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Ahmadiyya: अहमदिया मुसलमान पैगम्बर मोहम्मद को नहीं मानते आखिरी नबी

मुस्लिम संगठन जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने एक प्रस्ताव पारित करके कहा है कि हम आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड के उस प्रस्ताव का समर्थन करते है, जिसमें कादियानी समाज (अहमदिया मुसलमानों) को गैर-मुस्लिम घोषित किया गया है। इसके साथ ही जमीयत उलेमा ने यह भी कहा है कि बोर्ड के इस इस फैसले से पूरे मुस्लिम समुदाय के लोग सहमत हैं और वे अहमदियों को गैर-मुस्लिम मानते हैं। जमीयत उलेमा ने केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री स्मृति ईरानी के इस मामले में दखल को भी अनुचित करार दिया है।

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क्या है पूरा मामला?
दरअसल, साल 2012 में आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड ने एक प्रस्ताव पारित करके अहमदिया संप्रदाय को गैर-मुस्लिम करार दिया था। वक्फ बोर्ड के इस प्रस्ताव को आंध्र प्रदेश उच्च न्यायालय में चुनौती दी गई और उच्च न्यायालय ने इस प्रस्ताव को निलंबित करने का आदेश जारी कर दिया। उच्च न्यायालय के इस आदेश की अवहेलना करते हुए वक्फ बोर्ड ने इस साल के फरवरी महीने में एक अन्य प्रस्ताव पारित करते हुए मई 2009 के जमीयत उलेमा (आंध्र प्रदेश) के फतवे को मद्देनजर रखते हुए अहमदिया संप्रदाय को काफिर घोषित कर दिया और कहा कि वे मुस्लिम नहीं हैं।

बीते 20 जुलाई को अहमदिया मुसलमानों ने एक पत्र के जरिए इस मामले की शिकायत केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय से की। इस पत्र में कहा गया कि आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड ने एक फतवे के आधार पर अहमदिया मुसलमानों को काफिर करार देकर उन्हें गैर-मुस्लिम बताया है, जोकि गैर-कानूनी है। इस पत्र का संज्ञान लेते हुए 21 जुलाई को केंद्रीय अल्पसंख्यक मंत्रालय ने आंध्र प्रदेश के मुख्य सचिव के.एस. जवाहर रेड्डी को एक पत्र लिखा। मंत्रालय ने इस पत्र में कहा है कि वक्फ बोर्ड की यह हरकत अहमदिया संप्रदाय के खिलाफ नफरत फैलाने वाली है, जिसका असर पूरे देश पर हो सकता है। वक्फ बोर्ड के पास अहमदिया सहित किसी भी समुदाय की धार्मिक पहचान को निर्धारित करने का कोई हक नहीं है। ऐसे में वक्फ बोर्ड कैसे किसी संगठन की तरफ से जारी किए गए फतवे पर मुहर लगा सकता है।

अहमदिया संप्रदाय पर जमीयत उलेमा
25 जुलाई को जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड के फैसले के समर्थन में एक प्रस्ताव पारित करते हुए कहा है कि इस संबंध में केंद्रीय अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री स्मृति ईरानी की अलग राय अनुचित और अतार्किक है। जमीयत ने कहा कि वक्फ बोर्ड की स्थापना मुसलमानों की वक्फ संपत्तियों और उनके हितों की रक्षा के लिए की गई है, जिसका स्पष्ट उल्लेख वक्फ एक्ट में है। ऐसे में जो समुदाय मुसलमान नहीं है, उनकी संपत्तियां और इबादत के स्थान इसके दायरे में नहीं आते।

जमीयत ने कहा कि इस्लाम की बुनियाद दो महत्त्वपूर्ण मान्यताओं पर आधारित है, जिसमें तौहीद अर्थात अल्लाह एक है और पैगंबर मोहम्मद को अल्लाह का रसूल और अंतिम नबी मानना है। ये दोनों आस्थाएं इस्लाम के पांच बुनियादी सिद्धांतों में निहित हैं। जमीयत ने कहा कि इस्लाम के इन बुनियादी सिद्धांतों के उलट अहमदिया संप्रदाय के संस्थापक मिर्जा गुलाम अहमद ने पैगंबर के अंतिम नबी होने को चुनौती दी है। इस मौलिक अंतर को देखते हुए कादियानवाद को इस्लाम के संप्रदायों में शामिल करने का कोई आधार नहीं है और इस्लाम के सभी स्कूल ऑफ़ थॉट इस संप्रदाय के गैर-मुस्लिम होने पर एक राय रखते हैं।

स्मृति ईरानी ने किया पलटवार
अब एक बार फिर से केंद्रीय अल्पसंख्यक मामलों की मंत्री स्मृति ईरानी ने पलटवार करते हुए कहा है कि आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड और उसका समर्थन करने वाले जमीयत उलेमा-ए-हिंद के पास किसी को भी धर्म से खारिज करने का हक नहीं है। उन्होंने कहा कि वक्फ बोर्ड को संसद द्वारा बनाए गए कानून के आधार पर अपनी सेवाएं देनी पड़ेगी, न कि किसी नाॅन स्टेट एक्ट के तहत। उन्होंने कहा कि मुझे सूचना मिली है कि आंध्र प्रदेश वक्फ बोर्ड ने कोई स्पष्टीकरण जारी किया है। लेकिन हमें आंध्र प्रदेश के मुख्य सचिव के जवाब की प्रतीक्षा है। उन्होंने कहा कि हिंदुस्तान की संसद जो कानून तय करेगी उसी के अनुसार वक्फ बोर्डों को भी काम करना होगा।

