Ahilyabai Holkar: साध्वी जैसी रानी थीं अहिल्याबाई होल्कर, जानें किन मंदिरों और तीर्थों का किया पुनरुद्धार
अहिल्याबाई होल्कर को एक अत्यंत धर्मपरायण महारानी के रूप में जाना जाता है। इन्होंने देशभर में अनगिनत मंदिरों, धर्मशालाओं, तालाबों और सड़कों का निर्माण करवाया।

अहिल्याबाई होल्कर का जन्म महाराष्ट्र के अहमदनगर के जामखेड़ स्थित चौंढी गांव में 31 मई 1725 को हुआ था। उनके पिता का नाम मानकोजी शिंदे था, जो मराठा साम्राज्य में पाटिल के पद पर कार्यरत थे। अहिल्याबाई का विवाह मालवा में होल्कर राज्य के संस्थापक मल्हारराव होल्कर के पुत्र खांडेराव से हुआ था। साल 1745 में अहिल्याबाई के बेटे मालेराव का जन्म हुआ। इसके करीब 3 साल बाद बेटी मुक्ताबाई ने जन्म लिया।
संघर्षों भरा जीवन
रानी अहिल्याबाई का जीवन संघर्षों से भरा रहा। उनकी शादी के कुछ साल बाद ही 1754 में उनके पति खांडेराव का भरतपुर (राजस्थान) के पास कुम्हेर में एक युद्ध के दौरान निधन हो गया। इसके बाद साल 1766 में ससुर मल्हारराव भी चल बसे। इसी बीच रानी ने अपने एकमात्र बेटे मालेराव को भी खो दिया। इसके बाद अहिल्याबाई को शासन अपने हाथों में लेना पड़ा। अपनों को खोने और शुरुआती जीवन के संघर्ष के बाद भी रानी ने बड़ी कुशलता से राजकाज चलाया। कुशल कूटनीति के दम पर उन्होंने विरोधियों को पस्त किया। साथ ही जीवनपर्यंत सामाजिक और धार्मिक कार्यों में जुटी रहीं।
धार्मिक-सामाजिक कार्यों में समर्पित
अहिल्याबाई ने देशभर में कई प्रसिद्ध तीर्थस्थलों पर मंदिरों, घाटों, कुओं और बावड़ियों का निर्माण कराया। इतना ही नहीं, उन्होंने सड़कें भी बनवाईं, अन्न क्षेत्र खोले, प्याऊ बनवाए और शास्त्रों के मनन-चिन्तन व प्रवचन के लिए मन्दिरों में विद्वानों की नियुक्ति भी की। रानी अहिल्याबाई ने बड़ी संख्या में धार्मिक स्थलों के निर्माण कराए। उनके इन कामों की पूरी जानकारी तो फिलहाल उपलब्ध नहीं हैं लेकिन प्राप्त दस्तावेजों से जो मिलता है वह इस प्रकार है:
सोमनाथ - एक महादेव मंदिर का निर्माण। यह मंदिर न तो बहुत बड़ा है, न ही बहुत छोटा, यानी एक मध्यम श्रेणी का बना हुआ है। साथ ही सोमनाथ के मुख्य मंदिर के आसपास सिंहद्वार और दालानों का निर्माण करवाया।
त्रयंबक- यहां पत्थर का एक सुन्दर तालाब और दो छोटे-छोटे मंदिरों का निर्माण।
गया- विष्णुपद मंदिर के पास ही एक दो मंजिला मंदिर का निर्माण जिसमें भगवान राम, जानकी और लक्ष्मण और हनुमान जी की मूर्तियां प्रतिष्ठित हैं।
पुष्कर- एक मंदिर और धर्मशाला बनवाई।
वृन्दावन- एक अन्न क्षेत्र और एक लाल पत्थर की बावड़ी बनवाई।
आलमपुर- सोनभद्र नदी के तट पर बसे इस स्थान पर अपने ससुर की स्मृति में एक देवालय स्थापित करवाया। भगवान विष्णु का एक मंदिर भी यहां बना हुआ है।
हरिद्वार- पिंडदान के लिए एक स्थान का निर्माण करवाया।
काशी- सुप्रसिद्ध मणिकर्णिका घाट का निर्माण करवाया। राजघाट और अस्सी संगम के मध्य विश्वनाथ जी का सुनहरा मंदिर है। यह मंदिर 51 फुट ऊंचा और पत्थर का बना हुआ है। मंदिर के पश्चिम में गुंबजदार जगमोहन और इसके पश्चिम में दंडपाणीश्वर का पूर्व मुखी शिखरदार मंदिर है। इन मंदिरों का निर्माण अहिल्याबाई ने ही करवाया था।
काशी के समीप ही तुलसीघाट के नजदीक लोलार्ककुंड के चारों ओर कीमती पत्थरों से जीर्णोद्धार करवाया। इस कुंड का उल्लेख महाभारत और स्कन्दपुराण दोनों में मिलता हैं।
बद्रीनाथ और केदारनाथ- धर्मशालाओं का निर्माण करवाया। बद्रीनाथ में तीर्थयात्रियों और साधुओं के लिए सदावर्त यानी हमेशा अन्न बांटने का व्रत लिया था।
देवप्रयाग- इस स्थानपर पर अहिल्याबाई ने तीर्थयात्रियों और साधुओं के लिए सदावर्त यानी हमेशा अन्न बांटने का व्रत लिया था।
गंगोत्री- यहां विश्वनाथ, केदारनाथ, भैरव और अन्नपूर्णा चार मंदिरों सहित पांच-छह धर्मशालाओं का निर्माण करवाया।
बिठूर (कानपुर के समीप)- ब्रह्माघाट सहित गंगा नदी पर कई घाटों का निर्माण।
ओंकारेश्वर- एक बावड़ी बनवाई और महादेव के मंदिर में नित्य पूजन के लिए लिंगार्चन की व्यवस्था की।
हंडिया- हर्दा के समीप नर्मदा के तट पर स्थित इस स्थान पर एक धर्मशाला और भोजनालय का निर्माण।
इसके वाला उन्होंने अयोध्या और नासिक में भगवान राम के मंदिर का निर्माण किया। उज्जैन में चिंतामणि गणपति मंदिर का निर्माण कराया। आंध्र प्रदेश के श्रीशैलम और महाराष्ट्र में परली वैजनाथ ज्योतिर्लिंग का भी कायाकल्प किया।
अहिल्याबाई ने हंडिया, पैठण और कई अन्य तीर्थस्थलों पर सरायों (यात्रियों के रुकने हेतु) का निर्माण किया। मध्य प्रदेश के धार स्थित चिकल्दा में नर्मदा परिक्रमा में आने वाले भक्तों के लिए भोजनालय की स्थापना की। सुलपेश्वर में उन्होंने महादेव के एक विशाल मंदिर और भोजनालय का निर्माण करवाया। मध्य प्रदेश के खरगोन स्थित मंडलेश्वर में उन्होंने मंदिर और विश्राम गृह बनवाए। मांडू में उन्होंने नीलकंठ महादेव मंदिर की स्थापना की।
अहिल्याबाई ने कोलकाता से लेकर काशी तक एक सड़क भी बनवाई थी। इसके अलावा गर्मियों में स्थान-स्थान पर प्याऊ (जल वितरण) और सर्दियों में कम्बल वितरण उनकी तरफ से होता था। उन्होंने अपनी जन्मभूमि पर भी एक शिवालय और घाट बनवाया था। यह मंदिर अहिलेश्वर के नाम से जाना जाता है।
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