Delhi Cabinet Ministers: दिल्ली में तीन सिख MLA में से BJP ने सिरसा को ही क्यों बनाया मंत्री? 5 बड़ी वजह
Delhi Cabinet Ministers: दिल्ली विधानसभा चुनाव में बीजेपी ने इस बार तीन सिख नेताओं को टिकट दिया था और तीनों ही अपनी-अपनी सीटें जीतकर पार्टी की झोली में डालने में सफल हुए हैं। लेकिन, जब मंत्री बनाने की बारी आई तो भाजपा नेतृत्व ने राजौरी गार्डन से चुनाव जीतने वाले मजिंदर सिंह सिरसा पर दांव लगाना ही उचित समझा है। दरअसल, इसके पीछे मुख्य रूप से पांच बड़ी वजहें हो सकती हैं।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में इस बार बीजेपी के टिकट पर मनजिंदर सिंह सिरसा राजौरी गार्डन से, अरविंदर सिंह लवली, गांधीनगर से और तरविंदर सिंह मारवाह जंगपुरा से चुनाव जीते हैं। इन तीनों सिख नेता से भाजपा का अपने कैडर वाला कोई नेता नहीं है। सिरसा शिरोमणि अकाली दल (SAD) से भाजपा में आए हैं तो लवली और मारवाह कांग्रेस के पुराने दिग्गज रहे हैं। लवली तो शीला दीक्षित सरकार में धाकड़ मंत्री रह चुके हैं।

आइए समझने की कोशिश करते हैं कि आखिर वो पांच वजहें क्या रही हैं, जिसकी वजह से सिरसा अपने दोनों सिख सहयोगियों पर भाजपा के सियासी गणित में ज्यादा फिट बैठ पाए हैं।
Delhi Cabinet Minister list Manjinder Singh Sirsa: AAP सरकार में कोई नहीं था सिख चेहरा
दिल्ली में अप्रत्याशित बहुमत वाली आम आदमी पार्टी (AAP) सरकार में एक भी सिख मंत्री नहीं था। जबकि, दिल्ली की आबादी में लगभग 5% के योगदान वाले सिख मतदाता कई सीटों पर काफी तादाद में हैं। शायद यही वजह रही कि बीजेपी ने जिन तीन सिख नेताओं को उतारा सबके सब चुनाव जीत गए।
ऐसे में भाजपा ने अपने सबसे सीनियर सिख नेता को मंत्री बनाकर दिल्ली से पंजाब तक सिख समुदाय में यह संदेश देने की कोशिश की है केंद्र में हो या दिल्ली, वह सिखों के हित का पूरा ख्याल रखती है। जबकि, विरोधी दल समुदाय का केवल वोट के लिए इस्तेमाल करना जानते हैं।
Delhi Cabinet Ministers:सिरसा का गुरुद्वारों से सीधा जुड़ा रहा है कनेक्शन
सिखों की राजनीति में दिल्ली से पंजाब तक गुरुद्वारों की बहुत ही बड़ी भूमिका होती है। गुरुद्वारे की राजनीति से ही निकली शिरोमणि अकाली दल (SAD) के साथ बीजेपी का दशकों तक गठबंधन रह चुका है और दोनों केंद्र से लेकर पंजाब तक में मिलकर सरकार चला चुके हैं। सिरसा भी अकाली दल से ही भाजपा में आए हुए नेता हैं।
सिरसा दिल्ली में सिख समुदाय के प्रमुख नेता हैं और दिल्ली सिख गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी (Delhi Sikh Gurdwara Management Committee) के अध्यक्ष भी रह चुके हैं। सिखों की यह संस्था दिल्ली के सभी गुरुद्वाराओं की गवर्निंग बॉडी के रूप में काम करती है।
दिल्ली विधानसभा चुनाव में भारी समर्थन मिलने के बाद बीजेपी ने सिरसा के माध्यम से फिर से सिखों के दिल की गहराइयों में उतरने की कोशिश की है, जो कथित रूप से किसान आंदोलन की वजह से पिछले कुछ वर्षों में उसे संदेह भरी नजरों से देखने लगे हैं।
