अमृतसर का हनुमान मंदिर, जहां बच्चे बनते हैं लंगूर
नई दिल्ली/अमृतसर(विवेक शुक्ला) यूं तो अमृतसर मुख्य रूप से स्वर्ण मंदिर के लिए मशहूर है, पर इधर ‘‘बड़ा हनुमान मंदिर'' भी कम महत्वपूर्ण नहीं है। यहां हर साल लंगूरों का मेला लगता है और यहां देश और विदेश से बच्चे लंगूर बनने के लिए आते हैं।

अमृतसर के नामवर लेखक सुरिन्द्र कुमार बिल्ला ने बताया कि इस अति प्राचीन मंदिर में स्थापित श्री हनुमान जी की मूर्ति बैठी हुई मुद्रा में है जैसे हनुमान जी विश्राम की मुद्रा में बैठे हों। इसके अलावा लंगूरों का मेला और कहीं नहीं लगता है।
माना जाता है कि यह मंदिर उस पवित्र धरती पर बना हुआ है जहां श्री रामायण काल में भगवान श्री राम की सेना और लव-कुश के मध्य हुए युद्ध के समय हनुमान जी को वट वृक्ष के साथ बांध दिया गया था क्योंकि श्री हनुमान जी लव-कुश से अश्वमेध यज्ञ का घोड़ा छुड़वाने के लिए आगे बढ़े थे। वह वट वृक्ष आज भी विद्यमान है।
नवरात्र पर लगता मेला
हर साल कार्तिक महीने के पहले नवरात्रे से शुरू होकर यह मेला 10 दिन चलता है। महिलाओं इधर श्री हनुमान जी पूरी श्रद्धा से मन्नत मांगने के लिए बड़ी तादाद में पहुंचती हैं। मन्नत पूरी होने पर सैंकड़ों की संख्या में छोटे-छोटे लड़के विशेष प्रकार का लाल रंग का जरी वाला चोला पहनते हैं और हाथ में छड़ी लिए हुए मंदिर के अंदर-बाहर मैदान में अपने सगे-संबंधियों के साथ नाचते हुए एक निराला दृश्य प्रस्तुत करते हैं।
बिल्ला के अनुसार, पहले दिन पूजा जिसमें मिठाई, नारियल, 2 पुष्प हार अर्पित करना, पुजारी जी से आशीर्वाद लेकर वर्दी धारण करना, फिर ढोल की ताल पर नाचना और प्रतिदिन दो समय माथा टेकने मंदिर में आना। जमीन पर सोना, जूते-चप्पल नहीं पहनना, चाकू की कटी हुई कोई चीज नहीं खाना।
खान-पान वैष्णों, लंगूर किसी घर के अंदर नहीं जाएगा, सिर्फ अपने घर जा सकता है। बीमार होने पर मंदिर से भभूति ग्रहण करेगा। लंगूर बनने वाला सूई धागे का काम और कैंची नहीं चला सकता। उसे 11 बार हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए।
लंगूर को मंदिर में माथा टेकने के लिए वही व्यक्ति ला सकता है जिसका बच्चे के साथ खून का रिश्ता है। लंगूर बनने वाले बच्चे के माता-पिता खेत्री नहीं बीज सकते। कंजकें नहीं बिठा सकते। अमृतसर निवासियों के लिए तो यह बेहद अहम मंदिर है। यहां पर हिन्दू-सिख सभ पहुंचते हैं।












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