'बेघर, बेरोजगार लोगों की तरह पेड़ों के नीचे सोता था', जब जावेद अख्तर ने सुनाई मुंबई में स्ट्रगल की कहानी
'बेघर, बेरोजगार लोगों की तरह पेड़ों के नीचे सोता था', जब जावेद अख्तर ने सुनाई मुंबई में स्ट्रगल की कहानी
मुंबई,

'मैं पेड़ों के नीचे सोता था क्योंकि...
गीतकार और पटकथा लेखक जावेद अख्तर 1960 के दशक में मुंबई आए थे। कुछ मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक 4 अक्टूबर 1964 को जावेद अख्तर मुंबई आए थे। तब उनकी आमदनी बहुत अच्छी नहीं थी। उन्होंने एक बार इस बारे में बात की थी कि कैसे वह उस समय 'बेघर' थे और पेड़ों के नीचे 'जहां भी जगह मिले, सो जाते थे। मीडिया रिपोर्ट के मुताबिक उस वक्त जावेद अख्तर के पास खाने तक के पैसे नहीं थे। उन्होंने कई रात सड़कों पर खुले में बिताए हैं।
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'मैं जहां चाहता था, वहां सो जाता था...'
2006 में हिंदुस्तान टाइम्स को दिए इंटरव्यू में जावेद अख्तर ने अलग-अलग शहरों में रहने के बारे में बताया था। लेकिन उन्होंने कहा था कि जिंदगी का असली मतलब, मुझे मुंबई में समझ आया था। मैं जहां चाहता था सो जाता था, कभी किसी बरामदे में, कभी किसी गलियारे में, कभी किसी पेड़ के नीचे जहां मेरे जैसे कई बेघर, बेरोजगार लोग भी रहते थे।''

'मुझे 1969 में जाकर ब्रेक मिला...'
जावेद अख्तर ने आगे कहा, "आखिरकार नवंबर 1969 में, मुझे कुछ काम मिला, जिसे फिल्मी भाषा में 'ब्रेक' कहा जाता है।" उसके बाद जावेद अख्तर को कमाल अमरोही के स्टूडियो में रहने का ठिकाना मिला। जावेद अख्तर शुरू से ही कुछ ऐसा करना चाहते थे, जिससे उनकी अलग पहचान बन सके। जावेद अख्तर ने अपने साथी सलीम खान के साथ 1970 और 80 के दशक में कई ब्लॉकबस्टर फिल्मों की पटकथा लिखी, जिनमें सीता और गीता, दीवार, शोले, डॉन और मिस्टर इंडिया शामिल हैं। हालांकि, व्यक्तिगत मतभेदों के कारण 1982 में वे अलग हो गए थे।

जावेद अख्तर को 3 साल लगातार मिला बेस्ट गीतकार अवॉर्ड
जावेद अख्तर ने लगातार तीन साल सर्वश्रेष्ठ गीतकार का अवॉर्ड मिला है। ये सर्वश्रेष्ठ गीतकार का अवॉर्ड 1997 में साज, 1998 में बॉर्डर और 1999 में गॉडमदर सहित कई राष्ट्रीय पुरस्कार जीते। उन्हें भारत के सर्वोच्च नागरिक सम्मानों में से दो पद्म श्री और साथ ही पद्म भूषण मिला है।

जावेद ने कहा- शुक्रिया मुंबई, शुक्रिया फिल्म इंडस्ट्री
2020 में जावेद अख्तर ने अपनी यात्रा और उस दिन को याद किया जब वह पहली बार मुंबई पहुंचे थे। जावेद अख्तर ने ट्वीट किया था, "04 अक्टूबर 1964 की बात है जब मैं बंबई आया था। 56 साल की इस लंबी यात्रा में कई टेढ़ी-मेढ़ी सड़कें, कई रोलर कोस्टर, उतार-चढ़ाव थे, लेकिन भव्य कुल मेरे पक्ष में है। शुक्रिया मुंबई, शुक्रिया फिल्म इंडस्ट्री, शुक्रिया जिंदगी। आप सब बहुत दयालु रहे हैं।"












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