खरज से तार सप्तक और सुर से ऑटो ट्यून तक, संगीत की 'बंदिश' में पाश्चत फ्यूजन म्यूजिक के 'बैंडिट्स' की जुगलबंदी
कास्ट- ऋत्विक भौमिक, श्रेया चौधरी, शीबा चड्ढा, अतुल कुलकर्णी और राजेश तैलंग
डायरेक्टर- आनंद तिवारी
रेटिंग- 3 स्टार्स
प्लेटफॉर्म- प्राइम वीडियो
इंतजार.... है तो ये शब्द, लेकिन बहुत भारी। ये इंतजार हर किसी के जीवन में है। बच्चे का खिलौने के लिए। प्रेमी का प्रेमिका के लिए या फिर प्रेमिका का अपने प्यार के लिए। ऐसा नहीं है कि इस भारी लेकिन कभी सुंदर इंतजार को रोमैंटिसाइज ही किया जाए। वैसे शायर इंतजार को खूब रोमैंटिसाइज करके गए और कुछ अभी भी करते हैं। ये इंतजार आता है परिवार के बीच, पारिवारिक रिश्तों के बीच। अपने हक को पाने का इंतजार। इंतजार अपने किए काम को नाम मिलने का। खै़र इंतजार तो प्रेमियों को भी खूब करना पड़ा है।
जहां थमी, वहीं से हुई शुरुआत
खुद से मिलने के लिए खूब भागना भी पड़ता है, यहां तक कि अपने आप से भी। वैसे ये तो किसी दार्शनिक या फिल्म की लाइन तो नहीं है। बल्कि ये मेरी है, सच कहूं तो मैं अभी भी भाग ही रहा हूं।(जितना मैंने पढ़ा है या देखा है। हालांकि मेरी पढ़ाई और सिनेमा दिखाई आपसे कम हो सकती है) ख़ैर हम भागने पर थे, तो बंदिश बैंडिट्स की हिरोइन तमन्ना भी खूब भागती है। तब वो खुद को समझ पाती है। बंदिश बैंडिट्स सीजन 2 की कहानी वहीं से आगे बढ़ती है, जहां से छूटी थी। तमन्ना अपना स्टारडम छोड़, म्यूजिक सीखने स्कूल जाती है। वो वहां एडमिशन लेती और साधारण बच्चों की तरह सीखती है। दूसरी तरफ राधे के दादाजी का निधन होता है और एक बुक छपती है। फिर शुरू होता है उनकी चरित्र का चीर हरण। इसे बचाने के लिए राधे कुछ ऐसे कदम उठाते है, जो उसके घराने के विरुद्ध है। कहानी धीरे धीरे आगे बढ़ती है और संगीत की नई राग-बंदिश सुनने को मिलती है। लेकिन अंत में राधे के हिस्से क्या आता है... वही शब्द जिससे हमने शुरू किया था। इंतजार।

शीबा के आगे सब फीके
शुरू करते हैं अभिनय से बात सबसे पहले इस सीरीज की लीड एक्ट्रेस की शीबा चड्ढा की। जितना सुकून सुगम या अपना पसंदीदा संगीत सुनने में मिलता है, सीरीज में उनके अभिनय को देख भी यही लगता है। पिछली सीजन में वो हर एपिसोड में थीं। लेकिन इस सीजन में उन्हें जो स्पेस और सवांद मिले हैं वो शक्तिशाली हैं। जैसे 'घराना तो मर्दों का होता है।' एक्सप्रेशन से ही उन्होंने बहुत कुछ बोला है। शीबा का काम इस सीजन में काबिल-ए-तारीफ है। साथ ही डायरेक्टर का, जिन्होंने उनके रोल को और महत्वता दी। तमन्ना के रोल में श्रेया चौधरी ने इस बार चौंकाने वाला काम किया है। उनका क्वीन एले के गाने में परफॉर्म करना बेहतरीन था।
राधे बने ऋत्विक भौमिक इस बार कुछ सीन में थोड़े चूके हुए नजर आते हैं। कई बार वो श्रेया के किरदार के सामने फीके पड़ते हैं। अतुल कुलकर्णी हर रोल को अपना बना लेते हैं, यहां भी ऐसा है। दिव्या दत्ता की एंट्री इस सीजन में हुई और उन्होंने अपने म्यूजिक टीचर के किरदार को आसानी से निभा कर गहरी छाप छोड़ी है। राजेश तैलंग भी अच्छे हैं। कुणाल रॉय कपूर और राहुल कुमार की प्रेजेंस की जरूरत सीन के हिसाब से है। जिसमें वो दोनो फिट भी बैठते हैं। इसके अलावा भी बाकी किरदारों ने अपने किरादारों को अच्छी तरह से निभाया है। कैमियो में अर्जुन रामपाल हैं, वो बहुत दिनों बाद दिखाई दिए हैं।
