कौन हैं सत्येंद्र पाल, जिनके काम की प्रशंसा में आईएफएस अधिकारी ने लिखा- हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
भारतीय वन सेवा के अधिकारी सुशांत नंदा ने दिल्ली के झुग्गी में बच्चों के लिए क्लास लगाने वाले शिक्षक की प्रशंसा करने के लिए प्रसिद्ध हिंदी कवि दुष्यंत कुमार की पंक्तियां दोहराई हैं।
नई दिल्ली, 14 अप्रैल। भारतीय वन सेवा के अधिकारी सुशांत नंदा ने दिल्ली के झुग्गी में बच्चों के लिए क्लास लगाने वाले शिक्षक की प्रशंसा करने के लिए प्रसिद्ध हिंदी कवि दुष्यंत कुमार की पंक्तियां दोहराई हैं। तस्वीरों में पूर्वी दिल्ली इलाके में एक पुल के नीचे झुग्गी झोंपड़ी में रहने वाले बच्चों को पढ़ाते हुए सत्येंद्र पाल इन दिनों खबरों में हैं। कोरोना काल में इन्होंने उन गरीब बच्चों को पढ़ाने का बीड़ा उठाया है जो बेचारे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं और जिनके पास ऑनलाइन पढ़ाई के लिए कोई साधन उपलब्ध नहीं हैं।
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साल 2015 से बच्चों को पढ़ा रहे हैं सत्येंद्र
उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गांव के रहने वाले सत्येंद्र गणित से स्नातक हैं और वह साल 2015 से इन बच्चों को पढ़ाने का काम कर रहे हैं। उनके काम की ओर इस समय सबका ध्यान इसलिए गया क्योंकि इस समय कोरोना के कारण पूरे देश में स्कूल बंद हैं। सत्येंद्र बताते हैं कि उन्हें मार्च में कोरोना के अधिक मामले सामने आने के कारण कक्षाएं बंद करनी पड़ीं, लेकिन इन बच्चों के माता-पिता ने मुझसे दोबारा पढ़ाने का अनुरोध किया। उन्होंने कहा कि, 'मैं पैसे कमाना चाहता था, लेकिन अगर मैं खुद पर ध्यान दूंगा तो मैं अकेले कमाऊंगा। यदि में इन बच्चों की मदद करता हूं तो ये भी मेरे साथ कमाएंगे।'

हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए
भारतीय वन सेवा के अधिकारी सुशांत नंदा ने प्रसिद्ध हिंदी कवि दुष्यंत कुमार की एक कविता पढ़कर सत्येंद्र की इस पहल की भूरी-भूरी प्रशंसा की है। उन्होंने सत्येंद्र की झुग्गी में रहने वाले बच्चों को पढ़ाते हुए तस्वीर शेयर करते हुए लिखा- हो कहीं भी आग, लेकिन आग जलनी चाहिए।

दिल्ली पुलिस के एक कांस्टेबल की भी हुई थी प्रशंसा
दोस्तों, सत्येंद्र अकेले ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो गरीब मजबूर बच्चों की मदद कर रहे हैं। पिछले साल दिल्ली पुलिस के एक सिपाही ने भी ऑनलाइन क्लास के लिए मोबाइल फोन न खरीद पाने वाले बच्चों को पढ़ाकर सुर्खियां बटोरी थीं। एएनआई से बातचीत में सिपाही तान सिंह ने कहा, 'मैं काफी समय से बच्चों को पढ़ा रहा हूं, लेकिन कोरोना वायरस के खतरे को देखते हुए मैंने कक्षाएं बंद कर दी थीं। लेकिन जब मैंने देखा की बच्चे ऑनलाइन क्लास लेने में असमर्थ हैं तो मैंने दोबारा क्लास लेना शुरू कर दिया। इन बच्चों के पास न तो मोबाइल फोन हैं और न ही कंप्यूटर।'












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