Independence Day 2024: आजादी के बाद से कितना बदला भारतीय सिनेमा, चौंका देंगी इंडस्ट्री की उपलब्धियां
Independence Day 2024: आजादी के 77 साल पूरे हो रहे हैं। आजादी के बाद से देश के विकास में कई चीजों का बहुत बड़ा योगदान रहा है। कई क्षेत्रों में अद्भुत प्रगति देखी गई है। इसी कड़ी में भारतीय सिनेमा ने भी आजादी के बाद से अब तक कई बदलावों को चुना और उपलब्धियां हासिल की हैं।
बदला भारतीय सिनेमा का रंग-रूप
पिछले 77 सालों में सिनेमा का रंग रूप इतना ज्यादा बदल गया है कि ये एक अलग कहानी बयां कर सकता है। कहानी से लेकर गीत, संगीत, पटकथा, तकनीक, कई मामलों में सिनेमा में बहुत बदलाव हुआ है। साथ ही आजादी के बाद आए बदलावों से भारतीय सिनेमा को उपलब्धि भी हासिल हुई है।

हर साल भारत में 1600 से ज्यादा फिल्मों का निर्माण
आपको बता दें कि भारतीय सिनेमा अब सिर्फ बॉलीवुड तक ही सीमित नहीं है। हर साल भारत में 1600 से ज्यादा फिल्मों का निर्माण होता है। ये फिल्में हिंदी, तेलुगू, बंगाली, राजस्थानी, हरियाणवी, तमिल समेत 20 भाषाओं में बनती हैं। हालांकि इसकी शुरुआत हिंदी सिनेमा से ही हुई थी और ये तेजी से आगे भी बढ़ी है।
आजादी के बाद भारतीय सिनेमा में बदलाव
-15 अगस्त, 1947 को भारत आजाद हुआ था। ये दिन भारत के इतिहास में सबसे खूबसूरत दिन माना गया है। आजादी का असर भारतीय सिनेमा पर भी पड़ा। ये वो दौर था जब सिनेमा में स्वदेश, स्वशासन की भावना के साथ हर प्रकार के कौशल में विकास शुरू हुआ था।
-1947 में किशोर साहू की फिल्म 'सिंदूर' रिलीज हुई थी। ये एक ऐसी फिल्म थी जिसने दर्शकों के सामने एक विधवा के जीवन में आने वाली कठिनाइयों को लोगों के सामने रखा था। इस फिल्म के जरिए विधवा के पुनर्विवाह पर जोर दिया गया है।
-आजादी के अगले साल राज कपूर की फिल्में 'आग और बरसात', कमाल अमरोही की फिल्म 'महल', रूप शौरी की फिल्म 'एक थी लड़की' रिलीज हुई थी। ये सभी अलग-अलग जॉनर की फिल्में थीं। अगले कुछ सालों तक इसी तरह की फिल्में बनती चली गईं।
विश्वभर में भारतीय सिनेमा को मिली अलग पहचान
-इसके बाद धीरे-धीरे भारतीय सिनेमा व्यावसायीकरण की ओर बढ़ने लगा। मनोरंजन पर काल्पनिक कहानियां हावी होने लगी थीं। जब एक तरफ फिल्मों का व्यावसायीकरण हो रहा था, तो दूसरी ओर कुछ फिल्मकार ऐसे भी थे, जो सिनेमा के जरिए सामाजिक मुद्दों को लोगों के सामने रख रहे थे।
-विमल रॉय, वी शांताराम, महबूब, गुरु दत्त ने सिनेमा को एक सार्थक दिशा देने में अपना बहुत बड़ा योगदान दिया है। इसी दौरान फेमस फिल्ममेकर सत्यजीत रे भी लोगों के सामने आए जिन्होंने न केवल भारतीय सिनेमा को विदेशी मंच पर पहुंचाया, बल्कि भारतीय सिनेमा का लोहा भी मनवाया। 1954 में रिलीज हुई फिल्म 'पॉथेर पांचाली', 1957 में आई फिल्म 'अपराजितो', 1959 की फिल्म 'अपूर संसार' ने भारतीय सिनेमा के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि हासिल की।
-इसके बाद कुछ नई चीजों का चलन लोगों के सामने आया। फिल्मों में विलेन, कॉमेडियन, रोमांस, कैबरे डांस ने लोगों का मनोरंजन करना शुरू किया। गुरु दत्त की फिल्म प्यासा, वी शांताराम की फिल्म दो आंखें बारह हाथ, बीआर चोपड़ा की फिल्म नया दौर और महबूब की फिल्म मदर इंडिया ने क्लासिक मूवीज का दौर शुरू किया।
-60 के दशक की बात की जाए तो 'मुगल-ए-आजम' पहली फिल्म थी जिसे बनने में एक दशक से भी ज्यादा का समय लगा था। इतना ही नहीं, ये पहली हिंदी फिल्म थी, जिसने बॉक्स ऑफिस पर ताबड़तोड़ कमाई की थी। 50 और 60 के दौर की फिल्मों में दिलीप कुमार, देव आनंद, सुनील दत्त, गुरुदत्त, राज कपूर, बलराज साहनी, राजेंद्र कुमार जैसे कलाकारों की एंट्री हो चुकी थी। वहीं मीना कुमारी, मधुबाला, नरगिस, नूतन, वहीदा रहमान जैसी हीरोइनों का भी बोलबाला था।