Delhi Cabinet Ministers: पंजाब तक संदेश देने की कोशिश
किसान आंदोलन के नाम पर अकाली दल के एनडीए से निकलने के बाद बीजेपी को पंजाब में बड़े सियासी संकट का सामना करना पड़ रहा है। 2022 में पंजाब विधानसभा चुनाव में पार्टी अकेले लड़कर वहां सिर्फ 2 सीटें जीत सकी थी। केंद्र की मोदी सरकार उन कृषि कानूनों को वापस ले चुकी है, जिसके विरोध में यह आंदोलन भड़का था, लेकिन बावजूद भाजपा पंजाब के सिख समुदाय के दिलों में खुद को स्थापित नहीं कर पा रही है।
पंजाब पूरी तरह से कृषि प्रधान राज्य है और यहां की जो कुल 57% सिख आबादी है, वह मुख्य रूप से खेती-किसानी पर ही निर्भर है। पंजाब के इस बहुसंख्यक समाज में अपनी पैठ फिर से बहाल किए बिना, भाजपा के लिए राज्य का रास्ता आसान नहीं होने वाला। ऐसे में पास की दिल्ली की सरकार में एक बड़े सिख चेहरे को मंत्री बनाकर पार्टी पंजाब तक सकारात्मक संदेश देने की कोशिश कर रही है।
बीजेपी अबतक पंजाब में अकाली दल की जूनियर सहयोगी बनकर राजनीति करती रही है, लेकिन अब पार्टी का मंसूबा अपने दम पर वहां बड़ा खिलाड़ी बनकर उभरने की है। खासकर जिस तरह से अकाली दल अलोकप्रिय हुआ है और दिल्ली हारने के बाद 'आप'के हौसले भी कमजोर पड़ने की आशंका है, बीजेपी खुद को वहां एक मजबूत विकल्प के तौर पर पेश करना चाहती है।
Delhi Cabinet Ministers: अंतरराष्ट्रीय संदेश देने की भी कोशिश
हाल के समय में सिख कट्टरपंथ की समस्या पंजाब से लेकर यूरोप और अमेरिका के कुछ देशों में कुछ ज्यादा ही गंभीर होने लगी है। इन कट्टरपंथियों को भारत-विरोधी ताकतों का इतना सक्रिय समर्थन हासिल है कि मुट्ठीभर होने के बावजूद यह विदेशों में रह रहे देशभक्तों के लिए सिरदर्द बनकर उभर आए हैं।
ऐसे में राजधानी दिल्ली में भले ही सिखों की आबादी 5% हो, एक प्रमुख सिख नेता को मंत्री बनाकर बीजेपी दुनिया भर में राष्ट्रभक्तों का न सिर्फ हौसला बढ़ाना चाहती है, बल्कि देश के दुश्मनों को भी ठोस संदेश देना चाहती है।
Delhi Cabinet Ministers: 1984 के सिख-विरोधी दंगों का घाव भरने वाला दांव
दशकों बीच चुके हैं, कई पीढ़ियां गुजर चुकी हैं, लेकिन दिल्ली में सिख-विरोधी दंगों का जख्म अभी भी नहीं भरा है। केंद्र में बीजेपी सरकार बनने के बाद से कई मामलों में नए सिरे से जांच और अदालती सुनवाई का परिणाम है कि 1984 से लटके पड़े या बंद हो चुके मुकदमे न सिर्फ फिर से खुले हैं, बल्कि उनमें सजा भी होनी शुरू हुई है।
कांग्रेस के दिग्गज चेहरे सज्जन कुमार को सिख दंगों का दोषी करार दिया जाना और सजा मिलना इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। ऐसे में बीजेपी सिखों के एक नेता को सरकार का चेहरा बनाकर दंगा पीड़ितों के जख्मों पर भी मरहम लगाने की कोशिश कर रही है।
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