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Review: कशिका कपूर की 'आयुष्मती गीता मैट्रिक पास' में है संदेश, प्रदीप खैरवार का सफल डेब्यू

कास्ट: कशिका कपूर, अनुज सैनी, प्रणय दीक्षित, अतुल श्रीवास्तव, अलका अमीन

निर्देशक: प्रदीप खैरवार

रेटिग: 3.5 स्टार

कहते हैं कि फिल्मे समाज का आईना होती हैं। अक्सर फिल्मों में वही दिखाया जाता है जैसा कि उस समय कि सामाजिक सोच होती है और कई बार समाज भी फिल्मों से इन्सपाइर होकर अपने अंदर झांकता है जरूरी बदलाव भी करता है। कुछ इसी प्रकार से महिला शिक्षा और सशक्तिकरण जैसे आज के ज्वलंत सामाजिक मुद्दे को केंद्र में रखकर बनाई गई और इसी शुक्रवार को रिलीज होने वाली निर्देशक प्रदीप खैरवार की फिल्म है "आयुष्मती गीता मैट्रिक पास" जो इतने गंभीर विषय को बहुत ही मनोरंजक अंदाज में और प्रभावी ढंग से दर्शकों को सामने प्रस्तुत करती है।

फिल्म की कहानी पूर्वी उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव में रहने वाले पंडित विद्याधर त्रिपाठी (अतुल श्रीवास्तव) और उनकी बेटी गीता (कशिका कपूर) को केंद्र में रखकर कही गई है जिसमें पड़ितजी ने अपनी स्वर्गवासी पत्नी को वचन दिया है कि वो गीता को मैट्रिक तक की शिक्षा जरूर देंगे। ऐसे मे कुंदन (अनुज सैनी) अपने दोस्त की बारात में गीता के गाँव आता है और गीता को पहली नजर मे ही अपना दिल दे बैठता है। गीता भी मन ही मन कुंदन को पसंद करने लगती है। लेकिन कहानी मे ट्विस्ट तब आता है जब एक दिन कुंदन अपनी मां मालती देवी (अलका अमीन) के साथ गीता के घर शादी की बात करने पहुँच जाता है।

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लेकिन पंडितजी ने "गीता जब तक मैट्रिक पास नहीं हो जाती तब तक वो उसका विवाह करने की सोच भी नहीं सकते " वाली भीष्म प्रतिज्ञा दोहराकर कुंदन और उसकी माताजी को वापिस लौटा दिया। इस बात से कुंदन निराश हो जाता है ऐसे मे एंट्री होती है उसके जिगरी दोस्त बंटी (प्रणय दीक्षित) की जो कुंदन को समझाता है कि मैट्रिक से पहले गीता से शादी करने के लिए मना किया हैं मिलने के लिए नहीं। बंटी का यह आइडिया कुंदन के दिमाग की बत्ती जला देता है तो शुरू हो जाती है कुंदन और गीता की खूबसूरत लव स्टोरी जो सहज ही मन को आनंदित करती है। लेकिन कहते हैं ना प्रेम की डगर काँटों भरी होती है ? गीता और कुंदन की प्रेम कहानी भी परवान चढ़ने से पहले कई अग्नि परीक्षाओं से गुजरती है जिससे तगड़ा ड्रामा क्रीऐट होता है जो दर्शकों का भरपूर मनोरंजन करता है। बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ के नारे को बुलंद करती फ़िल्म "आयुष्मति गीता मैट्रिक पास" बेहतरीन सिनेमा की सभी परीक्षाओं में अच्छे नम्बर्स से पास हो जाती है।

