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पहले आंदोलन में चाचा ने जमकर की थी शिवराज सिंह चौहान की पिटाई!

[सत्येंद्र खरे] मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने अपनी संवेदनशीलता के बल और विकास के कर्तव्य पथ पर चलकर 10 वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस कालखंड के दौरान देखने लायक जो मुख्य बात रही वो यह कि मध्यप्रदेश के इतिहास में किसानोंं के सर्वाधिक कल्याण के कार्यक्रम शिवराज सरकार ने ही चलाये।

About Shivraj Singh Chahuan's first Aandolan

खेती को लाभ का व्यवसाय बनाने के इस जुनून ने शिवराज को किसानों का मसीहा तक बना दिया। शिवराज स्वयं एक किसान पुत्र हैं, इसलिए वे भली भांति जानते थे, कि किसानों की समस्याएं क्या हैं? और उन समस्याओं के हल निकाल दिये जाएं तो प्रदेश के अन्नदाता कृष‍ि विकास में प्रदेश को नई उचाइयाँ प्रदान कर सकते हैं।

शिवराज के राज में कृष‍ि विकास दर

शिवराज ने पिछले 10 वर्षों में इस ओर बहतरीन काम करके भी दिखाया, जिसका परिणाम हमें प्रदेश कि कृष‍ि विकास दर 24.99 प्रतिशत तक पहुंचकर न केवल देश में अपितु विश्व में सर्वाधिक दर्ज कि गई। शिवराज के कृष‍ि विकास की दिशा में किए गए अनेकों अनेक योजनाओं का सार्थक परिणाम यह रहा कि किसानों कि आर्थिक स्थिति पहले कि अपेक्षा मजबूत हुई और साथ ही प्रदेश को भी पिछले तीन वर्षो से लगातार केंद्र सरकार के द्वारा "कृष‍ि कर्मण पुरुष्कार" से सुशोभित किया जा रहा है।

शिवराज सिंह किसानों और मजदूरों से संवाद करते हुए अक्सर एक लोकाक्ती का जिक्र करते हैं कि "राम कि चिराइया राम के खेत, खाओ री चिरइयों भर भर पेट", और उन्होने इस जुमले को जमीन पर सार्थक करने का काम भी किया है।

शिवराज ने हमेशा मजदूर और किसानों के हित के लिए अपनी राजनीति को सर्वोपरी रखा, बचपन में ही किसान और मजदूरो के हितो कि रक्षा करने के गुण बाल शिवराज में दिखाई देने लग गए थे।

शिवराज के 10 साल- व्यक्तित्व, राजनीति, प्रसाशनिक नेतृत्व

अब भी नहीं भूले बचपन की पिटाई

ऐसी ही एक घटना का जिक्र आज भी स्वयं शिवराज सिंह चौहान बड़े रोमांचकारी, हंसी, ठिठोली के साथ अनौपचारिक चर्चाओं में करते दिखाई देते हैं। वो ठेठ भाषा बोली के साथ बताते हैं (शिवराज जी की अपनी भाषा बोली में) "कि जब वे 13 साल कि उम्र से रहे तब गांव में मजदूरन को खेत में काम करवे के लाने ढाई पाई रोजाना मिलत रही और मजदूरन को इतने कम पईसा में गुजारा नहीं हो पात रहो। तब मैंने खुदई आगे बढ़ के मज़दूरन को इकट्ठों करो और कई कि ढाई कि जगह पाँच पाई मांगो और नारा लगवाओ कि "पाच पाई नहीं तो काम नहीं"। मज़दूरन ने भी हमसे कही कि मान लो हमाइ बात न मानी गई तो?"

शिवराज आगे कहते हैं, "तब मैंने कही कि थोड़े दिना करते तो हो लो। बस फिर का शाम में पेट्रोमैक्स जलाए, कंधे में धरे और गांव के चक्कर के साथ मज़दूरन ने नारा लगावों शुरू कर द्ये। हमाओ नेता कैसा हो, शिवराज जैसा हो और पाँच पाई नहीं तो काम नहीं। अब गांव के चक्कर लगाई रहे थे कि अपने घर के सामने जा पहुंचे, हम भी आगे आगे और मजदूर पीछे-पीछे, इतने में हमाए घर के दरवाजा खुले और चाचा बड़ी सी सटइया लेकर बाहर आये। मोहे समझ में आ गई कि शिवराज अब तेरी खेर नहीं, और इतने में पीछे खड़े मजदूर जो कछु देर पहले नारा लागा रहे थे। वे सब नदारद, चाचा अंदर ले गए, पिटाई जो भई सो भई, सज़ा के तौर पे घर पे कटी रखी फसल को दामन करवाया सो अलग। खैर इस घटना का परिणाम ये रहा कि कुछ दिन बाद मजदूरों की इस समस्या पर गांव वालों ने गौर किया और हमारा पहला आंदोलन सफल रहा।"

13 साल के उम्र में बने किसानों के नेता

13 वर्ष के जिस शिवराज ने अपने नेतृत्व में गाव के मजदूरों को संघठित कर सफल आंदोलन किया अब वही शिवराज सफल प्रसाशनिक नेत्रत्व कर किसानों मजदूरो के लिए योजनाएं बनाकर उनका सफल क्रियान्वयन कर रहे हैं। वर्तमान परिवेश में देखने लायक एक बात और भी है कि आज प्रदेश में एक बड़ा इलाका सूखा ग्रषित है। अगर शिवराज सरकार ने पिछले 10 वर्षों के दौरान सिचाई का रकबा साढ़े सात लाख हेक्टेयर से बढ़ाकर 27 लाख हेक्टेयर तक नहीं पहुंचया होता तो हालत और भी भयावह होते।

