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Death Penalty: कैसे दी जाती है नाइट्रोजन गैस से मौत की सजा?

25 जनवरी, 2024 को अमेरिका के अलबामा में 58 वर्षीय केनेथ स्मिथ नाम के शख्स को नाइट्रोजन हाइपोक्सिया का उपयोग करके मौत की सजा दी गई। ऐसा पहली हुआ कि किसी को नाइट्रोजन गैस से मौत दी गई। स्मिथ को मौत की सजा देने के लिए दो बार ले जाया गया।

बीबीसी की एक रिपोर्ट के मुताबिक केनेथ को पहली बार जब मौत की सजा देनी थी, तब स्मिथ को 'हॉलमैन करेक्शनल फैसिलिटी' नाम की जेल के एक कथित 'डेथ चैम्बर' में ले जाकर जहरीले रसायन के इंजेक्शन लगाए जाने थे, लेकिन जेल प्रशासन इसमें नाकाम रहा। इंजेक्शन देने वाले डॉक्टरों को केनेथ की नस नहीं मिल रही थी।

Alabama execution How is death sentence given by nitrogen gas

केनेथ के वकील के मुताबिक सजा देने वालों ने उसके शरीर में असंख्य जगह सुई चुभोई थी, लेकिन नस न मिल पाने की वजह से इंजेक्शन नहीं दिया जा सका और उस दिन उनका डेथ वॉरंट निरस्त हो गया। लेकिन, अलबामा प्रशासन इस बार उसे नाइट्रोजन गैस देकर मौत की सजा दे ही दी।

नाइट्रोजन हाइपोक्सिया क्या है?
अमेरिका की मशहूर मैगजीन 'साइंटिफिक अमेरिकन' की वेबसाइट पर छपे एक लेख के अनुसार नाइट्रोजन हाइपोक्सिया में व्यक्ति को केवल नाइट्रोजन गैस में सांस लेने के लिए मजबूर किया जाता है। इससे शरीर के विभिन्न अंगों को काम करने के लिए जितनी ऑक्सीजन गैस चाहिए उतनी नहीं मिलती और कुछ ही देर में उस शख्स की मौत हो जाती है।

इस मामले पर 'ह्यूमन राइट कंपलेन' के सह-लेखक, एमोरी विश्वविद्यालय में एनेस्थिसियोलॉजी के एसोसिएट प्रोफेसर जोएल ज़िवोट बताते हैं कि वैज्ञानिक-लगने वाले नाम के बावजूद 'नाइट्रोजन हाइपोक्सिया' कोई मेडिकल शब्द नहीं है। नाइट्रोजन एक अक्रिय गैस है, जबकि 'हाइपोक्सिया का मतलब है कम ऑक्सीजन।

एसोसिएट प्रोफेसर जोएल ज़िवोट के मुताबिक हम जिस हवा में सांस लेते हैं। उसका 78 प्रतिशत हिस्सा नाइट्रोजन गैस है। हालांकि, नाइट्रोजन के इतने उच्च प्रतिशत के साथ हवा में सांस लेना हमारे शरीर के लिए हानिकारक या विषाक्त नहीं है, क्योंकि नाइट्रोजन एक अक्रिय गैस है, जिसका अर्थ है कि यह अप्रतिक्रियाशील है या यह किसी भी जहरीले गैसीय यौगिक का उत्पादन करने के लिए अन्य गैसों के साथ रासायनिक रूप से प्रतिक्रिया नहीं करता है। अक्रियाशील होने के कारण, नाइट्रोजन हीमोग्लोबिन के साथ भी प्रतिक्रिया नहीं करता है और इसलिए यह श्वसन में बिल्कुल भी भाग नहीं लेता है। सांस द्वारा ली गई सारी नाइट्रोजन सांस छोड़ने के दौरान बाहर निकल जाती है।

लेकिन, सिर्फ नाइट्रोजन हाइपोक्सिया एक शख्स के लिए घातक हैं, क्योंकि इस मामले में किसी शख्स को शुद्ध नाइट्रोजन में सांस लेने के लिए बाधित किया जाता है। तब उसे तुरंत पता नहीं चलता कि कोई समस्या है, लेकिन उनकी कोशिकाएं मरने लगती हैं और अंग काम करना बंद कर देते हैं। ऑक्सीजन से वंचित कुछ ही मिनटों में बेहोश हो जाता है और फिर दिल धड़कना भी बंद हो जाता है और आदमी जल्द ही मर जाता है।

सीएनएन की एक रिपोर्ट कहती है कि नाइट्रोजन हाइपोक्सिया तब होता है जब गैस की उच्च सांद्रता शरीर में प्रवेश करती है। जो शरीर में ऑक्सीजन की जगह ले लेती है और मृत्यु का कारण बनती है। ओहियो स्टेट यूनिवर्सिटी कॉलेज ऑफ मेडिसिन में सर्जरी के प्रोफेसर डॉ. जोनाथन ग्रोनर ने कहा, यह प्रक्रिया अनिवार्य रूप से श्वसन प्रणाली को अक्षम कर देती है।

केनेथ स्मिथ को कैसे दी गई सजा
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक केनेथ स्मिथ को पहले एक एयरटाइट फेसमास्क पहनाया गया। फिर, उसके जरिए नाइट्रोजन गैस सप्लाई की गई। उसे जबरदस्ती नाइट्रोजन को सांस से अंदर खींचने को कहा गया। ऐसा उसके साथ कम से कम 15 मिनट तक किया गया। तकरीबन 15 मिनट तक उसे नाइट्रोजन गैस दी गई।

रिपोर्ट की माने तो नाइट्रोजन गैस अंदर जाने के कुछ ही सेकंड के अंदर वो बेहोश हो गया और अगले चंद मिनटों में उसकी मौत हो गई। हालांकि एक प्रत्यक्षदर्शी का दावा है कि कई मिनट तक स्मिथ तड़पता रहा और उसका शरीर छटपटाता रहा। दुनिया भर के मानव अधिकार कार्यकर्ताओं ने इस तरह से मृत्युदंड देने की कड़ी निन्दा की है।

नाइट्रोजन हाइपोक्सिया का विचार कहां से आया?
पहली बार साल 2014 में अमेरिका के एक राज्य 'ओक्लाहोमा' के प्रतिनिधि माइक क्रिस्चियन ने मौत की सजा के लिए नाइट्रोजन गैस का उपयोग करने का प्रस्ताव रखा था। क्योंकि कई राज्य तब इंजेक्शन से दी जाने वाली मौत की सजा में असफल साबित हो रहे थे। वैसे अमेरिका में साल 2018 में भी तीन और लोगों को अलाबामा शासन ने जहरीले इंजेक्शन से मारने की कोशिश की थी, लेकिन वो बच गए थे।

वैसे नाइट्रोजन गैस से मौत की सजा देने का विचार आंशिक रूप से ओक्ला के एडा में ईस्ट सेंट्रल यूनिवर्सिटी में आपराधिक न्याय के सहायक प्रोफेसर माइकल कोपलैंड से आया था, जिन्होंने विश्वविद्यालय में अपने दो सहयोगियों के साथ इस विषय पर एक श्वेत पत्र का सह-लेखन किया था।

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