Veer Savarkar: वीर सावरकर की वो 5 खास बातें, जिनके बारे में लोग नहीं जानते
विनायक दामोदर सावरकर, यानी वीर सावरकर। पिछले कुछ सालों से यह नाम देश में चर्चा का केंद्र है। खासकर मोदी सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान सियासी चर्चा में सावरकर का नाम आता ही रहता है।

28 मई को वीर सावरकर की 140वीं जयंती मनाई गई। देश में सावरकर को कालापानी की सजा से लेकर उनके तथाकथित माफीनामे तक का बराबर जिक्र होता रहता है। मगर वीर सावरकर के जीवन से जुड़ी कुछ ऐसी घटनाएं हैं, जिन्हें बहुत कम लोग जानते होंगे। विनायक दामोदर सावरकर के जन्मदिवस पर हम आपको ऐसी ही 5 खास बातों के बारे में बता रहे हैं।
हिंदुत्व के पैरोकार
हिन्दू राष्ट्रवाद की राजनीतिक विचारधारा 'हिन्दुत्व' को विकसित करने का बहुत बड़ा श्रेय सावरकर को जाता है। सावरकर ने एक किताब लिखी थी, 'हिंदुत्व - हू इज हिंदू?' जिसमें उन्होंने हिंदुत्व को एक राजनीतिक विचारधारा के तौर पर इस्तेमाल किया। वीर सावरकर 1937 में हिंदू महासभा के अध्यक्ष चुने गये थे। जब कांग्रेस ने 1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू किया, तब सावरकर ने इसकी आलोचना की और हिंदुओं से युद्ध के प्रयास में सक्रिय रहने के लिए कहा। उन्होंने हिंदुओं से आग्रह किया कि वे 'युद्ध की कला' सीखने के लिए सशस्त्र बलों में शामिल हों।
सावरकर और गांधी: विचार अलग-अलग, पर उद्देश्य एक
महात्मा गांधी और वीर सावरकर के संबंध पर अधिकतर लोगों ने यही पढ़ा होगा कि इन दोनों में बेहतर ताल्लुकात नहीं थे। पर ऐसा नहीं है। दोनों के विचार अलग-अलग जरूर थे, लेकिन उद्देश्य एक ही था। वीर सावरकर की जीवनी लिखने वाले प्रसिद्ध लेखक धनंजय कीर ने लिखा है कि समाज की भलाई के लिए कई बार दो महान लोग एक समय में अलग-अलग कार्य कर रहे होते हैं। इसमें एक व्यक्ति वह होता है, जो समाज की भलाई के लिए कष्ट सहन करता है और दूसरा उसकी बेहतरी का बीड़ा उठता है। गांधी पहली तरह के व्यक्तियों में शामिल थे, जबकि सावरकर दूसरी तरह के लोगों का नेतृत्व करते हैं।
महात्मा गांधी और वीर सावरकर का रिश्ता बहुत पुराना था। दोनों एक-दूसरे से साल 1909 में दशहरे के दिन लंदन में पहली बार मिले थे। गांधी ने वहां अपने भाषण में कहा कि उन्हें सावरकर के साथ बैठने का सम्मान मिलने पर बहुत गर्व है। भारत को सावरकर के त्याग और देशभक्ति का बहुत जल्दी फायदा मिलेगा। इसके बाद दोनों 1927 में रत्नागिरी में मिले। दोनों ने अस्पृश्यता और शुद्धि के सम्बन्ध में बातचीत की। इस विषय को लेकर उनके बीच मतभेद भी थे, लेकिन किसी ने एक-दूसरे से बैर नहीं रखा।
सावरकर को लेकर गांधी लिखते है, "सत्यप्रेमी और सत्य के लिए प्राण तक न्यौछावर कर सकने वाले व्यक्ति के रूप में आपके लिए मेरे मन में कितना आदर है। इसके अतिरिक्त अंततः हम दोनों का ध्येय भी एक है और मैं चाहूंगा कि उन सभी बातों के संबंध में आप मुझसे पत्र-व्यवहार करें, जिनमें आपका मुझसे मतभेद है। गांधी और सावरकर में कार्यशैली को लेकर मतभेद हो सकते हैं, लेकिन यह कोई विवादित मुद्दा नहीं है।"
