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दिल्ली की अदालत ने दहेज हत्या के आरोपों से पति को किया बरी, 8 साल पुराने केस में सुनाया फैसला, जानें क्या कहा

Delhi Court News: 8 साल तक पत्नी को खुदकुशी के लिए उकसाने का आरोप झेलने वाले शख्स को दिल्ली की अदालत ने बड़ी राहत देते हुए बरी किया है। दहेज हत्या के एक मामले में शख्स पर आठ साल से ज्यादा समय से आरोप लगाया गया था, जिसे अदालत ने अब बरी कर दिया है।

अदालत ने फैसला सुनाते हुए कहा कि शादी के 7 साल के भीतर महिला की अप्राकृतिक मौत का तथ्य ही आरोपों को साबित करने के लिए पर्याप्त नहीं है। अदालत ने यह भी कहा कि ऐसी कोई धारणा नहीं है कि विवाहित महिला द्वारा की गई हर आत्महत्या उसके पति या ससुराल वालों द्वारा उत्पीड़न के कारण हुई हो, लोग कई कारणों से आत्महत्या करते हैं।

Delhi court News

अक्टूबर 2015 में महिला ने लगाई थी फांसी

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश विशाल पाहुजा, स्वतंत्र कुमार जायसवाल के खिलाफ एक मामले की सुनवाई कर रहे थे, जिन पर अपनी पत्नी को आत्महत्या के लिए मजबूर करने का आरोप था। अभियोजन पक्ष के अनुसार मृतक ज्योति ने जुलाई 2010 में जायसवाल से विवाह किया था और दहेज के लिए आरोपियों द्वारा प्रताड़ित किए जाने के बाद उसने अक्टूबर 2015 में फांसी लगाकर आत्महत्या कर ली थी।

सुप्रीम कोर्ट के 2010 के एक फैसले का हवाला देते हुए जज ने कहा, "ऐसा कोई अनुमान नहीं है कि ससुराल या माता-पिता के घर में विवाहित महिला द्वारा की गई हर आत्महत्या इसलिए हुई होगी क्योंकि वह अपने पति या ससुराल वालों के हाथों उत्पीड़न झेल रही थी। जीवित मनुष्य विभिन्न कारणों से आत्महत्या करते हैं, कुछ लोग जीवन में सामान्य तनावों को सहन करने में सक्षम नहीं होते हैं।"

आरोपों को साबित करने में सक्षम नहीं-कोर्ट

अपने समक्ष प्रस्तुत साक्ष्यों को देखते हुए कोर्ट ने कहा कि वह आरोपों की सत्यता के बारे में आश्वस्त नहीं है, ना ही अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे आरोपों को साबित करने में सक्षम है। अदालत ने 9 अगस्त को दिए अपने फैसले में कहा, "वैवाहिक घर में अप्राकृतिक मौत और वह भी शादी के सात साल के भीतर, इस तरह से भारतीय दंड संहिता (आईपीसी) की धारा 304बी (क्रूरता) और 498ए (दहेज हत्या) के तहत उसके खिलाफ आरोप लगाने के लिए पर्याप्त नहीं है।"

किसी को नहीं बताया जिम्मेदार

मृतक के माता-पिता की गवाही में "विसंगतियों और विरोधाभासों" को देखते हुए, अदालत ने कहा कि वे अभियोजन पक्ष के मामले को पुष्ट करने में विफल रहे। आगे कहा, "सुसाइड नोट के मात्र अवलोकन से पता चलता है कि मृतक ने अपनी मर्जी से अपना जीवन समाप्त किया और यह स्पष्ट रूप से कहा गया है कि उसके कृत्य के लिए कोई भी जिम्मेदार नहीं है। दस्तावेज दहेज की मांग को पूरा करने के लिए आरोपी के खिलाफ लगाए गए उत्पीड़न या क्रूरता के आरोपों का खंडन करता है और उन्हें ध्वस्त करता है।"

जानिए अपने आदेश में कोर्ट ने क्या कहा?

कोर्ट ने बताया कि मृतका ने अपने जीवनकाल में अपने पति के खिलाफ किसी से कोई शिकायत नहीं की। न्यायाधीश ने पति को बरी करते हुए कहा, "अभियोजन पक्ष के गवाहों की गवाही में भौतिक असंगतियों और रिकॉर्ड पर ठोस सबूतों की कमी के कारण, इस अदालत का मानना ​​है कि अभियोजन पक्ष अपने मामले को उचित संदेह से परे साबित करने में बुरी तरह विफल रहा है और रिकॉर्ड पर आए सबूत आरोपी को संदेह का लाभ देने का हकदार बनाते हैं।" बता देंकि मालवीय नगर पुलिस स्टेशन ने आरोपी के खिलाफ मामला दर्ज किया था।

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