राजदीप सरदेसाई को आर्ट ऑफ लिविंग का जवाब

Disclaimer: इस लेख में प्रस्तुत विचार लेखक के हैं, वनइंडिया मात्र एक प्लेटफॉर्म है लेखक की बात दुनिया तक पहुंचाने का।

भारतवर्ष की राजधानी नई-दिल्ली में आयोजित 'विश्व सांस्कृतिक महोत्सव' से पूरी दुनिया आश्चर्यचकित है। कोई इसे 'हैपेनिंग्स इंडिया' कर रहा है, तो कुछ लोग इसे 'सांस्कृतिक ओलम्पिक' की भारत से शुरूआत की संज्ञा दे रहे हैं। विश्व के कई हिस्सों से इस तरह का आयोजन करने हेतु 'आर्ट ऑफ लिविंग' को निवेदन आ रहे हैं।

Art of Living takes on Rajdeep Sardesai on World Cultural Fest note

जिस प्रकार विकसित देशों से लेकर विकाशील देशों के पक्ष विपक्ष के राजनेता तथा धार्मिक गुरू एक मंच पर आए, उससे दुनिया अचंभित और रोमांचित है। कहना न होगा कि मध्यपूर्व के देशों से लेकर अफ्रीका, यूरोप तथा एश‍िया सहित उत्तरी और दक्षिणी अमेरिका के राजनितीक और धार्मिक नेताओं ने विश्व के वर्तमान परिदृश्य में 'विश्व सांस्कृतिक महोत्सव' को आपसी संवाद बढ़ाने तथा शांति स्थापित करने का मंच माना।

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राजदीप सरदेसाई को आर्ट टॉफ लिविंग का जवाब

राजदीप सरदेसाई को आर्ट टॉफ लिविंग का जवाब

संपूर्ण विश्व की मौजूदगी के बावजूद आयोजनकर्ता देश भारत के एक बड़े राजनैतिक वर्ग ने इस महोत्सव का बहिष्कार किया। मीडिया का एक वर्ग इस पर कीचड़ भी उछालता रहा। उल्लेखनीय है कि श्रीश्री रविशंकर के संवाददाता सम्मेलन में भारतीय मीडिया के इस गुट के नकारात्मक व्यवहार पर विदेशी संवाददाताओं ने टिप्पणी भी की थी।

किसी भी घटना या आयोजन पर अपना विचार व्यक्त किया जा सकता है, पर 'विश्व सांस्कृतिक महोत्सव' की आड़ में जिस प्रकार प्रत्रकारों के एक समूह द्वारा श्रीश्री पर व्यक्तिगत हमला करना शुरू किया है, इससे प्रतीत होता है कि वे किसी मंतव्य या मंशा से प्रेरित हैं। अतः आवश्यक है कि जनहित में इसका मूल्यांकन किया जाये।

विश्व सांस्कृतिक महोत्सव में नहीं हुआ कानून का उल्लंघन

पिछले सप्ताह टेलीविजन प्रत्रकार राजदीप सरदेसाई ने अपने साप्ताहिक कॉलम के माध्यम से आर्ट ऑफ लिविंग तथा इसके प्रणेता श्री श्री रविशंकर पर व्यक्तिगत हमला किया। राजदीप ने लिखा कि राष्ट्रीय हरित न्यायालय ने 'आर्ट ऑफ लिविंग' पर पांच करोड़ का जुर्माना लगाया है और यह भी कि श्रीश्री ने पर्यावरण नियमों का उल्लंघन किया। पर वास्तविकता यह है कि न्यायालय ने साफ-साफ कहा है कि 'आर्ट ऑफ लिविंग' ने किसी भी कानून का उल्लंघन नहीं किया है।

