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OI Exclusive: पिता की मौत के सालों बाद भी इस दर्द से नहीं उभर पाए नाना पाटेकर, बोले- 'मेरे पास उनकी दवाई'

गदर 2 वाले डायरेक्टर अनिल शर्मा नई फिल्म वनवास लेकर आ रहे हैं। जो 20 दिसंबर को सिनेमाघरों में रिलीज होगी। इसमें नाना पाटेकर, उत्कर्ष शर्मा और सिमरत कौर अहम रोल में हैं। फिल्म के ट्रेलर को दर्शकों से मिला जुला रिस्पॉन्स मिला है। ये एक पारिवारिक फिल्म है। जिसमें पिता और बेटे के रिश्ते को बखूबी दिखाया गया है।

फिल्म की कहानी बनारस पर सेट है। जहां एक बाप को उसके बेटे बोझ समझकर छोड़ जाते हैं। दूसरी तरफ वो घर आकर अपने पिता का अंतिम संस्कार करते हैं और समाज को बताते हैं कि एक्सीडेंट पर पिता की मौत हो गई। इसी प्लॉट पर कहानी घूमती है। इस फिल्म की कास्ट इन दिनों प्रमोशन में बिजी है। इसी सिलसिले में नाना पाटेकर ने oneindia hindi से बातचीत की और फिल्म के बारे में बताया। पढ़िए बातचीत का अंश।

exclusive nana patekar talk about his sorrow pain and vanvaas

फिल्म का नाम वनवास है और आपके लिए वनवास शब्द क्या है?
मैं हमेंशा समझता हूं, जो मेरे अपने हैं। अगर उनका गलत शब्द का उच्चारण भी होता है तो मेरे लिए वो वनवास के बराबर है। मेरा अस्तित्व जो कोई भी भूल जाता है, वो वनवास है। फिर उस जीवन का कोई मजा नहीं है।

फिल्म पिता और पुत्र के रिश्ते पर बनी हुई कहानी है, आपका अपने पिता जी से कैसा रिश्ता था?
पिताजी का और मेरा रिश्ता बहुत बेहतरीन था। आज भी मैं उनकी फोटो देख कर उनसे बात करता हूं। मां से भी बात करता हूं। मां का निधन 99 साल की उम्र में हुआ लेकिन पिता जी जल्दी गुजर गए थे। मैं 28 साल का था, वो 69 साल के थे। हर कोई अपने मां बाप को मिस करता है। मैं हमेशा कहता हूं, जितना हो सके आप कहीं भी जाओ कुछ भी करो। लेकिन जब भी आपको मौका मिलता है, अगर मां बाप गांव में हैं या जहां भी हैं। आप उनके पास जाकर खूब सारा वक्त गुजारो। आप उनके पास जाओगे तो वो वक्त उनके लिए त्योहार होता है।

हम सब वनवास में ही जी रहे हैं, आपका वनवास क्या है?
मैं वही कहता हूं कि आप जितना हो सकता है उतना मां बाप के पास जाओ। उनके साथ रहो वक्त गुजारो। क्योंकि हमारे जो अपने हैं, उनके गुजर जाने के बाद दुख हो तो उसका कोई फायदा नहीं है। मुझे तो हमेशा दुख होता है कि मेरे पिता जी थे, उनके दवाई के लिए मेरे पास पैसे नहीं थे। अब मेरे पास पैसा है लेकि उस पैसे की अहमियत नहीं है। जो मेरे पिताजी के काम नहीं आया। मां 99 की थीं, उनके लिए जितना कुछ कर पाया किया। मैंने कोई मेहरबानी थोड़ी की, हमारे पास दूसरा कोई भगवान तो है नहीं। मैं मंदिर जाता नहीं।

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