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CG: पितृ पक्ष में लोग कर रहे हैं पुरखों को तर्पण, लेकिन दुर्ग में 50 अस्थि कलशों को 2 साल से अपनों का इंतजार

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दुर्ग, 15 सितम्बर। छत्तीसगढ़ में पितृ पक्ष पर लोग अपने पूर्वजों और पितरों को याद कर उनके मुक्ति की कामना कर रहे हैं। लेकिन प्रदेश के दुर्ग जिले में मुक्तिधामो में आज भी 50 से अधिक अस्थि कलश अपने मोक्ष का इंतजार कर रहें हैं। इस खबर के माध्यम से हम आपको कोरोना महामारी के दौरान दुर्ग जिले के उस हकीकत से सामना करा रहे हैं। जिस वक्त जिले में इस भीषण महामारी से सैकड़ों की संख्या में लोगों ने जान गंवा दी थी। जिसका परिणाम है कि आज इन अस्थि कलशों को अपने परिजनों का इंतजार करना पड़ रहा है।

अपनों के इंतजार में रखी है अस्थि कलश

अपनों के इंतजार में रखी है अस्थि कलश

दुर्ग के रामनगर और रिसाली मुक्तिधाम में लगभग 50 अस्थि कलश संभालकर रखे गए हैं। 2 साल बीत चुके हैं लेकिम इन कलशों की सुध लेने वाला कोई परिजन नही पहुंचा। जिसके चलते मृतकों को मुक्ति पाने के लिए अपनों का इंतजार करना पड़ रहा है। यह माह पितृ पक्ष का है , और सभी अपने पुरखों की आत्मा की शांति के लिए उनके तर्पण की परंपरा को निभा रहे है। लेकिन कोरोनाकाल में आखिरी सफर के दौरान इन सभी को अपनों का कंधा नसीब नहीं हुआ और अब गंगा में विसर्जन की रस्म अदा करने परिवार वालों ने इसकी सुध नही ली।

हिन्दू धर्म में है मान्यता विसर्जन से मिलती है मुक्ति

हिन्दू धर्म में है मान्यता विसर्जन से मिलती है मुक्ति

दुर्ग के पंडित हितेश शर्मा ने बताया कि हिंदू धर्म की मान्यता के अनुसार किसी भी व्यक्ति की मृत्यु के बाद उसका अंतिम संस्कार किया जाता है। इसके बाद चिता से शेष अस्थियां एकत्र कर एक कलश में रखा जाता है। जिसके बाद मृतक के पुत्र या परिजन उन्हें किसी पवित्र नदी में प्रवाहित करते हैं। इसके पीछे यह मान्यता है कि ऐसा करने से पितरों की आत्मा को मुक्ति मिल जाती है। वहीं हर साल पितृ पक्ष में पुरखों को तर्पण कर उनके मुक्ति की कामना की जाती है।

कोविड प्रोटोकॉल के तहत किया गया था अंतिम संस्कार

कोविड प्रोटोकॉल के तहत किया गया था अंतिम संस्कार

Covid-19 के संक्रमण के दौरान दुर्ग में लगभग 2200 लोगों ने जान गंवा दी थी। जिनके अंतिम संस्कार के लिए विशेष प्रोटोकॉल का पालन कराया गया। जिससे परिजन अपने मृतकों के अंतिम संस्कार से वंचित रहे। जिसकी वजह से संक्रमित शवों का हिन्दू परपंरा के मुताबिक अंतिम संस्कार नहीं किया जा सका। अगर परम्परा के अनुसार परिजन अपने कांधों में मृतक को मुक्तिधाम तक लाकर विधि विधान से अंतिम संस्कार करते तो शायद इन अस्थि कलशों को अपनो का इंतजार नही करना पड़ता। लेकिन कोरोना काल मे बहुत से अस्थि कलशों को उनके परिजनों ने ले जाकर विधि विधान से उन्हें विसर्जित भी किया है।

कर्मचारी आत्मा की शांति के लिए रोज करते हैं पूजा

कर्मचारी आत्मा की शांति के लिए रोज करते हैं पूजा

अंतिम संस्कार का अधिकार परिजनों से कोरोना ने पहले ही छीन लिया। लेकिन अंतिम संस्कार के बाद परिजनों ने तो अस्थि कलश की सुध ही नही ली। रामनगर मुक्तिधाम के कर्माचारी प्रताप सिंह ने बताया कि इन अस्थियों को सुरक्षित रखा गया है। लेकिन इनके सम्मान के लिए वे रोज इन अस्थि कलश की पूजा करते हैं। प्रार्थना करते हैं जिनकी भी यह अस्थियां हैं, उनकी आत्मा को शांति मिले।

दुर्घटनाओ और अज्ञात व्यक्तियों के अस्थियां भी है शामिल

दुर्घटनाओ और अज्ञात व्यक्तियों के अस्थियां भी है शामिल

मुक्तिधाम की अलमारियों में रखें इन अस्थि कलशों में कोरोना काल के मृतकों के साथ साथ दुर्घटनाओ और अज्ञात व्यक्तियों के भी अस्थि कलश शामिल है। पुलिस जिनकी शिनाख्त नही कर पाती और एक समय के बाद उनका अंतिम संस्कार कर दिया जाता है। ऐसे अस्थि कलशों को कुछ समाजिक संस्थाएं आत्मा की शांति के लिए पहले विसर्जित करते थे। लेकिन कोविड के बाद से एक भी संस्था आगे नही आ रही हैं। यह एक बड़ी विडम्बना है। की आखिर अब इन अस्थियों का क्या होगा।

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English summary
CG: People are doing tarpan to ancestors in Pitru Paksha, but 50 Bone Kalash are waiting for their loved ones for 2 years in Durg.
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