Phule Movie Review: समाज को नई चेतना देने वाले दंपत्ति की कहानी, पूर्वाग्रह से ग्रस्त होकर न देखें 'फुले'
मूवी रिव्यू: 'फुले'
एक्टर्स: प्रतीक गांधी, पत्रलेखा और विनय पाठक
डायरेक्टर: अनंत महादेवन
रेटिंग: 3.5 स्टार्स
Phule Movie Review: 25 अप्रैल 2025 को सिनेमाघरों में एक फिल्म रिलीज हुई 'फुले'। जो पहले 11 अप्रैल को रिलीज होने वाली थी। लेकिन सेंसर बोर्ड और कुछ लोगों के कारण फिल्म लेट हुई। विरोध इसलिए हो रहा था कि फिल्म में ब्राह्मणों के द्वारा दलितों पर किए गए अत्याचारों को दिखाया गया है। ये बात सच है कि एक जमाने में ऐसा हुआ, और बहुत जमकर हुआ। हालांकि कुछ जगहों पर अभी भी ये हो रहा है। ये सारी बातें रिकॉर्ड में भी हैं, इसे झुठलाया तो नहीं जा सकता है। अतीत से मुंह मोड़ने से वो अच्छा तो नहीं हो जाएगा? फिल्म में जो कुछ दिखाया गया है और जिसने ये फिल्म बनाई है, अगर उसकी जाति देखेंगे तो वो ब्राह्मण ही है। ऐसे में फिल्म को पूर्वाग्रह से ग्रसित होकर नहीं देखनी चाहिए। लेकिन फिल्म देखनी चाहिए।

कहानी देश के पहले महात्मा, ज्योति बा की है। जिन्हें गांधी जी से पहले महात्मा की उपाधि दी गई। वो और उनकी पत्नी सावित्री बाई ने तब एक लौ जलाई थी। जिसकी चर्चा आज भी हो रही है। ज्योतिराव और सावित्री स्त्रियों को शिक्षित करना चाहते थे। इसके लिए ज्योतिराव ने पहले अपनी पत्नी सावित्री को पढ़ाया। ये बात तब की है जब लड़कियां कचरे के बीच छुपती और फिर पढ़ाई करने जातीं। ज्योतिराव और सावित्री को एक ब्राह्मण ने अपने घर में स्कूल चलाने की अनुमति दी थी। लेकिन कुछ पुजारियों और मौलवियों को ये नागवार लगा। क्योंकि उनकी सोच थी कि अगर बेटियां पढ़ेंगी तो घर का काम कौन करेगा? फिर वही हुआ, दोनों पर हमला हुआ। बचे तो बेइज्जत किया गया सरेराह। गोबर भी फेका गया। लेकिन सावित्री की सोच बहुत अलग थी। उन्होंने जो स्कूल खोला, उसी से दलित साहित्य की शुरुआत भी हुआ। उनकी एक छात्रा ने निबंध लिखा था। जिससे साहित्य की नींव पड़ी। जो सिलसिला और अलख ज्योतिराव और सावित्री ने जलाई, उसकी चर्चा अभी भी हो रही है।
फिल्म में एक्टिंग की बात करें तो ज्योतिराव और सावित्री का रोल प्रतीक गांधी और पत्रलेखा ने निभाया है। जिसमे दोनों ने अपने आपको झोंकने की कोशिश की है। एक एक्टर और परफॉर्मर के रूप में जो किया जा सकता था, दोनों ने फिल्म के लिए सब किया है। कुछ जगह वो थोड़ा अटके और खटके हैं, लेकिन फिल्म जैसे जैसे चढ़ती है उनका काम भी चढ़ने लगता है। पत्रलेखा ने भी इस फिल्म में अपनी एक्टिंग से कुछ प्रयोग किए हैं, जो देखने लायक हैं। हालांकि सावित्री के रोल में उनको देखने में आपको थोड़ा झिझक होगी। लेकिन उन्होंने अपनी एक्टिंग से कनवेंस किया है और फिर आपको खुद से नजर नहीं हटने वाला काम किया है। फिल्म में विनय पाठक भी हैं, जिनका काम अद्भुत लगता है। विनय का अनुभव भी दिखता है।
फिल्म को अनंत महादेवन ने डायरेक्ट किया है। इसके पहले उन्होंने 'अक्सर', 'गौर हरी दास्तान' और 'दिल मांगे मोर' जैसी फिल्में बनाई हैं। उन्होंने अपने करियर की पहली बायोपिक 'मी सिंधुताई सपकाल' बनाई थी। इसके बाद अब उन्होंने जो फिल्म बनाई है, वो देखने लायक है। इस फिल्म को रिलीज होने में जिस तरह की कठिनाई आई हैं, वो भी उन्हें याद रहेगा। निर्देशन के रूप में उन्होंने गजब का काम किया है। अनंत का ये फिल्म बनाना, जिसमें वो अपने ही पूर्वजों पर उंगली उठती हैं। ऐसा करना भी एक साहस है। जो इंडस्ट्री के मौजूदा निर्देशक करने से कतराते या कोसों दूर भागते हैं। इसलिए भी फुले एक अहम फिल्म है। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी सुनीता राडिया ने की है। जो कमाल है। इससे भी कमाल का काम फिल्म एक एडिटर रौनक फडनिस का है। जिन्होंने फिल्म को किसी भी तरह से ढीला नहीं छोड़ा है। एक कसी हुई और कट-टू-कट फिल्म का ये परफेक्ट उदाहरण है।
रिव्यू की शुरुआत से अभी तक आपको फुले देखने के कई कारण मिल गए होंगे। अगर अभी नहीं मिले हैं तो आप बस जाइए और फिल्म देखिए। लेकिन फिल्म देखने जाने से पहले कोई भी परसेप्शन मत बनाइएगा। तब आपको फिल्म को देखने में मजा आएगा और समझ भी। ज्योतिराव और सावित्री ने जो अलख जगाई वो अभी भी ची जा रही है। उनके संघर्षों के लिए भी फिल्म देखना जरूरी है। 74 साल के निर्देशक अनंत महादेवन के साहस के लिए भी फिल्म देखनी चाहिए। मेरी बात यहीं तक आप भी फिल्म देखिए और अपनी राय बनाइए।












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