राजनीतिक विचारधारा को लेकर दोनों की अपनी-अपनी समझ थी, लेकिन व्यक्तिगत रूप से कभी एक-दूसरे का अनादर नहीं किया। इतिहासकारों और शोधकर्ताओं ने अपने लेखों में ऐसी और घटनाओं का जिक्र किया है, जिनमें गांधी और सावरकर एक-दूसरे के प्रति सम्मान प्रकट करते हैं। फिर चाहे वह 16 मार्च 1945 को सावरकर के भाई गणेश दामोदर सावरकर के निधन पर गांधी जी का पत्र लिखकर संवेदना प्रकट करना हो, या फिर सावरकर बंधुओं को कालापानी की सजा के दौरान महात्मा गांधी का वीर सावरकर की तारीफ करना हो।
सावरकर ही थे लेखक 'चित्रगुप्त'
'बैरिस्टर सावरकर' वीर सावरकर की पहली जीवनी थी। इसके लेखक का नाम 'चित्रगुप्त' था। बाद में प्रकाशक ने खुलासा किया कि चित्रगुप्त कोई और नहीं, बल्कि वीर सावरकर ही है। इसके बाद उनकी आत्मकथा जांच के दायरे में आ गई। सावरकर ने 10,000 से अधिक पन्ने मराठी भाषा में और 1500 से अधिक पन्ने अंग्रेजी में लिखे है। बहुत कम मराठी लेखकों ने इतना मौलिक लिखा है। उनकी "सागरा प्राण तळमळला", "हे हिंदु नृसिंहा प्रभो शिवाजी राजा", "जयोस्तुते", "तानाजीचा पोवाडा" आदि कविताएं बहुत लोकप्रिय हैं। वीर सावरकर की करीब 40 पुस्तकें बाजार में उपलब्ध हैं।
एक समाज सुधारक
सावरकर एक महान समाज सुधारक भी थे। उनका दृढ़ विश्वास था कि सामाजिक व सार्वजनिक सुधार बराबरी का महत्व रखते है और एक-दूसरे के पूरक हैं। उनके समय में समाज बहुत सी कुरीतियों और बेड़ियों के बंधनों में जकड़ा हुआ था। अपने भाषणों, लेखों और कामों से वीर सावरकर ने समाज सुधार के लगातार प्रयास किए। उनके सामाजिक उत्थान कार्यक्रम न केवल हिन्दुओं के लिए, बल्कि राष्ट्र को समर्पित होते थे। सावरकर हिन्दू समाज में प्रचलित जाति-भेद और छुआछूत के घोर विरोधी थे। बम्बई का पतितपावन मंदिर इसका जीवंत उदाहरण है, जो हिन्दू धर्म की प्रत्येक जाति के लोगों के लिए समान रूप से खुला है। इन बंधनों से एक हद तक मुक्ति सावरकर के ही अथक प्रयासों का परिणाम है।
17 अप्रैल 1924 को सावरकर ने रणनीतिक रूप से सामाजिक सुधारों के साथ अपने प्रयोगों को शुरू करने के लिए विठ्ठल मंदिर को चुना। मंदिर कई कारणों से महत्वपूर्ण था। चितपावन, ब्राह्मणों के लिए यह सबसे पवित्र स्थान माना जाता था। रिहा होने के बाद वीर सावरकर का पहला प्रमुख भाषण ऐसे आध्यात्मिक और राजनीतिक रूप से प्रमुख स्थान पर था। उन्होंने 'शुद्धिकरण आणि अस्पृश्योद्धार' (शुद्धि आंदोलन और अछूतों का उत्थान) इन दोनों विषयों पर अपनी बात खुलकर सबके सामने रखी। 1925 के गणेशोत्सव के दौरान उन्होंने व्याख्यान और सार्वजनिक चर्चाओं का आयोजन किया। अस्पृश्यता कैसे हिंदू समाज के लिए अन्यायपूर्ण और हानिकारक थी, इस पर लेख प्रकाशित किए।
