Atal Bihari Vajpayee: 'हार नहीं मानूंगा, रार नहीं ठानूंगा, पढ़ें देश के 'भारत रत्न' की दिल छूने वाली कविताएं
Atal Bihari Vajpayee's 100th birth anniversary: आज देश के पूर्व पीएम और 'भारत रत्न' से सम्मानित अटल बिहारी वाजपेयी की 100वीं जयंती हैं, पूरा भारत अपने इस महान राजनेता और लोकप्रिय कवि को याद कर रहा है।
अटल बिहारी वाजपेयी का नरम अंदाज, प्रभावशाली व्यक्तित्व और मिलनसार स्वभाव का तो मुरीद विरोधी दल भी था। उनका सम्मान करने वालों की लिस्ट में पक्ष और विपक्ष दोनों ही शामिल रहा है और यही कारण था उनकी अंतिम विदाई में समूचा भारत शोक में डूब गया था।

आज भले ही अटल बिहारी वाजपेई हमारे बीच सशरीर मौजूद नहीं हैं लेकिन उनके विचार उनकी कविताएं आज भी लोगों के जेहन में जिंदा हैं।
'मेरी कविता युद्ध की घोषणा है, पराजय का बहाना नहीं'
25 दिसंबर 1924 को मध्य प्रदेश के ग्वालियर में जन्मे अटल बिहार वाजपेयी ने कहा था कि 'मेरी कविता युद्ध की घोषणा है, पराजय का बहाना नहीं। यह पराजित सैनिक की निराशा की ढोल की थाप नहीं है, बल्कि युद्धरत योद्धा की जीतने की इच्छा है। यह निराशा की हताश आवाज़ नहीं है, बल्कि जीत की उत्साहपूर्ण पुकार है।'
आइए उनके 100वें जन्मदिन पर पढ़ते हैं उनकी कुछ दिल छू लेने वाली रचनाएं...
- गीत नहीं गाता हूं
- बेनक़ाब चेहरे हैं,
- दाग़ बड़े गहरे हैं
- टूटता तिलिस्म आज सच से भय खाता हूं
- गीत नहीं गाता हूं
- लगी कुछ ऐसी नज़र
- बिखरा शीशे सा शहर
- अपनों के मेले में मीत नहीं पाता हूं
- गीत नहीं गाता हूं
- पीठ मे छुरी सा चांद
- राहू गया रेखा फांद
- मुक्ति के क्षणों में बार बार बंध जाता हूं
- गीत नहीं गाता हूं
- अन्तर की चीर व्यथा पलकों पर ठिठकी
- हार नहीं मानूंगा
- रार नई ठानूंगा,
- काल के कपाल पे लिखता मिटाता हूं
- गीत नया गाता हूं
ठन गई! मौत से ठन गई!
- ठन गई! मौत से ठन गई!
- जूझने का मेरा इरादा न था,
- मोड़ पर मिलेंगे इसका वादा न था
- रास्ता रोक कर वह खड़ी हो गई,
- यों लगा ज़िंदगी से बड़ी हो गई
- मौत की उमर क्या है? दो पल भी नहीं,
- ज़िंदगी-सिलसिला, आज-कल की नहीं
- मैं जी भर जिया, मैं मन से मरूँ,
- लौटकर आऊँगा, कूच से क्यों डरूं?
- तू दबे पाँव, चोरी-छिपे से न आ,
- सामने वार कर फिर मुझे आज़मा
- मौत से बेख़बर, ज़िंदगी का सफ़र,
- शाम हर सुरमई, रात बंसी का स्वर
- बात ऐसी नहीं कि कोई ग़म ही नहीं,
- दर्द अपने-पराए कुछ कम भी नहीं
- प्यार इतना परायों से मुझको मिला,
- न अपनों से बाक़ी है कोई गिला
- हर चुनौती से दो हाथ मैंने किए,
- आँधियों में जलाए हैं बुझते दिए
- आज झकझोरता तेज़ तूफ़ान है,
- नाव भँवरों की बाँहों में मेहमान है
- पार पाने का क़ायम मगर हौसला...
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मन से कुछ बोलें
- अपने ही मन से कुछ बोलें
- क्या खोया, क्या पाया जग में
- मिलते और बिछुड़ते मग में
- मुझे किसी से नहीं शिकायत
- यद्यपि छला गया पग-पग में
- एक दृष्टि बीती पर डालें,
- यादों की पोटली टटोलें
- पृथिवी लाखों वर्ष पुरानी
- जीवन एक अनंत कहानी
- पर तन की अपनी सीमाएँ
- यद्यपि सौ शरदों की वाणी
- इतना काफ़ी है, अंतिम दस्तक पर ख़ुद दरवाज़ा खोलें
- जन्म-मरण का अविरत फेरा
- जीवन बंजारों का डेरा
- आज यहाँ, कल कहाँ कूच है
- कौन जानता किधर सवेरा
- अँधियारा आकाश असीमित, प्राणों के पंखों को तौलें
- अपने ही मन से कुछ बोलें












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