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Baba Ramdevji: पोखरण के बाबा रामदेवजी ने 600 साल पहले दिया छुआछूत मिटाने का संदेश

परमाणु परीक्षण के कारण विश्व पटल पर अपनी एक अलग पहचान बना चुके राजस्थान के पोकरण कस्बे से 12 किमी उत्तर दिशा में स्थित विख्यात नगरी रुणीचा धाम है, जिसे श्रद्धालु रामदेवरा भी कहते हैं। आज से 600 साल पहले इस भूमि पर अवतरित बाबा रामदेव ने समाज में व्याप्त विभिन्न कुरीतियों को मिटाने का संदेश दिया था।

बाबा रामदेव ने अपनी 33 वर्ष की अल्प आयु में अनेक चमत्कार और समाज सुधार के कार्य कर वर्तमान रामसरोवर की पाल पर भाद्रपद सुदी एकादशी विक्रम संवत 1442 को जीवित समाधि ली थी। इन्हें ‌रामदेवजी ' रामसा पीर', " रूणीचा रा धणी', 'बाबा रामदेव', आदि उपनामों से भी जाना जाता है।

Baba Ramdevji of Pokhran

यहां प्रति वर्ष भादो महीने की शुक्ला द्वितीया से विशाल मेला शुरू होता है, जो एकादशी तक लगता है। जिसमें राजस्थान के अलावा देश के विभिन्न राज्यों से लाखों श्रद्धालु रामदेवरा आते हैं, अधिकतर जातरू अपने घर से रामदेवरा तक पैदल यात्रा करते हैं। श्रद्धालु जोधपुर के मसूरिया स्थित बाबा रामदेव के गुरु बाबा बालिनाथ की समाधि के दर्शन करने के बाद रामदेवरा के लिए रवाना होते हैं।

बाबा रामदेव को कलयुग के अवतार का दर्जा
प्रचलित लोक गाथाओं के अनुसार अंतिम हिन्दू शासक पृथ्वीराज चौहान के नाना अनंगपाल तोमर ने दिल्ली छोड़कर पाटन (सीकर) आकर अपनी अलग राजधानी बनाईं। उन्हीं अनंगपाल तोमर के वंशज अजमाल जी (तंवर) थे। अजमाल की कोई संतान नहीं थी। इस कारण राजा अजमाल एवं उनकी राणी मैणादे बैचेन एवं दुखी रहते थे। ऐसा माना जाता है कि उनकी प्रार्थना और भक्ति से प्रभावित होकर द्वारकाधीश भगवान ने ही उनके घर जन्म लिया।

प्रचलित लोक धारणाओं के अनुसार अजमाल जी के घर पहले पुत्र का जन्म हुआ, जिसका नाम बिरमदेव रखा गया और उसके बाद विक्रम संवत 1409 चैत्र सुदी पंचमी के दिन बाबा रामदेव का जन्म हुआ। कलयुग के अवतारी बाबा रामदेव ने अपने शैशव काल में ही दिव्य चमत्कारों से देव पुरुष सी प्रसिद्धि पा ली थी।

पश्चिमी राजस्थान में भैरव राक्षस का किया था अंत
प्रचलित लोक गाथाओं के अनुसार बालक रामदेव ने एक दिन अपने साथियों के साथ खेलते-खेलते गेंद को इतना दूर फेंक दिया कि सभी साथियों ने गेंद लाने में असमर्थता जताई। तब रामदेव गेंद लाने के बहाने वर्तमान पोकरण की घाटी पर स्थित साथलमेर पहुंचे। बालक रामदेव को सुनसान पहाड़ी पर अकेले देखकर पहाड़ी पर धूना लगाए बैठे गुरु बालीनाथ ने देखा तो कहा कि जहां से आया है, वापस चला जा, यहां पर रात को भैरव राक्षस आता है। तब बाबा रामदेव ने रात के समय वहां पर रुकने की प्रार्थना की तो बालीनाथ ने अपनी कुटिया (आश्रम) में पुरानी गुदड़ी ओढ़ाकर बालक रामदेव को चुपचाप सो जाने को कहा।

