Amarnath Yatra: अमरनाथ यात्रा का क्या है इतिहास और महत्व, जानिए अमरत्व की कहानी
62 दिनों तक चलने वाली श्री अमरनाथ जी यात्रा 1 जुलाई 2023 को शुरू होगी और 31 अगस्त 2023 को समाप्त होगी।

Amarnath Yatra: जम्मू और कश्मीर के उपराज्यपाल मनोज सिन्हा ने कहा है कि अमरनाथ यात्रा के दौरान तीर्थयात्रियों की सुविधा हेतु सरकार हरसंभव व्यवस्था को सुनिश्चित करने लिए प्रतिबद्ध है। उन्होंने कहा कि अमरनाथ श्राइन बोर्ड के अधिकारी श्रद्धालुओं की जरूरतों का ध्यान रखने के लिए कड़ी मेहनत कर रहे हैं। सिन्हा ने कहा कि दुनियाभर के लाखों श्रद्धालुओं के लिए बाबा अमरनाथ की पवित्र गुफा की यात्रा करना एक सपने जैसा होता है।
उपराज्यपाल ने अमरनाथ यात्रा की सफलता को सुनिश्चित करने के लिए स्थानीय लोगों की भागदारी की भी सराहना की और कहा कि इस यात्रा से आजीविका के अवसर बढ़ेंगे और स्थानीय अर्थव्यवस्था को बढ़ावा मिलेगा। गौरतलब है कि इस वर्ष अमरनाथ यात्रा 1 जुलाई को शुरू हो रही है और 31 अगस्त को इस यात्रा का समापन हो जाएगा। प्रारंभ में अमरनाथ यात्रा की अवधि 15 दिन से लेकर एक महीने तक की होती थी। लेकिन, साल 2004 में श्री अमरनाथजी श्राइन बोर्ड ने तीर्थयात्रा की अवधि को बढ़ाकर दो महीने तक करने का फैसला किया।
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बता दें कि अमरनाथ यात्रा को लेकर सरकार ने शेड्यूल भी जारी कर दिया है। इस यात्रा के लिए पंजीकरण की प्रक्रिया 17 अप्रैल 2023 को ही ऑनलाइन और ऑफलाइन दोनों माध्यमों से शुरू कर दी गई थी।
क्या है अमरनाथ यात्रा का इतिहास?
श्री अमरनाथ जी श्राइन बोर्ड की वेबसाइट के अनुसार महर्षि भृगु पवित्र अमरनाथ गुफा के दर्शन करने वाले पहले व्यक्ति थे। मान्यता यह है कि जब एक बार कश्मीर घाटी पानी में डूब गई थी, तो महर्षि कश्यप ने नदियों और नालों के माध्यम से पानी को बाहर निकाला था। उन दिनों ऋषि भृगु हिमालय की यात्रा पर उसी रास्ते से आए थे और तपस्या के लिए एकांतवास की खोज में थे। तभी उन्हें बाबा अमरनाथ की पवित्र गुफा के दर्शन हुए। तब से लाखों भक्त श्रावण (जुलाई-अगस्त) के महीने में इस पवित्र गुफा के दर्शन करने लगे।
हालांकि, पुराणों में पवित्र अमरनाथ गुफा के अस्तित्व का उल्लेख किया गया है। इसके साथ ही इतिहासकार कल्हण ने भी अपनी पुस्तक 'राजतरंगिणी' में अमरनाथ गुफा का जिक्र किया है। फ्रांस के यात्री फ्रांस्वा बर्नियर ने भी अपनी पुस्तक में अमरनाथ यात्रा का विस्तार से जिक्र किया है। लेकिन, एक कहानी यह भी प्रचलित है कि साल 1850 में बूटा मलिक नाम के एक चरवाहे ने अमरनाथ गुफा की फिर से खोज की थी।
कहा जाता है कि एक साधु ने बूटा मलिक को कोयला से भरा थैला दिया। घर पहुंचने पर जब उसने उस थैले को खोला, तो थैला सोने के सिक्कों से भरा हुआ था। इससे वह बहुत खुश हुआ और साधु को धन्यवाद देने के लिए वह घर से बाहर निकला। लेकिन, साधु वहां से गायब हो गए थे। फिर इस चरवाहे ने वहां पर पवित्र गुफा और बर्फ से बने शिवलिंग को देखा। इसके बाद उसने इस खोज के बारे में ग्रामीणों को बताया। तभी से यह तीर्थयात्रा का एक पवित्र स्थल बन गया।
स्वामी विवेकानंद ने किये थे पवित्र गुफा के दर्शन
भगिनी निवेदिता ने अपनी पुस्तक 'नोट्स ऑफ सम वांडरिंग विद स्वामी विवेकानंद' में कहा है कि स्वामी विवेकानंद ने साल 1898 में अमरनाथ गुफा के दर्शन किए थे। इस पुस्तक में कहा गया है कि जब स्वामीजी पवित्र अमरनाथ गुफा पहुंचे, तो उन्होंने कहा कि आज भगवान शिव ने मुझे साक्षात दर्शन दिया। उन्होंने कहा कि मैंने आज तक ऐसा सुंदर और प्रेरणादायक स्थान नहीं देखा है और न ही किसी धार्मिक स्थल का इतना आनंद लिया है।
अमरनाथ गुफा की कहानी