-इसके बाद दौर आया हिंदी सिनेमा के पहले सुपरस्टार राजेश खन्ना का, जिन्होंने अपने रोमांटिक अंदाज से लोगों को अपना दीवाना बना दिया। इस दौरान फिल्मों की कहानियों के पैटर्न में भी बदलाव आया। राजेश खन्ना ने कॉमर्शियल फिल्मों के साथ-साथ कई गंभीर फिल्में भी कीं, जिनमें आनंद, कटी पतंग, सफर और आराधना का नाम शामिल है।
-राजेश खन्ना के बाद बारी आई अमिताभ बच्चन की जिन्हें एंग्री यंग मैन के तौर पर पॉपुलैरिटी मिली। 60 के दशक के आखिर में अमिताभ ने 'सात हिंदुस्तानी' से बॉलीवुड में डेब्यू किया और 1973 में रिलीज हुई फिल्म जंजीर से लोगों के दिलों पर राज करने लगे।
-70 के दशक में कॉमर्शियल फिल्में अपना दबदबा बना रही थीं। इस समय ऐसी फिल्में बनने लगीं, जिसमें हीरो रोमांटिक और नरम नहीं, बल्कि फुल ऑन एक्शन मोड में नजर आने लगे थे। इस समय के हीरो रफ एंड टफ इमेज के साथ हिंदी सिनेमा में अपनी जगह बनाने में कामयाब हो रहे थे। हालांकि इसी समय ऋषि कपूर ने अपनी एक रोमांटिक छवि बनाई थी।
-इसके बाद 80 के दशक में कई स्टार किड्स का आगमन हुआ जिनमें कुमार गौरव, संजय दत्त और सनी देओल का नाम शामिल है। इन कलाकारों को इनके पिता द्वारा बहुत ही जोर शोर से इंडस्ट्री में लॉन्च किया गया। हालांकि, अब पूरा जोर कॉमर्शियल फिल्मों पर दिया जाने लगा था। इसी समय गोविंदा ने क्लास को नहीं बल्कि मास की नब्ज को अच्छी तरह से पकड़ा। गोविंदा ने अपने डांस और स्टाइल से दर्शकों का खूब मनोरंजन किया।
90 के दशक में हुई 'तीन खान' की एंट्री
-90 के दशक में हिंदी सिनेमा पर अपना दबदबा बनाने में आमिर खान, शाहरुख खान और सलमान खान कामयाब रहे। उन्होंने दर्शकों के दिलों पर राज किया। डर, बाजीगर, कयामत से कयामत तक जैसी फिल्मों का इस दौर में बोलबाला रहा। इस समय हिंदी फिल्मों में हिंसा और रोमांस काफी हद तक हावी हो गए थे।
-साल 2000 में ऋतिक रोशन ने फिल्म कहो न प्यार है के जरिए इन तीनों खान के बीच अपनी अलग जगह बनाई। 2000 से लेकर अब तक रिलीज हुई फिल्मों में काफी कुछ बदल चुका है। पहले के दौर में एक ही स्टूडियो में पूरी फिल्म की शूटिंग कर ली जाती थी, वहीं, अब फिल्में विदेशी लोकेशंस पर शूटिंग, महंगे कॉस्ट्यूम्स, महंगे कलाकारों के कारण चर्चा में रहती हैं। फिल्मों के कंटेंट, संगीत, कहानी जैसी कई चीजों में भारी बदलाव देखने को मिला है।
भारतीय सिनेमा की उपलब्धि
-आजादी के बाद से अब तक भारतीय सिनेमा ने कई उपलब्धियां हासिल की हैं। भारतीय सिनेमा ने आजादी के बाद ढेरों जिम्मेदारियां निभाई हैं। अपनी धरोहर को वैश्विक रूप से पहचान दिलाई है।
-रोजगार और इंडस्ट्री के विकास में भारतीय सिनेमा ने अपना योगदान दिया है। अब भारतीय सिनेमा का विदेशों में भी डंका बजने लगा है। पिछले कुछ सालों में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारतीय सिनेमा को एक अलग पहचान मिली है।
-कांस फिल्म फेस्टिवल से लेकर ऑस्कर तक में भारतीय फिल्मों ने नॉमिनेशन हासिल किए हैं और अवॉर्ड्स भी जीते हैं।
-कमाई के मामले में हिंदी सिनेमा और साउथ सिनेमा, हॉलीवुड के बाद दुनियाभर में दूसरे नंबर पर है।
-सिनेमाघरों में तो फिल्में रिलीज हो ही रही हैं, लेकिन अब ओटीटी पर भी भारत में एक से बढ़कर एक कंटेंट दर्शकों के सामने पेश किया रहा है।












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