संगीत की कहानी में रंगों का आनंद
बंदिश बैंडिट्स सीजन 2 को डायरेक्टर आनंद तिवारी ने तीन और राइटर के साथ मिलकर लिखा है। अत्मिका डिडवानिया, करण सिंह त्यागी और दिगांत पाटिल। इन चारों को धन्यवाद, वो इसलिए कि उन्होंने अंत में एक ऐसी टीम को जिताया जिसकी उम्मीद शायद किसी को नहीं रहती। ये 'हैप्पी एंडिग' वाले मोमेंट को नहीं जीते हैं, ऐसा इस सीरीज को देख कर लगा। हालांकि उन्होंने प्रेमी की वो बात भी साबित कर दी कि, 'तुम्हारे लिए हंसते-हंसते हार जाऊंगा'। बहरहाल, पिछले सीजन के मुकाबले इस सीजन में ज्यादा दमदार और कुछ यादगार सवांद हैं। कहानी भी सही ढर्रे में चलती है।
डायरेक्शन की बात करें तो आनंद तिवारी की फिल्म मेकिंग में एक चीज मुझे समझ आती है। वो ये कि उन्हें रंग और रंगीन दुनिया दिखाना बहुत बेहतर तरीके से आते हैं। उनके डायरेक्शन में ये दिखता है। बंदिश बैंडिट्स में भी ये चीज देखने को मिली है। आनंद ने बंदिश बैंडिट्स को बनाने में 4 साल लगाए हैं, उनकी मेहनत दिखती है। वो एक लिरिसिस्ट हैं, इसलिए उनकी प्रोजेक्ट्स की गाने भी अच्छे होते हैं। बंदिश बैंडिट्स तो सिर्फ म्यूजिक पर ही है। सीरीज देखने के बाद लगता है कि आनंद ने बहुत बारीकी से मेहनत की है।
प्रोडक्शन डिजाइन से लेकर एडिटिंग में अव्वल
कशिश अरोड़ा की कास्टिंग भी गजब है। उन्होंने जिसे भी बंदिश बैंडिट्स के लिए चुना, सभी ने जी जान से मेहनत की। टेक्निकल चीजों की बात करें तो मनिनी मिश्रा का प्रोडक्शन डिजाइन भी बढ़िया है। राजस्थान को उन्होंने बहुत ही करीने से पेश किया है। एडिटिंग में तनुप्रिया शर्मा का काम भी अच्छा है। सीरीज में एडिटर और डायरेक्टर दोनों की अच्छी जुगलबंदी देखने को मिलती है। एपिसोड दर एपिसोड एक्साइटमेंट बनाए रखा है। बतौर डीओपी अनुभव बंसल का काम भी अच्छा है। सीरीज में म्यूजिक शंकर एहसान लॉय का है। जो सुकून देता है। गाने भी अच्छे हैं, जिन्हें सीरीज देखने के बाद भी सुनने का मन करता है।
बिंज वॉच के लायक है सीरीज
कुल जमा बात इतनी है कि बंदिश बैंडिट्स आपने देखी है तो सीजन 2 को भी पहली फुरसत में देख लीजिए। बिंज वॉच करने में असल मजा है, जो नहीं करते वो भी इस बार एक साथ पूरी सीरीज देखने की कोशिश करें। आनंद आएगा। राग और बंदिश से भरे संगीत की शौकीन हैं तो इसे देख सकते हैं। सीरीज में प्रेम पर भी जोर दिया गया है। इसलिए अपनी बात खत्म करने से पहले कवि हेमंत देवलेकर दो लाइने लिखना चाहता हूं। वो प्रेमी-प्रेमिकाओं के लिए लिखते हैं, प्रेम में कोई कैसे असफल हो सकता है, प्रेम होना ही सफलता है। इस सीरीज (Bandish Bandits Season 2 Review) पर मेरी बात यहीं तक। आप भी देखें और अपनी राय बनाएं।












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