1925 में रत्नागिरी में गणेशोत्सव के दौरान 'अछूत गणपति 'नाम की एक विशेष मूर्ति स्थापित की गई। कई ब्राह्मण उनका आशीर्वाद लेने और बधाई देने के लिए वहां गए थे। उस समय अछूत माने जाने वाले समुदाय के एक व्यक्ति शिवू ने गणेश प्रतिमा की पूजा की। यह वास्तव में परंपरा में डूबे समुदाय के लिए एक क्रांतिकारी कार्य था। 1925 में रत्नागिरी हिंदू सभा ने अन्य बच्चों के साथ-साथ अछूतों के बच्चों को स्कूलों में प्रवेश देने का सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य किया। 1925 से सावरकर ने इस समस्या से सीधे निपटने का फैसला किया।
यह सुनिश्चित करने के लिए कि न केवल स्कूलों से, बल्कि घरों से भी अस्पृश्यता समाप्त हो, सावरकर ने विभिन्न जातियों के लोगों के साथ मिठाइयां बांटने के लिए दशहरा और मकर संक्रांति जैसे हिंदू त्योहारों के अवसर पर कई घरों का दौरा किया। सामाजिक बहिष्कार के विरोध में उन्होंने सामूहिक अंतरजातीय भोजन का आयोजन किया। हिंदू महासभा के अध्यक्ष के रूप में वह अक्सर अछूतों के घरों में जाते थे।
वीर सावरकर से प्रभावित थे कई बड़े नाम
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विनायक दामोदर सावरकर एक ऐसा नाम है, जिनके बिना भारतीय स्वतंत्रता संग्राम की चर्चा अधूरी है। साल 1900 के बाद देश के ज्यादातर क्रांतिकारी और अधिकतर राजनेता सावरकर से प्रभावित रहे।
1904 के आसपास पांडुरंग महादेव सेनापति ने लंदन के इंडिया हाउस में सावरकर से मुलाकात की। इसके बाद वे अभिनव भारत के सदस्य बन गए। सावरकर के निर्देश पर पांडुरंग बम बनाने का तरीका सीखने के लिए रूस गए। पांडुरंग के साथ हेमचन्द्र दास भी रूस गए थे। 1908 में भारत आकर इन दोनों ने बंगाल के क्रांतिकारियों को बम बनाना सिखाया था।
भीकाजी कामा ने देश की स्वतंत्रता के लिए 1908 में सावरकर से मुलाकात की। जब सावरकर को फ्रांस में गिरफ्तार किया गया, तो उन्होंने सावरकर की रिहाई के लिए हर संभव प्रयास किए। 1935 के एक्ट के बाद बीजी खरे बम्बई प्रान्त के मुख्यमंत्री बने थे। खरे अपने जीवन के शुरुआती दिनों में सावरकर की अभिनव भारत सोसाइटी के सदस्य भी रहे।
इनके अलावा सरोजिनी नायडू के भाई वीरेन्द्रनाथ चटर्जी, राजपूताना में 1914 से 1948 के दौरान सक्रिय रहे राम नारायण चौधरी, तिलक के अनुयायी गोपालराव विनायकराव देशमुख, बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय के निर्माण और सुभाष चंद्र बोस को जर्मनी से संबोधन में सहयोग देने वाले सरदार सिंह रावाजी राणा, क्रांतिकारी मदनलाल धींगरा, कांग्रेस के सदस्य रहे एनवी गाडगीळ, लाला हरदयाल, वीवी सुब्रमण्य अय्यर, एमपीटी आचार्य, क्रांतिकारी डब्लूवी फडके, डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी समेत ऐसे कई नाम हैं, जो वीर सावरकर के संपर्क में आए और उनसे किसी न किसी तरह प्रभावित हुए। हालांकि, इनमें से ज्यादातर स्वतंत्रता सेनानियों के योगदान को राजनीतिक हालातों और तुष्टिकरण के चलते भुला दिया गया है।
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