De De Pyaar De 2 Movie Review: मैं एक शब्द में कहना चाहूंगा कि ये तो 'टॉर्चर' है जी
De De Pyaar De 2 Movie Review in Hindi: एक फिल्म देखी दे दे प्यार दे 2 ये साल 2019 में आई फिल्म दे दे प्यार का सीक्वल है। मतलब पहले पार्ट से आगे की कहानी इसमें दिखाई जाएगी। मन में यही था। फिल्म कैसी होगी इसका मोटा-मोटा अंदाजा ट्रेलर देखने के बाद हो गया था। लेकिन हमारा काम (जिसे हम धर्म भी मानते हैं) भी है कि फिल्म कैसी है, आप सभी को ये रिव्यू के माध्यम से बताना। तो अपने कर्तव्य का पालन करते हुए प्रेस शो में पहुंचे और पिक्चर देखने का काम शुरू किया गया। चेतावनी- अजय देवगन, रकुल प्रीत, लव रंजन के फैन और पीआर इस रिव्यू से दूर रहे हैं। क्योंकि उन्हें यहां लिखी बातें बबूल के कांटे से भी तेज चुभेंगी।

फिल्म की कहानी पहले पार्ट के मोड़ से आगे बढ़ती है। जहां आएशा खुराना (रकुल प्रीत सिंह) अपनी पिता की उम्र के प्रेमी यानी आशीष को माता-पिता से मिलवाने का प्लान करती है। वो लंदन से चंडीगढ़ आती है। उसका भाई पिता बनने वाला होता है, ये मौका आएशा को सही लगता है। क्योंकि खुशी के मौके पर शॉकिंग बात बताने में बहुत ज्यादा दिक्कत नहीं होगी। ऐसा उसका मानना था। वो अपनी भाभी को इस प्लानिंग में शामिल करती है। माता-पिता उस लड़के को बुला लेते हैं। क्योंकि उनका कहना है कि यार हम 'एडुकेटेड, प्रोग्रेसिव और मॉर्डन लोग हैं।' जब पता चलता है कि बेटी का प्रेमी उनकी उम्र से 1 साल छोटा है...फिर वही होता है जो आप सोच रहे होंगे। इसके बाद बेटी और माता-पिता के बीच बहुत झगड़ा होता है। जिसमें बेटी पिता को गाली दे देती है और घर छोड़ कर चली जाती है। आप सोच रहे होंगे कि इसके बाद कहानी में वही होता है, जो टिपिकल बॉलीवुड की फिल्मों में होता आया है। लेकिन नहीं आपने गलत सोचा, यहां उससे भी ज्यादा बुरा होता है। वो इतना कि मैं इसे आपको इतनी सौम्य भाषा में नहीं बता पाऊंगा। यही फिल्म की 'तथाकथित' कहानी है।
माधवन के आगे सब फेल
एक्टिंग की बात करें तो आशीष के रोल में अजय देवगन का काम वैसा ही है, जैसा हर फिल्म में होता है। न डायलॉग डिलेवरी अच्छी है और एक्सप्रेशन की बात न करें तो बेहतर। हर बात पर सेम एक्सप्रेशन कैसे देना है, ये आप अजय की एक्टिंग से सीख सकते हैं। रकुल प्रीत सिंह ने अपना कॉम्पटीशन अजय से रखा था। जाहिर से बात है, जीतना उन्हीं को है। लेकिन यहां पर भी उन्होंने जरूरत से ज्यादा मतलब ओवरएक्टिंग की है, वो भी भर-भरकर। फिल्म में आर माधवन और गौतमी कपूर ने रकुल प्रीत की मां-पापा का रोल किया है। पूरी फिल्म में यही दोनों हैं जो अपने पंच अच्छे लैंड करवाते हैं और एक्टिंग से फिल्म अझेल से थोड़ा देखने लायक बनाते हैं। मीजान जाफरी भी फिल्म हैं, वो अपने रोल में रणबीर कपूर की याद दिलाते हैं। ऐसा लगता है उन्होंने पूरा रणबीर को कॉपी किया है। जावेद जाफरी ने स्क्रीन स्पेस के हिसाब से ठीक काम किया है। बाकी सपोर्टिंग कास्ट का काम लीड एक्टर्स से अच्छा है। चाहे वो इशिता दत्ता हों या फिर बब्बी के रोल में अंकुर नय्यर।
वो कहानी जो न देखने को करती है मजबूर
दे दे प्यार दे 2 की कहानी लव रंजन की है। जिसे उन्होंने अपने साथी राइटर तरुण जैन के साथ लिखी है। लव ने पहले प्यार का पंचनामा और तू झूठी मैं मक्कार जैसी फिल्में बनाई हैं। वो अपनी witty कहानियों के लिए जाने जाते हैं। लेकिन इस बार ऐसी ऐसी कहानी लिखी है जो बेहद अझेल, उबाऊ और इरिटेट करती है। ऐसा लगता है कि ये फिल्म देखने क्यों आया। लड़की अपने बाप को गाली देती है। वेस्टर्न कंट्री में इसे कूल माना जाता होगा, लेकिन भारतीय समाज में (जितना मैं जानता समझता हूं) इसे भद्दापन माना जाता है। उनकी फिल्म की हिरोइन अपने प्यार और रिलेशन में अपनी गलती नहीं मानती, ऊपर से प्रेमी को दोष देती है। उसका किरदार लवर से टॉक्सिक में बदल जाता है। लेकिन राइटर को यहां फर्क नहीं पड़ता है। सेकेंड हाफ में कहानी बे-सिर पैर की हो जाती है। क्या कहना चाहती है यही नहीं पता चलता। अंत में लगता है कि अब खत्म हो जाए। डायेरक्शन अंशुल का ठीक-ठाक है।
बात पैसे और समय बचाने की
कुल जमा ये बात ये है कि 146 मिनट की ये फिल्म देखने के बाद ये साफ शब्दों में कहा जा सकता है कि दे दे प्यार दे 2 एक टॉर्चर, अझेल, ऊबाऊ और खुद के बाल खींचने को मजबूर कर देने वाली फिल्म है। वो इसलिए क्योंकि मैंने इस फिल्म को देखते वक्त 20 बार फोन चलाया, 10 बार ये सोचा कि कब खत्म होगी और कम से कम 50 बार उबासी ली होगी। इसे देखने के बाद ऐसा लगता है कि सच में बॉलीवुड के पास कहानियां खत्म हो गई हैं। इस फिल्म पर मेरी बात यहीं तक, क्योंकि इसके बाद ज्यादा तारीफ नहीं लिख पाउंगा।












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