दिल्ली की एक अदालत का बड़ा फैसला, 2017 में हत्या के प्रयास के केस में 3 लोगों को किया बरी, जानें क्यों?
Delhi Court Acquittal 2017 Murder Attempt Case: दिल्ली की एक अदालत ने 2017 के हत्या के प्रयास के मामले में तीन आरोपियों को बरी कर दिया है। अदालत ने कहा कि इस मामले की जांच में कई महत्वपूर्ण संदेह और खामियां पाई गई हैं, जिनके कारण अभियोजन पक्ष का मामला कमजोर साबित हुआ।
अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश अतुल अहलावत ने कहा कि घायल प्रत्यक्षदर्शी के बयान में कई विसंगतियां थीं, और इसके आधार पर आरोपियों को झूठा फंसाए जाने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

क्या है पूरा मामला?
आपको बता दें कि, इस मामले में फैम कुरैशी, नईम कुरैशी और हनीफ खान पर 18 अक्टूबर 2017 को शिकायतकर्ता असलम पर हमला करने का आरोप था। अभियोजन पक्ष के अनुसार, फैम ने असलम पर गोली चलाई थी। लेकिन अदालत ने पाया कि असलम के बयान में कई महत्वपूर्ण अंतर और विसंगतियां थीं। असलम ने कहा कि उसके भाई शकील ने पूरी घटना देखी थी, जिसमें फैम द्वारा गोली चलाने का दावा भी शामिल था, लेकिन बयान में अनेक विरोधाभास देखे गए।
सबूतों की कमी और फोरेंसिक जांच में खामियां
अदालत ने देखा कि असलम की पतलून पर किसी भी गोली का निशान नहीं पाया गया, जबकि असलम ने दावा किया था कि उस पर गोली चलाई गई थी। यह पतलून फोरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजी गई थी, जिससे सबूतों की पुष्टि नहीं हो पाई। इसके अतिरिक्त, घटना स्थल से कथित हथियार या गोलियां भी बरामद नहीं हुईं, जो घटना को संदिग्ध बनाते हैं।
साथ ही, जो खून के नमूने एकत्र किए गए थे, उनका यह पता लगाने के लिए परीक्षण नहीं किया गया कि वे मानव थे या किसी पशु के। इससे अभियोजन पक्ष की दलीलें और भी कमजोर हो गईं।
डॉक्टर की राय और आत्म-नुकसान वाली चोटों का संदेह
अदालत ने असलम का इलाज करने वाले डॉक्टर की राय पर भी विचार किया। डॉक्टर ने आत्म-नुकसान वाली चोटों की संभावना को खारिज नहीं किया, जिससे यह शक और गहरा हो गया कि हो सकता है असलम ने खुद ही अपने ऊपर चोटें पहुंचाई हों। न्यायाधीश अहलावत ने कहा कि जांच में गंभीर संदेहों को अनदेखा करना सही नहीं होगा और इन संदेहों के आधार पर निष्कर्ष निकाला गया कि यह मामला न्यायसंगत नहीं है।
जांच में खामियां और पुलिस की भूमिका पर सवाल
अदालत ने इस मामले की जांच में कई खामियों को उजागर किया। पुलिस ने घटना की सूचना देने वाले व्यक्ति का बयान दर्ज नहीं किया, जिससे मामले की पारदर्शिता पर प्रश्नचिन्ह लग गया। इसके अलावा, पुलिस के कुछ गवाहों के बयान संदिग्ध पाए गए और दस्तावेजों में लिखावट में बेमेल भी पाया गया। इन कमियों ने अभियोजन पक्ष के मामले को कमजोर किया और आरोपियों को संदेह का लाभ मिल गया।
इन तमाम खामियों और संदेहों को देखते हुए अदालत ने कहा कि इस मामले की जांच में विश्वास की कमी है और यह संभावना है कि आरोपियों को झूठा फंसाया गया हो। अदालत ने इस बात पर भी जोर दिया कि किसी भी आपराधिक मामले में निष्पक्ष और पूरी जांच का होना बेहद जरूरी है, ताकि निर्दोष लोगों को अनावश्यक सजा न दी जाए।












Click it and Unblock the Notifications