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"छत्तीसगढ़ के खजुराहो" पर मंडरा रहा अस्तित्व का संकट, दीवारों पर दरारें, गर्भगृह में भरा पानी

छत्तीसगढ़ के में पिछले तीन दिनों से लगातार मुसलाधार बारिश हो रही है। कई गांवों से सम्पर्क टूट चुका है। इस बीच कबीरधाम जिले में स्थित प्रचीन काल के प्रसिद्ध भोरमदेव मंदिर के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है।

कबीरधाम, 12अगस्त। छत्तीसगढ़ के में पिछले तीन दिनों से लगातार मुसलाधार बारिश हो रही है। कई गांवों से सम्पर्क टूट चुका है। इस बीच कबीरधाम जिले में स्थित प्रचीन काल के प्रसिद्ध भोरमदेव मंदिर के अस्तित्व पर खतरा मंडराने लगा है। मंदिर की दीवारों और छत से बारिश का पानी टपक रहा है। मंदिर में पानी का रिसाव इतना ज्यादा है कि मंदिर के गर्भगृह तक पहुंच गया है। जिले में लगातार हो रही बारिश के चलते बारिश का पानी मंदिर के अंदर पहुंच रहा है। वही यह पानी पत्थरों के दरारों से रिस रहा है। बारिश के रिसाव से दरारें बढ़ती जा रही है।

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    'छत्तीसगढ़ के खजुराहो' पर मंडरा रहा अस्तित्व का संकट, दीवारों पर दरारें, गर्भगृह में भरा पानी
    11वीं सदी में नागवंशी राजाओं द्वारा बनाया गया था मंदिर

    11वीं सदी में नागवंशी राजाओं द्वारा बनाया गया था मंदिर

    पुरातत्व विभाग के अनुसार भोरमदेव मंदिर का इतिहास करीब एक हजार साल पुराना है। मंदिर का निर्माण 11वीं शताब्दी में नागवंशी राजा गोपाल देव ने चौरागांव में करवाया था। ऐसा कहा जाता है कि गोड राजाओं के देवता भोरमदेव थे और वे भगवान शिव के उपासक थे। शिवजी का ही एक नाम भोरमदेव है। इसके कारण मंदिर का नाम भोरमदेव पड़ा।

    नागर शैली में बना है प्राचीन मंदिर

    नागर शैली में बना है प्राचीन मंदिर

    भोरमदेव मंदिर का निर्माण नागर शैली में किया गया है। दीवारों पर कई शैल चित्र बने हुए हैं। जो उस काल की संस्कृति को दर्शातें हैं। इसकी बनावट खजुराहो और ओडिशा के कोणार्क मंदिर मिलती है। कबीरधाम से करीब 10 किमी दूर मैकल पर्वत समूह से घिरा यह प्राचीन मंदिर "छत्तीसगढ़ के खजुराहो" के रूप में जाना जाता है। क्योंकि यहां खजुराहो की तरह मुख्य मंदिर की बाहरी दीवारों पर मिथुन मूर्तियां बनी हुई हैं।

    देश विदेश से आते हैं श्रद्धालु और पर्यटक

    देश विदेश से आते हैं श्रद्धालु और पर्यटक

    कबीरधाम जिला प्राकृतिक रूप से सम्पन्न और में खूबसूरत जिला है, जहां पर्वतों के बीच भोरमदेव का प्राचीन मंदिर स्थित है। यहां शिव आराधना के लिए श्रद्धालु व पर्यटक देश विदेश से आते हैं। सावन महीने में यहां पर श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है। लाखों की भीड़ यहां पर शिव शंकर में जलाभिषेक के लिए कांवड़ लेकर पहुंचती है। इस साल भी मध्यप्रदेश व छत्तीसगढ़ के हजारों कांवड़ियों की भीड़ यहां देखने को मिली।

    मड़वा महल और छेरकी महल भी जीर्ण

    मड़वा महल और छेरकी महल भी जीर्ण

    मंदिर प्रबंधन के अनुसार जिले में लगातार हो रही बारिश के चलते भोरमदेव मंदिर में श्रद्धालु नही पहुंच रहें है। लेकिन मंदिर की स्थित बेहद ही चिंताजनक है। मंदिर की नींव कमजोर होने के कारण एक ओर झुकती जा रही है। मंदिर के गर्भगृह में पानी टपकने के साथ ही यहाँ के मड़वा महल, छेरकी मंदिर भी ढहने के कगार पर है। जबकि यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण द्वारा संरक्षित है। इसकी देख रेख व जीर्णोद्धार की जिम्मेदारी भी पुरात्तव विभाग की है। कवर्धा में भारी बारिश के कारण भोरमदेव मंदिर के गर्भगृह में छत से पानी टपक रहा है। मंदिर के अंदर भी काफी पानी भरा हुआ है।

    प्रस्ताव बनाकर भेजा लेकिन नही शुरू हुआ काम

    प्रस्ताव बनाकर भेजा लेकिन नही शुरू हुआ काम

    कबीरधाम के जिला पुरातत्व विभाग के अधिकारियों के अनुसार मंदिर के मरम्मत के लिए भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण विभाग ने सर्वे कर नजदीक के बड़े पेड़ों को काटने, व मंदिर में चावल शिव लिंग पर चावल चढ़ाने, मंदिर के किनारे गढ्ढे कर पांच फीट का सीमेंट ब्लाक लगाने जैसे प्रस्ताव बनाया गया था। जिसमें मंदिर में पानी के रिसाव, मंदिर की नींव की स्थिति, और गर्भगृह की स्थिति की जानकारी दी गई थी। इसके लिए ढेड़ करोड़ का प्रस्ताव बनाया गया था। लेकिन इस पर कोई अमल नही किया गया है।

    इस तरह होता है मंदिरों का संधारण

    इस तरह होता है मंदिरों का संधारण

    दरअसल पुरातत्व विभाग मंदिरों के जीर्णोद्धार के लिए विशेष केमिकल से बने सीमेंट मसालों का इस्तेमाल करता है। वहीं प्राकृतिक रूप से उड़द की दालें, मेथी के पानी व चुना, गोंद का इस्तेमाल कर मंदिरों के संधारण का काम विभाग द्वारा किया जाता है। पत्थरों को जोड़ने के लिए अब विभाग विशेष केमिकल का इस्तेमाल भी करता है जो लंबे समय तक मंदिरों को मजबूत बनाए रखता है

    तीन वर्षों से बनी हुई है समस्या

    तीन वर्षों से बनी हुई है समस्या

    मंदिर के पुजारी आशीष पाठक ने बताया कि यह समस्या मंदिर में पिछले 3 सालों से हैं, जिसकी शिकायत पुरातत्व विभाग से की गई, लेकिन अब तक इसका कोई हल नहीं निकल सका। हर साल गर्भगृह में मूर्तियों पर पानी टपक रहा यहां बैठने की जगह भी नही है। पुजारी का कहना है पुरातत्व विभाग ना तो खुद ही इसके मरम्मत का काम करता है और ना ही किसी को करने की अनुमति देता है। यदि ऐसी स्थिति बनी रही तो कभी भी बड़ी दुर्घटना हो सकती


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