहे हैं, लेकिन जी 20 के सदस्य के रूप में अफ्रीका भी अब अपने हक़ की लड़ाई बराबरी से लड़ पायेगा।
भारत के लिए अवसर
अफ्रीका में लगभग 30 लाख भारतीय मूल के लोग रहते है, जिनमें से 10 लाख से अधिक लोग दक्षिण अफ्रीका में हैं। केन्या, तंजानिया और युगांडा में भी बड़ी संख्या में प्रवासी भारतीय पीढ़ियों से रहते आए हैं। जो प्रायः व्यापार, वाणिज्य और पेशेवर सेवाओं में है। इसकी वजह से अफ्रीका और भारत का पीपल टु पीपल कनेक्शन है। अब इसी को आधार बनाकर भारत अफ्रीका में चीन को पछाड़ने की तैयारी कर सकता है है। इसके अलावा अफ्रीकी संघ ने फ्री मूवमेंट प्रोटोकॉल को अपनाया हुआ है। यह प्रोटोकॉल उन देशों के बीच लोगों की मुक्त आवाजाही की अनुमति देता है, जो अफ्रीकी संघ का हिस्सा हैं। जी-20 में आने के बाद अफ्रीका के विभिन्न देशों में रहने वाले अप्रवासी भारतीयों को इसका लाभ अवश्य मिलेगा।
अफ्रीका के मूलभूत विकास का आधार बनेगा भारत
अफ्रीका में इन्वेस्ट करने के मामले में भारत चीन के बाद दूसरे नंबर पर है। भारत ने गत 10 साल में 2.65 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का अफ्रीका के 42 देशों को कर्ज दिया है। इस सहायता से अफ्रीका के आमजन को मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जा रही है। जिसमें बिजली, सड़क, पानी, शिक्षा जैसी जरूरी सुविधाएं शामिल है।
इसके अलावा भारत और अफ्रीकी देशों के बीच सोना, कोयला, क्रूड ऑयल और दूसरे खनिज का व्यापार होता है। पिछले साल दोनों ओर से 8.30 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा का व्यापार किया गया। भारत सरकार इसे दोगुना करना चाहती है। इसके लिए भारत हर संभव और हर मोर्चे पर एयू की सहायता कर रहा है। भारत ने बीते 9 साल में 25 नए दूतावास दूसरे देशों में शुरू किए हैं। इनमें से 18 दूतावास तो सिर्फ अफ्रीकी देशों में खोले हैं। अब भारत ने जी-20 में अफ्रीकी देशों के यूनियन को शामिल करवा दिया है। इससे साफ जाहिर होता है कि डिप्लोमेसी के लिहाज से भारत के लिए अफ्रीका महत्वपूर्ण है।
अफ्रीका में चीन से पहले मौजूद है भारतवासी
भारत ने अफ्रीका में 1950, 60 और 70 के दशक से ही अपने संबंधों को बेहतर बनाने में निवेश शुरू कर दिया था। लेकिन इस दौरान चीन का रवैया वहां मौकापरस्ती वाला रहा। भारत वहां सिर्फ निवेश करने या वहां के संसाधनों के दोहन के लिए नहीं बल्कि वहां के आमजन के मूलभूत विकास को लेकर भी चिंतित रहता है। जबकि चीन केवल अपने कारोबारी लक्ष्यों के लिए हैं। वो वहां निवेश कर रहा है और उसकी वहां के एनर्जी स्रोतों पर नजर है। जबकि भारत ने वहां जमीनी तौर पर काम किया और उसे हमेशा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपने साझीदार और सहयोगी के तौर पर देखा है।
घाना, तंजानिया, कोंगो, तंजानिया और नाइजीरिया जैसे देशों में भारतीय पीढ़ियों से रहते आ रहे हैं। इन देशों में चीनियों का पुराना इतिहास नहीं मिलेगा। वही अफ्रीकी देश भी काफी हद तक नस्लवाद की छाया से बाहर आ चुके हैं, वे चाहते हैं उनके यहां लोकतंत्र फले-फूले। लेकिन चीन लोकतांत्रिक सरकारों का समर्थन नहीं करता। ऐसे में एयू का झुकाव विश्व के सबसे बड़े लोकतांत्रिक देश भारत के प्रति बढ़ गया है।
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