लोक कथाओं के अनुसार, भगवान शिव साक्षात अमरनाथ गुफा में विराजमान रहते हैं। ऐसा माना जाता है कि एक बार माता पार्वती ने भगवान शिव से उनके अमरत्व का कारण जानना चाहा, तो भगवान शिव ने माता पार्वती को कहा कि इसके लिए आपको अमर कथा सुननी पड़ेगी। इसके लिए उन्होंने ऐसे स्थान की तलाश करना शुरू किया, जहां कोई और इस अमर कथा को नहीं सुन सकता था। अतः वे अमरनाथ गुफा पहुंचे। भगवान शिव ने जब माता पार्वती को अमर कथा सुनाने के लिए अमरनाथ गुफा की ओर प्रस्थान किया, तो रास्ते में सबसे पहले उन्होंने पहलगाम में अपने नंदी (जिस बैल की सवारी करते थे) का परित्याग किया।
इसके बाद, चंदनवाड़ी में भगवान शिव ने अपने बालों (जटाओं) से चंद्रमा को मुक्त किया। शेषनाग नामक झील के तट पर उन्होंने अपने गले से सर्पों (सांपों) को भी मुक्त कर दिया। उन्होंने अपने पुत्र गणेश को महागुनस पर्वत पर छोड़ने का फैसला किया। फिर पंचतरणी नामक स्थान पर पहुंचकर भगवान शिव ने पंच तत्वों (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि और आकाश) का भी त्याग कर दिया। इन सब को पीछे छोड़कर भगवान शिव ने माता पार्वती के साथ अमरनाथ गुफा में प्रवेश किया और वहां पर समाधि ले ली।
इसके बाद, भगवान शिव ने कालाग्नि बनाई और गुफा के आसपास मौजूद हर जीवित प्राणी को नष्ट करने के लिए उसे आग फैलाने का आदेश दिया, ताकि माता पार्वती को छोड़कर कोई भी अमर कथा न सुन सके। फिर भगवान शिव माता पार्वती को अमरत्व का रहस्य बताने लगे। लेकिन, अचानक कबूतरों का एक जोड़ा वहां पर पहुंचा और उन्होंने अमरत्व के रहस्य को सुन लिया। इसके साथ ही कबूतरों का यह जोड़ा अमरत्व को प्राप्त हो गया। कई तीर्थयात्री कबूतरों के इस जोड़े को देखने का दावा करते हैं और उन्हें यह देखकर आश्चर्य होता है कि ये पक्षी इतने ठंडे और ऊंचाई वाले क्षेत्र में कैसे जीवित रह सकते हैं।
अमरनाथ गुफा का रहस्य
अमरनाथ की पवित्र गुफा गर्मी के कुछ दिनों को छोड़कर साल के अधिकांश समय बर्फ से ढंकी रहती है। दिलचस्प बात यह है कि इस पवित्र गुफा में प्रत्येक वर्ष बर्फ का शिवलिंग प्राकृतिक रूप से बनता है। कहा जाता है कि इस गुफा की छत की एक दरार से पानी की बूंदें टपकती हैं, जिससे बर्फ का शिवलिंग बनता है। क्योंकि, ठंड की वजह से पानी जम जाता है और बर्फ शिवलिंग का आकार ले लेता है। इस शिवलिंग के बगल में दो छोटे और आकर्षक बर्फ के शिवलिंग भी बनते हैं, जिन्हें माता पार्वती और भगवान गणेश का प्रतीक माना जाता है।
यह दुनिया का एकमात्र ऐसा शिवलिंग है, जो चंद्रमा की रोशनी के चक्र के साथ बढ़ता और घटता है। यह शिवलिंग श्रावण शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को पूरे आकार में रहता है और अमावस्या तक इसका आकार घटने लगता है। ऐसा प्रत्येक साल होता है। इसी बर्फ के शिवलिंग के दर्शन के लिए हर साल लाखों की संख्या में श्रद्धालु अमरनाथ की पवित्र गुफा की यात्रा करते हैं।
अमरनाथ यात्रा का महत्व
अमरनाथ गुफा हिंदुओं का पवित्र तीर्थस्थल है, जो हिमालय की पर्वत शृंखलाओं के बीच स्थित है। प्राचीन काल में इस गुफा को 'अमरेश्वर' कहा जाता था। बर्फ से शिवलिंग बनने के चलते इसे 'बाबा बर्फानी' भी कहा जाता है। मान्यता यह है कि जो भी श्रद्धालु सच्चे मन से इस पवित्र गुफा में बने शिवलिंग का दर्शन करता है, उसे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है।
पुराणों के अनुसार, काशी में लिंग दर्शन और पूजन से दस गुना, प्रयाग से सौ गुना और नैमिषारण्य तीर्थ से हजार गुना अधिक पुण्य बाबा अमरनाथ के दर्शन करने से मिलता है। मान्यता यह भी है कि अमरनाथ गुफा के ऊपर पर्वत पर श्री राम कुंड है। अमरनाथ गुफा में स्थित पार्वती शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में से एक हैं।
श्रीअमरनाथ जी श्राइन बोर्ड के जिम्मे अमरनाथ यात्रा का प्रबंधन
प्रारंभ में अमरनाथ यात्रा का प्रबंधन का जिम्मा बूटा मलिक के वंशज और दशनामी अखाड़े के पंडित और पुरोहित सभा के हाथों में था। साल 2000 में जम्मू-कश्मीर सरकार ने श्रीअमरनाथ जी श्राइन बोर्ड का गठन किया और इसका अध्यक्ष राज्यपाल को बनाया गया। तब से अमरनाथ यात्रा के प्रबंधन की जिम्मेवारी श्रीअमरनाथ जी श्राइन बोर्ड के हाथों में है।
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