भारतीय सिनेमा के पहले ऑस्कर आइकन, सत्यजीत रे की वो उपलब्धियां जो आज भी बेजोड़ हैं

Satyajit Ray Heritage Home: भारत के पड़ोसी देश बांग्लादेश के अखबार द डेली स्टार की वेबसाइट पर पब्लिश एक रिपोर्ट के अनुसार, फिल्मकार सत्यजीत रे के पैतृक घर कभी भी गिराया जा सकता है। इस खबर के सामने आते ही भारत के विदेश मंत्रालय ने बांग्लादेश सरकार से कहा कि 'बांग्ला सांस्कृतिक पुनर्जागरण के प्रतीक इस इमारत की ऐतिहासिक स्थिति को देखते हुए इसे गिराने के फैसले पर वापस विचार करना चाहिए।

मंत्रालय ने कहा कि, सरकार को इसकी मरम्मत और इसे वापस बनाने के विकल्पों के बारे में सोचना बेहतर होगा। विदेश मंत्रालय ने आगे कहा कि, इस इमारत को साहित्य संग्रहालय बनाना चाहिए और भारत-बांग्लादेश की साझा संस्कृति के प्रतीक के रूप में इसे विकसित करना चाहिए।

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साथ ही यह भी कहा कि यदि बांग्लादेश सरकार इस पर काम करती है तो भारत इस उद्देश्य को पूरा करने के लिए सहयोग देने को तैयार है।

सत्यजीत रे का भारतीय सिनेमा और वर्ल्ड सिनेमा में योगदान

सत्यजीत रे का जन्म 2 मई, 1921 को कोलकाता में एक ऐसे परिवार में हुआ था जो कला और साहित्य में गहराई से डूबा हुआ था। रे का सिनेमा से परिचय तब शुरू हुआ जब उन्हें जीन रेनॉयर, विटोरियो डी सिका और अकीरा कुरोसावा जैसे महान फिल्म निर्माताओं के काम से रूबरू हुए। रे की फिल्मों में बंगाल की सामाजिक, सांस्कृतिक और आर्थिक गहराई है कि वह दुनिया के दर्शकों के दिल को भी छू लेती है।

सत्यजीत रे भारतीय और वर्ल्ड सिनेमा के एक महान फिल्म निर्माता थे, जिन्होंने अपनी फिल्मों के जरिए भारतीय संस्कृति और कहानियों को दुनिया भर में पहुंचाया। उन्होंने 1955 में अपनी पहली फिल्म "पाथेर पांचाली" से अंतरराष्ट्रीय पहचान हासिल की और इस फिल्म ने कान्स फिल्म फेस्टिवल में पुरस्कार भी जीता।

रे ने "अपु ट्रायोलॉजी, चारुलता, नायक, शतरंज के खिलाड़ी जैसी कई महान फिल्में बनाई, जो आज भी दर्शकों को सोचने पर मजबूर करती हैं। रे सिर्फ एक फिल्मकार नहीं, बल्कि एक लेखक, संगीतकार, चित्रकार और विचारक भी थे। उन्होंने भारतीय सिनेमा को एक नई भाषा दी, जहां सादगी की सुंदरता को दर्शाया गया है।

वो अचीवमेंट्स जो रे के अलावा किसी भारतीय फिल्ममेकर को नहीं मिली

सत्यजीत रे ऐसे एकमात्र भारतीय फिल्ममेकर हैं जिन्होंने वो ऊंचाइयां हासिल की जो आज तक किसी और भारतीय निर्देशक को नहीं मिलीं। उनका सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय सम्मान 1992 में ऑस्कर का मानद पुरस्कार (Honorary Oscar) मिला जिसे लाइफटाइम अचीवमेंट अवार्ड" के नाम से भी जाना जाता है, यह अवार्ड आज तक किसी भी भारतीय निर्देशक को अब तक नहीं मिला। इसके अलावा उन्हें फ्रांस का सर्वोच्च नागरिक सम्मान लीजन ऑफ ऑनर भी मिला है, जो उनकी दुनिया में एक अलग विशेष पहचान को दर्शाता है।

पाथेर पांचाली ने ही 11 अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार जीते, जिसमें कान्स फिल्म फेस्टिवल का बेस्ट ह्यूमन डॉक्यूमेंट अवॉर्ड शामिल है, ये अचीवमेंट दुनिया में बहुत ही कम है। सत्यजीत रे ने कुल मिलाकर 30 से अधिक अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार अपने नाम किए, जिनमें बर्लिन और वेनिस फिल्म फेस्टिवल के सर्वोच्च पुरस्कार भी शामिल हैं।

सत्यजीत रे ने "फेलूदा" और "प्रोफेसर शोंकु" जैसे किरदारों की भारतीय साहित्य में भी अमिट छाप छोड़ी है। सत्यजीत रे एकमात्र ऐसे भारतीय फिल्ममेकर हैं, जिनका नाम विश्व सिनेमा के दिग्गजों, जैसे अकीरा कुरोसावा और फेडेरिको फेलिनी के साथ लिया जाता है।

कौन-सी हैं 'रे' की वो फिल्में जो अभी भी रेलेवेंट हैं और पढ़ाई का विषय है?

सत्यजीत रे की कई फिल्में आज भी उतनी ही रेलेवेंट हैं जितनी वे अपने समय में थीं। उनकी अपु त्रयी, पाथेर पांचाली, अपराजितो, अपुर संसार) भारतीय ग्रामीण जीवन, गरीबी, सपनों और संघर्षों को इतनी सच्चाई से दिखाती है कि आज भी ये फिल्में दुनिया के कई फिल्म स्कूलों में पढ़ाई जाती हैं।

चारुलता जैसी फिल्म स्त्री स्वतंत्रता और आत्म-जागरण को जगाने में सहायता करती हैं। इसके अलावा फिल्म नायक एक सुपरस्टार के भीतर की लड़ाई को दिखाती है, जो आज के सेलिब्रिटी कल्चर में और भी ज्यादा सटीक बैठती है। जन अरण्य और प्रति द्वंद्वी जैसे शहरी संघर्ष पर आधारित फिल्में आज के बेरोजगारी और दुनिया की चकाचौंध की सच्चाई को उजागर करती है।

रे की कई फिल्मों को ऑक्सफोर्ड, हार्वर्ड, एफटीआइआइ जैसे कई संस्थानों में अध्ययन का विषय भी बनाया गया है। उनकी फिल्मों को सिनेमैटिक क्लासिक्स के विषय के रूप में पढ़ाया जाता है। रे की कुछ बेहतरीन फिल्में रबिन्द्रनाथ टैगोर के उपन्यासों और कृतियों पर आधारित हैं। सत्यजीत रे की फिल्में केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि समाज का दर्पण और शिक्षण का भी माध्यम हैं।

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