Assam Politics: लोकसभा चुनाव से पहले असम काँग्रेस में भगदड़, बीजेपी के सामने भी चुनौती
Assam Politics: असम की 14 लोकसभा सीटों पर बीजेपी गठबंधन और काँग्रेस के नेतृत्व में इंडिया गठबंधन के बीच सीधा मुकाबला होना है। हालांकि असम में एक फैक्टर ऑल इंडिया यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (एआईयूडीएफ) भी है, जिसके नेता बदरुद्दीन अजमल हैं, जो इस समय राज्य की धुबरी सीट से लगातार तीसरी बार सांसद हैं।
पिछले लोक सभा चुनाव में बीजेपी के 9, काँग्रेस के 3 और एक अन्य उम्मीदवार ने चुनाव जीता था। मुख्यमंत्री हेमंत बिस्वा सरमा का दावा है कि इन बार बीजेपी 11 सांसदों को लोकसभा में भेजेगी। इस बीच असम काँग्रेस मे भगदड़ मच गई है, और काँग्रेस के विधायक पार्टी छोड़ कर जा रहे हैं।

असम के चुनावी मुद्दे
पिछले कुछ चुनावों की तरह इस बार भी असम में चुनाव के मुद्दे बांग्लादेशी घुसपैठिये, हिंदुत्व और मोदी के काम के साथ हेमंत बिस्वा सरमा सरकार का कामकाज भी होंगे। बीजेपी असम में यह माहौल बनाने में सफल रही है कि कांग्रेस ने अपने लंबे शासन में बांग्लादेशी घुसपैठियों को रोकने के लिए कुछ नहीं किया।
लाखों बांग्लादेशी मुसलमान अवैध रूप से असम में घुस आए लेकिन कांग्रेस उनके खिलाफ कार्रवाई करने के बजाय बांग्लादेशी घुसपैठियों को आधार कार्ड और वोटर आईडी प्रदान कर अपना वोट बैंक बढ़ाती रही। अब केंद्र में मोदी सरकार एनआरसी के जरिए और राज्य में हेमंत बिस्वा सरमा सरकार अवैध मुस्लिम संगठनों और मदरसों पर कार्रवाई के जरिए घुसपैठ की समस्या का हल निकाल रही हैं।
हिंदुत्व भी लोकसभा चुनाव में बीजेपी की ओर से बड़ा मुद्दा होगा। असम के आम हिंदुओं में यह बात बैठ गई थी कि कांग्रेस पार्टी वोट पाने के लिए अल्पसंख्यकों का तुष्टीकरण करती है और हिंदुओं की उपेक्षा करती है। बीजेपी ने इस मुद्दे को उठाया और असम में कांग्रेस पार्टी को सत्ता से बेदखल कर दिया। अब लगातार दो बार विधान सभा का चुनाव जीतकर हिंदुत्व का माहौल बनाने में बीजेपी सफल रही है। फिर हेमंत बिस्वा सरमा असम के लोकप्रिय राजनेताओं में से एक हैं।
मोदी असम में महत्त्वपूर्ण फैक्टर
पीएम मोदी असम में एक बहुत बड़े फैक्टर के रूप में शामिल हैं। उन्होंने असम के लोगों को भाजपा को वोट देने के लिए बहुत अच्छे से मना लिया है। मोदी ने असम को 'ए' यानी सबसे ऊपर का राज्य बनाने का सपना लोगों को दिखाया है। उनका पूरे पूर्वोत्तर को बेहतर बनाने का प्रयास भी असम की जनता को लुभाने में एक बड़ी भूमिका निभाएगा।
मोदी और शाह के अलावा सर्बानंद सोनोवाल और हेमंत बिस्वा सरमा के रूप में बीजेपी के पास स्थानीय लोकप्रिय नेता भी हैं। बीजेपी का एजीपी और यूपीपीएल के साथ गठबंधन भी है। मूल असमिया वर्ग में एजीपी की अच्छी पैठ है और बोडो लोग अपने क्षेत्र में यूपीपीएल का समर्थन करते हैं।
मुस्लिम आबादी भी प्रभावी