राजदीप, अच्छा होता कि आप कम से कम कानूनी उल्लंघन की बात नहीं करते। 'कैश फॉर वोट' कांड में आपकी आपराधिक भूमिका से देश परिचित है। ब्रिटेन या अन्य यूरोपियन देशों में आप होते तो अभी तक जेल की हवा खाते रहते। यहां यह बताते चलें कि राजदीप ने इस कांड में कई आपराधिक षढ़यंत्रों को रचा और संबंधित कानूनों की धज्जिया उड़ाई। प्रसारण नियमावली का उल्लंघन किया तथा दर्शकों और पाठकों को उनके कानूनी और परम्परागत अधिकारों से वंचित किया।

उल्लेखनीय है कि 'वोट फॉर कैश' मामले में 'मीडिया स्टडी ग्रुप' के शोध ने आपको प्रत्यक्ष तौर पर दोषी माना है। यह कांड तो केवल एक उदाहरण मात्र है, आपके प्रत्रकारिता जीवन में कानूनी उल्लंघन के कई ज्ञात तथ्य हैं।

गुजरात, असम दंगे पर रिपोर्टिंग

पुनः आम और खास आदमी, जाति वर्ग तथा समूदाय के चश्में से देश को देखना कहां तक सही है। आपने गुजरात दंगे के समय हिन्दु-मुस्लिम समुदाय की पहचान करते हुए रिपोर्टिंग की थी, परिणाम स्वरूप गुजरात के गांवों तक दंगा फैल गया था। पुनः रिपोर्ट में आपने दंगाईयों और पीड़ितों की धार्मिक पहचान उजागर करते रहे, जिससे दंगा और भड़क गया।

क्या यह सत्य नहीं है कि असम दंगे पर आपने सोशल साईट ट्विटर पर ट्विट किया था, कि जब तक असम दंगे में 1000 हिन्दु नहीं मारे जाऐंगे तब तक राष्ट्रीय चैनलों पर असम दंगे की खबरें नहीं दिखाई जानी चाहिये, और यह कि हम अपने चैनल आईबीएन 7 पर असम दंगे की खबरें किसी भी परिस्थिति में नहीं दिखाएंगे। एक समुदाय विशेष के बारे में जहर उगलना कहां तक जायज है। आर्ट ऑफ लिविंग तो 'वसुधैव कुटुंबकम' की बात करती है।

सीरिया, इराक जाने की बात की होती

आपने श्रीश्री के 2001 में विश्व हिन्दु परिषद संसद में शामिल होने तथा भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन में 'अन्ना हजारे' का साथ देने की बात कही है। अच्छा होता इसके साथ-साथ आप श्रीश्री के सीरिया, ईराक, दक्षिणी अमेरिकी देश कोलम्बिया तथा भारत के अन्य हिंसा ग्रस्त और तनाव ग्रस्त क्षेत्रों में भी जाने की बात की होती।

आपको स्मरण करा दें कि 2001 के संत सम्मेलन में श्री श्री ने हिस्सा अवश्य लिया था परंतु उन्होंने वहां एक शब्द भी नहीं बोला था। क्या आपने इतने वर्ष की पत्रकारिता के जीवन में किसी विश्व हिन्दु परिषद के नेता का साक्षात्कार किया या उनके साथ बैठे?

दिल्ली को हुआ बड़ा लाभ

जहां तक महोत्सव का सरकारी और सार्वजनिक उपक्रमों द्वारा आयोजित होने की बात है, तो आईबीएन लाईव की रिपोर्ट कहती है कि सुस्त कारोबार से परेशान दिल्ली के होटल उद्यमियों को विश्व सांस्कृतिक महोत्सव से बड़ी राहत मिली। और होटलों के कमरे 100 प्रतिशत तक भर गए थे। यहां तक कि एक रिपोर्ट के अनुसार, उद्यमियों की मानें तो इतनी बुकिंग तीन-चार साल बाद हुई है।

इसके अलावा एक शोध के अनुसार 'विश्व सांस्कृतिक महोत्सव' से वित्तीय वर्ष 2015-16 में दिल्ली राज्य की जीडीपी में 2500 करोड़ की अनुमानित बढ़ौतरी हुई है। शोध आगे बताता है कि 'विश्व सांस्कृतिक महोत्सव' के माध्यम से हवाई यात्रा उद्योग को 266 करोड़, होटल उद्योग को 350 करोड़, दिल्ली मेट्रो को 2360 करोड़ तथा पर्यटन उद्योग को भी लगभग 1610 करोड़ की आय हुई।