कशिका कपूर ग्रामीण क्षेत्र की लड़की गीता के किरदार में काफी सहज दिखी हैं । जैसे जैसे फिल्म की कहानी आगे बढ़ती है कशिका अपने किरदार में ढलती चली जाती हैं। कशिका अपनी ऐक्टिंग और चुलबुले अंदाज के साथ ही गंभीर दृश्य में भी अपने स्वाभाविक अभिनय से दर्शकों को बांधे रखने में कामयाब रही हैं। पहली फ़िल्म में शीर्ष भूमिका निभाने के अवसर को कशिका ने संजीदगी से निभाया हैं । पूरी फ़िल्म की कहानी के केंद्र में रहने का दबाव उनके अभिनय में जरा भी नहीं दिखाई देता।

वह विश्वास अनुज सैनी ने कुंदन के किरदार में बहुत ही नेचुरल अभिनय किया हैं एक आठवी पास लड़के के भोलेपन को उनके अभिनय में देखा जा सकता हैं । फ़िल्म में कुंदन के दोस्त बंटी के रूप में प्रणय दीक्षित ने बहुत बढ़िया काम किया है। बहुत ही सामान्य दृश्य और संवाद में भी प्रणय अपने अभिनय और निराले अंदाज मे की गई संवाद अदायगी से बहुत अच्छा बना देते हैं। उनकी कॉमिक टाइमिंग और परफार्मेंस दोनों ही दर्शकों को बहुत पसंद आएगी। फ़िल्म जब भी थोड़ी गंभीर होने लगती है तो प्रणय का एक सीन आता है और दर्शकों को गंभीरता से मुक्त करा देता है।

गीता के पिता के किरदार को अतुल श्रीवास्तव ने अपने अपने वर्षों के अनुभव और अभिनय क्षमता से सींचा है। अपने किरदार में वह सहज दिखे हैं अभिनेत्री अलका अमीन ने कुंदन की माँ का रोल में उन्होंने अपने किरदार के जरिए हास्य और गंभीर दृश्यों मे अच्छा संतुलन बनाया है।

फिल्म का एक मजबूत पक्ष इसका कर्णप्रिय संगीत भी है। फ़िल्म के पांचों गीत कहानी और सिचुएशन के अनुसार हैं और फ़िल्म का जरुरी हिस्सा हैं। लोक गायिका रेखा भारद्वाज की आवाज में रंगरेजा दिल को छू लेता है। "मैं जान से गया" बेहद रोमांटिक और खूबसूरत गीत है। "लिख दे कहानी" एक बहुत ही प्रेरणादायक गीत है। इसी गीत की कुछ लाइंस बहुत इंस्पायर करती हैं "ले ले तू शिक्षा की उड़ान, छू ले तू अपना आसमान।"

फिल्म की एक खास बात यह भी है कि फिल्म रियल लोकेशन पर शूट हुई है जिसमे पूर्वी उत्तर प्रदेश के गाँव और बनारस के गंगा घाट देखकर दर्शक सहज ही जुड़ाव महसूस करेंगे।

निर्देशक प्रदीप खैरवार ने अपनी डेब्यू फ़िल्म में एक परिपक्व फ़िल्म मेकर की तरह एक गंभीर कहानी को मनोरंजक तरीके से प्रस्तुत करने में सफल रहे हैं। पिता पुत्री के बीच के रिश्ते के कुछ इमोशनल सीन दिल को छू लेते हैं। कुंदन और उनकी माँ के बीच के ड्रामैटिक दृश्य में भी निर्देशक एक सधा हुआ ड्रामा पर्दे पर लेकर आते हैं। दरअसल फ़िल्म कुंदन और गीता की लव स्टोरी हैं जिसका बैकड्रॉप महिला एजुकेशन और सशक्तिकरण हैं। बतौर निर्देशक प्रदीप एक सामाजिक मुद्दे को लव स्टोरी, ड्रामा और ईमोशनल फ़ील के साथ फॅमिली एंटरटेनर बनाने में सफल रहे हैं । प्रदीप खैरवार की यह फ़िल्म नई कहानी , उम्दा अभिनय के साथ ही एक बढ़िया एंटरटेनर हैं जो एक सामाजिक संदेश देने में भी कामयाब रहती है।

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