कौन हैं अहमदिया मुसलमान?
अहमदिया संप्रदाय के लोग इस्लाम की हनफी विचारधारा को मानते हैं। इस संप्रदाय की स्थापना साल 1889 में मिर्जा गुलाम अहमद ने भारतीय पंजाब के गुरदासपुर जिले के कस्बा कादियान में की थी। इसलिए अहमदिया संप्रदाय के लोगों को कादियानी भी कहा जाता है। अहमदिया संप्रदाय की आधिकारिक वेबसाइट के मुताबिक दुनिया के 200 से अधिक देशों में इसके एक करोड़ से अधिक अनुयायी फैले हुए हैं। सबसे ज्यादा अहमदिया संप्रदाय के लोग पाकिस्तान में रहते हैं और भारत में भी इनकी अच्छी खासी आबादी है।

इस संप्रदाय के अनुयायी स्वयं को मुसलमान तो मानते हैं, लेकिन इस्लाम के पैगम्बर मोहम्मद साहब को आखिरी नबी नहीं मानते। उनका मानना है कि वे पैगम्बर मोहम्मद की शरीयत का ही पालन कर रहे हैं। लेकिन अहमदिया संप्रदाय के संस्थापक मिर्जा गुलाम अहमद पैगम्बर मोहम्मद के बाद दूसरे नबी हुए है। क्योंकि, गुलाम अहमद ने स्वयं को नबी घोषित किया था। जबकि इस्लाम में मोहम्मद साहब को आखिरी नबी माना जाता है। इसी मतभेद के चलते मुसलमानों के अन्य संप्रदाय के लोग अहमदिया संप्रदाय को मुसलमान नहीं मानते और उन्हें काफिर करार देते है।

पाकिस्तान के निर्माण में भी भागीदारी
अंग्रेजों के इशारे पर अहमदियों ने पाकिस्तान आंदोलन में बढ़ चढ़ कर हिस्सा लिया था। पाकिस्तान बनने के बाद अहमदियों ने गुरदासपुर के कादियान से अपना मुख्यालय पाकिस्तान के झांग जिले के रबवाह नगर में स्थानांतरित कर लिया।

अहमदियों के खलीफा
मिर्जा गुलाम अहमद (1835-1908) के उत्तराधिकारियों को अहमदियों का खलीफा कहा जाता है। अहमदियों के पांचवें और वर्तमान खलीफा मिर्जा मसरूर अहमद हैं, जोकि लंदन में रहते हैं। अहमदियों के पहले खलीफा हजरत हकीम नुरुद्दीन (1841-1914) थे। इसके बाद क्रमशः मिर्जा बशीरुद्दीन महमूद अहमद (1889-1965), मिर्जा नासिर अहमद (1909-1982) और मिर्जा ताहिर अहमद (1928-2003) अहमदियों के खलीफा हुए।

अहमदिया संप्रदाय में विभाजन
साल 1914 में पहले खलीफा हकीम नुरुद्दीन के निधन के बाद उनका उत्तराधिकारी मिर्जा बशीरुद्दीन महमूद अहमद को बनाया गया, जिसे अहमदियों के एक वर्ग ने मानने से इंकार कर दिया। इसके बाद इन्होंने एक समानांतर संगठन 'लाहौर अहमदिया मूवमेंट' की स्थापना की।

पाकिस्तान में अहमदियों का उत्पीड़न
साल 1953 में पाकिस्तान में अहमदियों के खिलाफ पहली बार दंगे हुए, जिसमें सरकारी आंकड़ों के अनुसार 200 लोग मारे गए। लेकिन कहा जाता है कि इस दंगे में 2000 से भी ज्यादा लोग मारे गए थे। जांच में पता चला कि ये दंगे कट्टरपंथी मौलानाओं के इशारे पर किए गए थे। साल 1974 एक बार फिर से अहमदिया विरोधी दंगे हुए, जिनमें 20 से अधिक अहमदिया मारे गए और उनकी मस्जिदों पर हमले किए गए। इन दंगों के बाद पाकिस्तान के तत्कालीन प्रधानमंत्री जुल्फिकार अली भुट्टो ने पाकिस्तानी संविधान में संशोधन करके अहमदिया मुसलमानों को 'गैर-मुस्लिम अल्पसंख्यक' घोषित कर दिया। इस दौरान हजारों अहमदिया परिवारों को अपना घर छोड़ने पर विवश होना पड़ा।

साल 1984 में तत्कालीन राष्ट्रपति जनरल जिया उल हक ने संविधान में फिर से संशोधन करके अहमदिया मुसलमानों पर यह पाबंदी लगा दी कि वे स्वयं को मुसलमान भी नहीं कह सकते। साथ ही उनकी गतिविधियों पर भी प्रतिबंध लगा दिया गया। अहमदियों के कब्रिस्तान भी अलग कर दिए गए और पहले से दफन उनकी कुछ लाशों को कब्रों से निकलवा दिया गया। इसके बाद अहमदियों के चौथे खलीफा मिर्जा ताहिर अहमद को पाकिस्तान छोड़कर लंदन भागना पड़ा। अहमदियों की गतिविधियों पर कई मुस्लिम देशों ने प्रतिबंध लगा रखा है। यहां तक कि अहमदियों के हज करने पर भी पाबंदी है।

जहां तक भारत का संबंध है, यहां पर भी समय समय पर जमीयत उलेमा जैसी कई अन्य कट्टरपंथी संस्थाओं द्वारा अहमदियों के खिलाफ दुष्प्रचार का अभियान चलाया जाता है। उनके खिलाफ सामग्री प्रसारित की जाती है और गोष्ठियों का आयोजन करके प्रस्ताव भी पारित किया जाता है।

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