नदियों को जोड़कर दूर किया संकट

नर्मदा क्षिप्रा के साथ अब पार्वती, और काली सिंध को भी नर्मदा से जोड़ने कि दिशा में तेजी से प्रयास किए जा रहे हैं। वहीं बुंदेलखंड के पन्ना छतरपुर और टीकमगढ़ जिलों में सिंचाई हेतु केन बेतवा लिंक परियोजना को कैसे धरातल पर लाया जाए, इसके लिए शिवराज के प्रयास जारी हैं। आज जब किसान ओला पाला, सूखा और अति वृष्टि से व्यथित है, ऐसे में शिवराज अपने हृदय कि समवेदनाओं के साथ प्रदेश के किसानों का मनोबल ऊंचा करने के लिए बार-बार यही कह रहे है कि "साल हारे है, ज़िंदगी नहीं हारने दूँगा" और इस वाक्य को चरितार्थ करने हेतु किसानों की कर्ज माफी, अस्थायी बिजली कनक्शन, फसल बीमा की राशि का त्वरित वितरण, फसलों पर निर्भरता कम हो इसके लिए आय के अन्य साधनो एवं श्रोतों पर काम करने के लिए आदेश एवं विधानसभा का विशेष सत्र बुलाकर किसानों के कल्याण हेतु अनुपूरक बजट पास करा रहे हैं।

शिवराज के संवेदनशीलता और कार्यशैली की बानगी कृष‍ि विकास तक ही सीमित नहीं रही। उन्होंने अपने प्रसाशनिक नेतृत्व के बल पर देश के दिल को पर्यटन की दृष्टि से भी विकसित करने के लिए अभूतपूर्व काम किए हैं। आज पूर्व की तुलना में मध्यप्रदेश आने वाले पर्यटकों की संख्या बढ़ी है, जिसके फलस्वरूप पर्यटन क्षेत्रो में रहने वाले युवकों को रोजगार भी मिला है। विश्व धरोहर सांची, भीमबैठका और खजुराहो के विकास के साथ छोटे-छोटे पर्यटन स्थल जैसे मांडू, चँदेरी, चित्रकूट, पन्ना, महेश्वर और ओंकारेश्वर इत्यादि को प्रदेश के पर्यटन नक्शे में लाकर इस और ध्यान दिया जा रहा है।

पर्यटन स्थलों को विकसित करने का काम

टाइगर स्टेट कहे जाने वाले इस प्रदेश में शिवराज सरकार तानसेन समारोह, महेश्वर महोत्सव, कालीदास समारोह, कुमार गंधर्व समारोह, भोपाल का लोकरंग समारोह, लोकरंगन खजुराहो, अलाउद्दीन खाँ समारोह मैहर, भगोरिया उत्सव झाबुआ और अंतराष्ट्रीय न्रत्य समारोह खजुराहो को मनाकर प्रदेश की ऐतिहासिक, सांस्क्रतिक धरोहरों को विश्व पटल तक पेहुचाने का अद्वितीय कार्य कर रही है।

2016 में होने वाले सिंहस्थ को लेकर सरकार की सक्रियता देखने योग्य है, सिंहस्थ महाकुंभ के पूर्व शिवराज सरकार ने विचारो के महाकुंभ के तीन बड़े अंतर्राष्ट्रीय आयोजन मूल्य आधारित जीवन भोपाल मे, धर्म-धम्म सम्मेलन इंदौर और ग्लोबल वार्मिंग एवं जलवायु परिवर्तन पर अंतराष्ट्रीय सम्मेलन भोपाल में आयोजित कर यह बता दिया है कि हिंदुस्तान का दिल जल्द ही वैश्विक स्तर के एक बड़े आयोजन सिंहस्थ का सफल आयोजक एवं साक्ष्य बनेगा।

29 नवंबर 2005 को सत्ता सीन हुए शिवराज ने आज 29 नवंबर 2015 तक अपनी राजनीति में भी ज़्यादातर समय ऊंचाईयां ही प्राप्त की। विरोधियों को शालीनता और मर्यादित भाषा के साथ जबाब देने और सदन में विपक्षी दलों को बोलने। उन्हे सुनने एवं महत्व देने की राजनीति शिवराज को आज के दौर के नेताओं से कहीं आगे की पंक्ति में खड़ा कर देती है।

सदन के बाहर भी उनके विपक्ष के कांग्रेसी साथी उनकी इस अदा के कायल रहते हैं और अनौपचारिक चर्चाओं में अक्सर यही जिक्र करते रहते हैं कि शिवराज के मुख्यमंत्री रहते कांग्रेस को सत्ता पाना एक टेढ़ी खीर साबित होगा। अभी हाल ही में झाबुआ चुनाव में कांग्रेस के विजय होने पर भी कांग्रेस के नेता 2018 में विधानसभा चुनाव में जीत के लिए इतने आश्वस्त दिखाई नहीं दे रहे जितने की शिवराज सिंह चौहान।

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