पारर्श‍िता जरूरी

आपने श्रीश्री को बड़े तथा धनी लोगों के गुरू कहा है, उनको दिल्ली में आलिशान बंगले में ठहरने की बात की। अच्छा होता आप लिखने से पहले श्रीश्री के 35 वर्षों की जीवन यात्रा पर थोड़ा शोध कर लेते। साथ ही राष्ट्र्हित में आप अपने निवास स्थान का पता बताते। सूत्रों की माने तो आपने भी दिल्ली में करोड़ों का बंगला खरीदा है। अच्छा होगा अगर आप स्वयं इसकी पुष्टि करते हुए इसमें प्रयुक्त 'धन के स्रोत' पर भी प्रकाश डालते तो हम सभी को समझने में आसानी होती। क्योंकि वर्तमान में देश के हर व्यक्त‍ि की एक ही मांग है, पारदर्श‍िता।

आपने विश्व सांस्कृतिक आयोजन के पीछे नोबल पुरस्कार हासिल करने की गैर जिम्मैदाराना टिप्पणी की है। गुजरात दंगे को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाने के लिए आपको इंटरनेश्नल ब्रॉडकास्टिंग अवार्ड और 2003 में उर्दू प्रेस क्लब द्वारा 'जरूरत' पुरस्कार दिया गया। इसी रिपोर्टिंग के लिए तत्कालीन यूपीए की सरकार ने 2008 में आपको 'पद्म पुरस्कार' से भी नवाजा था। जानकारों की मानें तो अब आपकी नजर एक दल विषेष द्वारा राज्य सभा की सीट पर है।

देश यह जानना चाहेगा कि एक दल तथा विचारधारा विशेष के लिए कार्य करना भारतीय लोकतंत्र के स्तंभ को कितना मजबूत किया है?

दाऊद महान राष्ट्रभक्त कैसे?

विश्व सांस्कृतिक महोत्सव में एक मौलवी द्वारा 'पाकिस्तान जिन्दाबाद' की बात कही तो उसे बढ़ा-चढ़ा कर दिखाया गया, उस वाक्ये का क्या जिसमें आपने कहा था कि 'मैं राष्ट्र्द्रोही हूं' बाद में इसके समर्थन में आपने चाहे जो भी तर्क प्रस्तुत किया हो, पर क्या यह सत्य नहीं है कि 1993 के अंग्रेजी दैनिक 'टाईम्स ऑफ इंडिया' के एक लेख में आपने दाउद इब्राहिम को 'महान राष्ट्र्भक्त' बताया था। तथ्य यह है कि देश की अदालतों में इस भगौड़े पर राष्ट्र्द्रोह के मुकदमें हैं। अच्छा होगा कि दाउद को 'राष्ट्र्भक्त' की उपाधि देने के पीछे के निहीतार्थों पर प्रकाश डालें।

देश हित में बताते चलें कि निर्भया कांड के बाद लोग दिल्ली जाने से डरते थे पर 'विश्व सांस्कृतिक महोत्सव' के अवसर पर 20,000 से अधिक विदेशी इसमें भाग लेने के लिए आए। दुनिया के कुल 18 प्रतिषत अर्थात 126 करोड़ लोगों ने संचार के अन्य माध्यमों से इसे देखा। दुनिया को तनाव एवं हिंसा मुक्त बनाने की दिशा में इस महोत्सव को लोगों ने एक उम्मीद की तरह देखा। कूटनीति एवं पर्यावरण के दृष्टिकोण से भी संपूर्ण विश्व पर इस आयोजन से सकारात्मक प्रभाव पड़ा है। उम्मीद है आप सकारात्मक दिशा की ओर बढ़ते भारत के साथ खड़े होंगे।

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