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दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा का निधन, नक्सलियों से रिश्तों को लेकर सुर्खियों में आए थे

Delhi News: दिल्ली विश्वविद्यालय के पूर्व प्रोफेसर जीएन साईबाबा का शनिवार रात 54 वर्ष की आयु में निधन हो गया। वह पित्ताशय के संक्रमण के कारण दिल्ली के एक सरकारी अस्पताल में भर्ती थे। सर्जरी के बाद समस्याओं से जूझ रहे थे। उनकी मृत्यु के साथ ही एक ऐसा जीवन समाप्त हो गया। जो जितना विवादों से भरा रहा। उतना ही अपने विश्वासों और न्याय के प्रति उनके अटूट विश्वास के लिए जाना जाता था।

जीएन साईबाबा ने अपने जीवन के आखिरी 20 दिन निजाम्स इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज में बिताए थे। उनकी हालत तब बिगड़ गई। जब पित्ताशय की सर्जरी के बाद उनकी स्वास्थ्य समस्याएं बढ़ गई और उन्हें संक्रमण हो गया। अस्पताल के अधिकारियों ने शनिवार रात 9 बजे उनके निधन की पुष्टि की। प्रोफेसर साईबाबा को माओवादियों से जुड़े एक हाई-प्रोफाइल मामले में बरी किए जाने के सिर्फ सात महीने बाद ही यह दुर्भाग्यपूर्ण घटना घटी। जिसने उन्हें फिर से सुर्खियों में ला दिया था।

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साईबाबा के जीवन का आखिरी दशक उथल-पुथल भरा रहा। जिसमें 2014 में उनकी गिरफ्तारी और उसके बाद नागपुर सेंट्रल जेल में कारावास शामिल था। उन पर माओवादी गतिविधियों में संलिप्तता के आरोप लगाए गए थे। इस आधार पर उन्हें दोषी ठहराकर आजीवन कारावास की सजा सुनाई गई थी। हालांकि मार्च में बॉम्बे हाई कोर्ट की नागपुर पीठ ने उन्हें और पांच अन्य को बरी कर दिया था। जब अदालत ने पाया कि अभियोजन पक्ष उनके खिलाफ गैरकानूनी गतिविधि अधिनियम के तहत आरोप साबित करने में विफल रहा था।

साईबाबा की गिरफ्तारी और हिरासत ने मानवाधिकार संगठनों और अधिवक्ताओं के बीच बहस को जन्म दिया। उन्होंने हिरासत के दौरान दुर्व्यवहार और उपेक्षा के आरोप लगाए थे। उनका दावा था कि उन्हें उनके पक्षाघात के बावजूद उचित चिकित्सा देखभाल से वंचित रखा गया और उन्हें शारीरिक और मानसिक रूप से प्रताड़ित किया गया। साईबाबा ने अपनी गिरफ्तारी को अपहरण के रूप में वर्णित किया था। जिसका उद्देश्य उनकी असहमति की आवाज को दबाना था।

जीएन साईबाबा के निधन से शैक्षणिक जगत और कार्यकर्ता समुदाय में गहरा शोक व्याप्त है। मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी के विधायक के संबाशिव राव ने उनके योगदान को याद करते हुए कहा कि साईबाबा का समाज पर गहरा प्रभाव था। अखिल भारतीय छात्र संघ ने भी उनकी संघर्षशीलता और न्याय के प्रति उनके समर्पण को याद किया। आइसा ने अपने एक बयान में कहा कि अलविदा प्रोफेसर आपका अदम्य साहस और न्याय के प्रति प्रतिबद्धता हमें हमेशा प्रेरित करती रहेगी।

जीएन साईबाबा की मृत्यु ने न केवल शिक्षा और सामाजिक सक्रियता के क्षेत्र में एक शून्य छोड़ा है। बल्कि उनके जीवन से जुड़े विवादों और उनकी संघर्षशीलता को भी उजागर किया है। माओवादी समूहों से उनके कथित संबंधों को लेकर जो बहस उठी थी। वह उनके जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गई थी। उनकी गिरफ्तारी और जेल में बिताए गए समय के दौरान मानवाधिकार उल्लंघनों के आरोपों ने एक लंबी चर्चा को जन्म दिया। जो उनकी मृत्यु के बाद भी जारी रहेगा।

उनकी मृत्यु के बाद भी उनकी कहानी लोगों के दिलों में जीवित रहेगी। जो उन्हें एक ऐसे व्यक्ति के रूप में याद करेंगे जो अपने सिद्धांतों के लिए अंत तक लड़ता रहा।

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