अर्द्धरात्रि के समय भैरव राक्षस ने वहां आकर बालीनाथ से कहा कि आप के पास कोई मनुष्य है, मुझे मानुषगंध आ रही है तो बालीनाथ ने भैरव से कहा कि यहां पर मनुष्य कहां से आया। लेकिन रामदेव ने अपने पैर से गुदड़ी को हिलाया तो भैरव की नजर गुदड़ी पर पड़ी तो वह गुदड़ी खींचने लगा। बाबा के चमत्कार से गुदड़ी द्रौपदी के चीर की तरह बढ़ने लगी। गुदड़ी को खींचते-खींचते भैरव राक्षस हांफ कर भागने लगा तो रामदेव ने बालीनाथ महाराज से आज्ञा लेकर भैरव राक्षस का वध कर लोगों को उसके आंतक से मुक्ति दिलाई। भैरव राक्षस का वध करने के बाद रामदेव ने भैरव राक्षस की गुफा से उत्तर दिशा की तरफ कुंआ खुदवा कर रुणीचा गांव बसाया। जिसे रामदेवरा के नाम से भी जाना जाता है।

मुसलमान भी मानते हैं रामसा पीर के चमत्कार
कहा जाता है कि एक बार बाबा रामदेव की परीक्षा लेने के लिए पांच पीर आये, उस समय बाबा रामदेव जंगल में घोड़ों को चरा रहे थे और पीरों को देखकर पूछा आप कहां से आएं है और कहां जायेंगे? जब उन पीरों ने अपने आने का पूरा वृतांत सुनाया तो बाबा रामदेव ने बड़े आदर सत्कार के साथ उन पीरों को भोजन परोस कर पीरों से भोजन करने को कहा तो उन पांचों पीरों ने दूसरे के बर्तन में खाना खाने को मना करते हुए कहा कि हम तो अपने ही बर्तनों में भोजन करते है और उन बर्तनों को अपने मक्का (सऊदी अरब) पर ही भूल आए हैं।

बाबा रामदेव ने उनके द्वारा परीक्षा लेने की बात को समझते हुए तुरंत हाथ पसारा और वही कटोरे उन पीरों को दिए और कहा कि अपने अपने कटोरे को पहचान कर ले लो तो उन पीरों ने नमन करते हुए कहा कि हम तो पीर है। पर आप पीरों के भी पीर‌ हैं। यह कह कर उन्हें रामसापीर की उपाधि दी और तब से लेकर आज दिन तक मुसलमान भी बाबा रामदेव को रामसा पीर के नाम से मानते हैं।

समाज सुधारक और छुआछूत विरोधी थे बाबा रामदेव
उस समय अस्पृश्यता एवं भेदभाव ने समाज को बुरी तरह जकड़ रखा था। मगर बाबा रामदेव ने क्षत्रिय कुल में जन्म लेकर भी अछूत समझी जाने वाली जातियों को गले लगाया। वे उनके घरों में जाकर उनके साथ भजन सत्संग करने लगे। दलित और हीन कहे जाने वाले लोगों के साथ उठने-बैठने को लेकर उनके रिश्तेदारों तक ने बाबा रामदेव के यहां आना-जाना व बोलना बंद कर दिया था। मगर बाबा रामदेव ने इनकी परवाह नहीं की। उसी के फलस्वरूप अछूत समझी जाने वाली बाबा की अनन्य भक्त डालीबाई ने बाबा रामदेव से पहले समाधि ली। आज भी बाबा के भक्तों की संख्या में पिछड़ी जातियों के लोग अधिक हैं, जो लाखों की संख्या में पैदल चलकर रामदेवरा पहुंचते हैं। बाबा रामदेव ने 33 वर्ष की अल्प आयु में ही अनेक चमत्कार और समाज सुधार के कार्य कर भाद्रपद सुदी एकादशी विक्रम संवत 1442 को जीवित समाधि ले ली।

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