असम में 40 प्रतिशत मुस्लिम हैं (2011 में 35%) और लगभग 37 प्रतिशत मतदाता हैं। मुसलमानों की अधिकांश आबादी निचले असम और बराक घाटी में है। दक्षिण सलामर जैसे जिलों में तो इनकी जनसंख्या 98 प्रतिशत तक हो जाती है। 11 जिलों में मुस्लिम आबादी 50 प्रतिशत तो 14 जिलों में लगभग 40 प्रतिशत या उससे अधिक है।
विधानसभा के नजरिए से देखें तो कुल 126 सीटों मे से 33 मुस्लिम बहुल सीटें हैं। पिछले विधानसभा चुनाव में 31 मुस्लिम विधायक जीते, जिनमें भाजपा से कोई नहीं था। कांग्रेस के 16 और एआईयूडीएफ के 15 मुस्लिम विधायक हैं। अब सवाल यही है कि क्या मुस्लिम आबादी का कुछ हिस्सा इस बार बीजेपी के लिए वोट करेगा या एकतरफा एंटी बीजेपी ही वोट पड़ेंगे।
सीएए और एनआरसी के विरोध के नाम पर इस बार कांग्रेस, एआईयूडीएफ और वाम दल एक साथ आ सकते हैं। बीजेपी को ऊपरी, उत्तरी और मध्य असम में पहले से बढ़त मिली हुईं है। इसके अलावा बराक घाटी और निचले असम में भी पार्टी काफी मजबूत स्थिति में है।
विकास भी मुद्दा होगा इस बार
केंद्र हो या भाजपा की राज्य सरकार, परिवहन, सड़क और संचार जैसे बुनियादी ढांचे पर असम में भी कई परियोजनाएं चल रही हैं। मोदी सरकार ने पिछले 5 वर्षों में महिलाओं, छात्रों और चाय श्रमिकों के लिए कई कल्याणकारी योजनाएं लागू की है। कोविड-19 के समय मुख्य मंत्री हेमंत विश्व शर्मा ने बहुत अच्छा काम किया। लोग राज्य सरकार के काम से संतुष्ट थे।
काँग्रेस के लिए कितना चुनौतीपूर्ण होगा असम का लोक सभा चुनाव
काँग्रेस 2001 से लेकर 2016 तक लगातार 15 साल असम में काबिज रही, लेकिन इधर के कुछ वर्षों में पार्टी बिखराव पर है। बंगाली बहुल बराक घाटी के एक प्रमुख नेता, विधायक कमलाख्या डे पुरकायस्थ ने पार्टी की राज्य इकाई के कार्यकारी अध्यक्ष पद से इस्तीफा दे दिया है।
चर्चा यह भी है कि कुछ और विधायक भाजपा में शामिल हो सकते हैं। ये विधायक तरुण गोगोई के नेतृत्व वाली कांग्रेस सरकार में मंत्री थे। असम विधानसभा में कांग्रेस विधायक दल के नेता देबब्रत सैकिया यह आरोप लगा रहे हैं कि सीएम सरमा कांग्रेस नेताओं को भाजपा में शामिल होने के लिए मजबूर करने के लिए ईडी और इनकम टैक्स विभाग का इस्तेमाल कर रहे हैं।
यही नहीं असम काँग्रेस के कार्यकारी अध्यक्ष और जोरहाट के पूर्व विधायक राणा गोस्वामी ने भी कांग्रेस महासचिव (संगठन) केसी वेणुगोपाल को पत्र लिख कर अपने इस्तीफे की घोषणा कर दी है। गोस्वामी कांग्रेस नेता राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा की असम में तैयारी में सबसे आगे थे। कांग्रेस के पास अब 126 सदस्यीय विधानसभा में केवल 23 विधायक हैं।
काँग्रेस लोकसभा चुनाव में बेरोजगारी को सबसे बड़ा मुद्दा बनाना चाहेगी। असम में नौकरियों का मुद्दा भाजपा के खिलाफ काम कर सकता है, क्योंकि असम में बेरोजगारी दर राष्ट्रीय औसत से थोड़ी अधिक है और इसी पर कांग्रेस अपने अभियान में जोर दे रही है। मौजूदा सरकार के लिए महंगाई भी अच्छी खबर नहीं है और यह बेरोजगारी से कहीं अधिक चुनावी नतीजों को प्रभावित करने वाली बन सकती है। हालांकि सरमा की सरकार ने श्रमिकों की मजदूरी में बढ़ोतरी की है।












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